भारतकोश
फलदीपिका (मन्त्रेश्वर दैवज्ञ - सम्पूर्ण २८ अध्याय, भाव-विचार, दशा-फल एवं गोचर सटीक)

फलदीपिका (मन्त्रेश्वर दैवज्ञ - सम्पूर्ण २८ अध्याय, भाव-विचार, दशा-फल एवं गोचर सटीक)

Phaladeepika of Mantreshwara Daivajna with Commentary

मन्त्रेश्वर दैवज्ञ (टीकाकार: पं. सूर्यनारायण व्यास) द्वारा

DevanagariHindipublished684 पृष्ठ

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६५८ फलदीपिका दूसरा उदाहरण लीजिये : यदि ग्रह (जिसका गोचर से विचार करना है) कृत्तिका नक्षत्र में है तो (i) दृष्टि से अ (अक्षर) वृष राशि, नन्दा तिथि (पड़वा, छठ, एकादशी) सूर्य और मंगल ग्रहों को, भद्रा (दोज, सप्तमी तथा द्वादशी) तिथियों को, तुला राशि, 'त' अक्षर, विशाखा नक्षत्र को वेध करता है। (ii) दृष्टि से भरणी नक्षत्र का वेध करता है । (iii) सम्मुख दृष्टि से श्रवण नक्षत्र का वेध करता है । ५. (i) सूर्य और चन्द्र की सदैव वाम दृष्टि होती है । (ii) राहु और केतु की सदैव दक्षिण दृष्टि होती है । (iii) बाकी पाँच ग्रहों की—मंगल, बुध, बृहस्पति, शुक्र, शनि, की सम्मुख, वाम, दक्षिण-भिन्न-भिन्न समय--इन तीनों दृष्टियों में से एक दृष्टि होती है। जैसा ऊपर नियम २ में बताया गया है। कुछ विद्वानों का मत है कि सूर्य, चन्द्र, राहु और केतु, इनकी सदैव तीनों प्रकार की दृष्टि होती है—वाम, दक्षिण और सम्मुख, परन्तु हमारे विचार से सूर्य चन्द्र की सदैव वाम और राहु केतु की सदैव दक्षिण दृष्टि होती है । ६. (i) जब क्रूर ग्रह वक्री होते हैं तो वह महाक्रूर फल दिखाते हैं । (ii) जब शुभ ग्रह वक्री होते हैं तो अत्यन्त शुभ फल दिखाते हैं। (iii) यदि शुभ ग्रह वक्री हों तो राज्य प्रदान सदृश अत्यन्त शुभ फल करते हैं (iv) यदि पाप ग्रह वक्री हों तो, जातक (जिसकी जन्म कुण्डली का विचार करना हो) को अनेक कष्टों में डालते हैं और वह व्यर्थ में मारा-मारा फिरता है— परिश्रम भी होता है—सफलता भी हाथ नहीं आती ।