फलदीपिका (मन्त्रेश्वर दैवज्ञ - सम्पूर्ण २८ अध्याय, भाव-विचार, दशा-फल एवं गोचर सटीक)
Phaladeepika of Mantreshwara Daivajna with Commentary
मन्त्रेश्वर दैवज्ञ (टीकाकार: पं. सूर्यनारायण व्यास) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें६६० फलदीपिका (vii) ओ, औ इन दोनों स्वरों में एक का बोध हो तो दूसरे का भी होता है (viii) अ का वेध हो तो अं, अः का भी वेध होता है । १०. (i) जब कोई ग्रह भरणी नक्षत्र के चतुर्थ चरण में या कृत्तिका के प्रथम चरण में हो तो, अ, उ, लृ, ओ इन स्वरों का वेध करता है । (ii) जब कोई ग्रह आश्लेषा के अन्तिम चरण में या मघा के प्रथम चरण में हो तो आ, ऊ, लॄ, औ इन स्वरों का वेध करता है । (iii) जब कोई ग्रह विशाखा के चतुर्थ चरण या अनुराधा के प्रथम चरण में हो तो 'इ, ऋ, ए, अं--इन स्वरों का वेध करता है । (iv) जब कोई ग्रह श्रवण के अन्तिम चरण में हो तो ई, ॠ, ऐ तथा अः--इन स्वरों का वेध करता है । (v) ऊपर की चारों स्थितियों में कोई सी हालत हो--पूर्णा तिथि (पंचमी, दशमी, पूर्णिमा, अमावस्या) इनका वेध होता है । ११. अब जिस व्यक्ति का शुभाशुभ सर्वतोभद्र से विचार करना है उसका (i) नाम का (प्रसिद्ध नाम का) प्रथम अक्षर (ii) स्वर (iii) जन्म नक्षत्र (iv) जन्म तिथि तथा (v) जन्म राशि एक काग़ज़ पर नोट कीजिये । ऊपर जो जन्म के नाम का प्रथम अक्षर, जन्म नक्षत्र, जन्म की तिथि तथा जन्म राशि को नोट करना बताया गया है, सो इन चारों से तो पाठक अच्छी तरह परिचित हैं--इस कारण इनको समझाने की आवश्यकता नहीं । किन्तु "स्वर' को समझाने की आवश्यकता है ।