भारतकोश
फलदीपिका (मन्त्रेश्वर दैवज्ञ - सम्पूर्ण २८ अध्याय, भाव-विचार, दशा-फल एवं गोचर सटीक)

फलदीपिका (मन्त्रेश्वर दैवज्ञ - सम्पूर्ण २८ अध्याय, भाव-विचार, दशा-फल एवं गोचर सटीक)

Phaladeepika of Mantreshwara Daivajna with Commentary

मन्त्रेश्वर दैवज्ञ (टीकाकार: पं. सूर्यनारायण व्यास) द्वारा

DevanagariHindipublished684 पृष्ठ

पृष्ठ 660, कुल 684 में से

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छब्बीसवाँ अध्याय : गोचरफल ६५९ ७. (i) जब 'क' अक्षर का वेध हो तब 'घ, ङ छ' का भी वेध होता है। (ii) जब 'प' अक्षर का वेध हो तो 'ष, ण ठ' इन अक्षरों का भी वेध होता है। (iii) जब 'भ' (अक्षर) का वेध हो तब 'ध, फ, ढ' इन वर्णों (अक्षरों) का भी वेध होता है। (iv) जब 'द' (अक्षर) का वेध हो तो 'थ, झ, ञ' इनका भी वेध समझना। ८. (i) 'व' का वेध हो तो 'ब' का 'ब' का वेध हो तो व का भी वेध समझना चाहिये। (ii) 'स' का वेध ही तो 'श' का 'श' का हो तो 'स' भी समझना (iii) 'ख' का वेध हो तो ष का, ष का हो तो ख का भी वेध होता है (iv) 'य' का वेध हो तो ज का 'ज' का हो तो 'य' का भी समझना (v) 'न' का वेध हो तो ण का, 'ण' का हो तो 'न' का भी होता है। ९. (i) अ, आ इन दोनों स्वरों में एक का वेध हो तो दूसरे का भी होता है (ii) इ, ई " " " (iii) उ, ऊ " " " (iv) ऋ, ॠ " " " (v) ऌ, ॡ " " " (vi) ए, ऐ " " "

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