भारतकोश
फलदीपिका (मन्त्रेश्वर दैवज्ञ - सम्पूर्ण २८ अध्याय, भाव-विचार, दशा-फल एवं गोचर सटीक)

फलदीपिका (मन्त्रेश्वर दैवज्ञ - सम्पूर्ण २८ अध्याय, भाव-विचार, दशा-फल एवं गोचर सटीक)

Phaladeepika of Mantreshwara Daivajna with Commentary

मन्त्रेश्वर दैवज्ञ (टीकाकार: पं. सूर्यनारायण व्यास) द्वारा

DevanagariHindipublished684 पृष्ठ

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छब्बीसवां अध्याय : गोचरफल ६६५ को तथा नैऋत्य कोण के स्वर-इ, ऋ, ए, अं—इन को अस्त कहा जाता है। (iv) उत्तर दिशा में कुंभ, मीन मेष यह राशियां है तथा वायव्य कोण के चार स्वर, ई, ॠ, ऐ और अः यह उस समय अस्त माने जाते हैं जब कुंभ, मीन मेष इन तीन राशियों में से किसी में सूर्य हो। (v) जो राशियाँ अस्त हों उनकी दिशा के नक्षत्र, स्वर, वर्ण, तिथि सब अस्त समझी जावेंगी। (vi) यदि किसी का नामाक्षर, स्वर, जन्म नक्षत्र, जन्म राशि तिथि सब अस्त हों तो- नक्षत्र के अस्त होने से रोग, वर्ण (नामाक्षर) के अस्त होने से हानि, स्वर के अस्त होने से शोक, राशि के अस्त होने से विघ्न, तिथि के अस्त होने से भय होता है। (vii) अस्त दिशा की ओर यात्रा नहीं करनी चाहिये। उस दिशा में मकान का दरवाजा न बनवाये । (vii) जब नामाक्षर अस्त हो तो कार्य में प्रायः सफलता नहीं मिलती । (viii) जन्म नक्षत्र उदित हो जावे अर्थात् 'अस्त' दोष न रहे तो पुष्टि, वर्ण नामाक्षर उदित हो तो लाभ, स्वर उदित हो तो सुख, जन्म राशि उदित हो तो जय, जन्म तिथि उदित हो तो तेज । पांचों उदित हों तो नवीन पद प्राप्ति । उपग्रहों के विचार स सर्वतोभद्र विचार में तारतम्य सूर्य विचार १८. सूर्य (गोचर के समय) जिस नक्षत्र में हो उस से (i) पाँचवां नक्षत्र 'विद्युन्मुख'