फलदीपिका (मन्त्रेश्वर दैवज्ञ - सम्पूर्ण २८ अध्याय, भाव-विचार, दशा-फल एवं गोचर सटीक)
Phaladeepika of Mantreshwara Daivajna with Commentary
मन्त्रेश्वर दैवज्ञ (टीकाकार: पं. सूर्यनारायण व्यास) द्वारा
पृष्ठ 667, कुल 684 में से
संदर्भ में पढ़ें६६६ फलदीपिका (ii) आठवाँ नक्षत्र 'शूल' (iii) चौदहवाँ नक्षत्र 'सन्निपात' (iv) अठारहवाँ नक्षत्र 'केतु' (v) इक्कीसवाँ नक्षत्र 'उल्का' (vi) बाईसवाँ नक्षत्र 'कम्प' (vii) तेइसवाँ नक्षत्र 'वज्रक' तथा (viii) चौबीसवाँ नक्षत्र निर्घात कहलाता है। यदि इन आठों नक्षत्रों में से एक या अधिक नक्षत्र में कोई ग्रह हों तो वे कार्य में बाधा करते हैं। चन्द्र-विचार जन्म के समय जिस नक्षत्र में चन्द्रमा हो वह जन्म नक्षत्र कहलाता है। जन्म नक्षत्र से दसवाँ नक्षत्र 'कर्म', सोलहवाँ नक्षत्र, सांघातिक अठारहवाँ 'सामुदायिक', उन्तीसवाँ नक्षत्र 'आधान', तेईसवाँ विनाशी, छब्बीसवाँ नक्षत्र 'जाति', सत्ताइसवाँ नक्षत्र देश और अट्ठाइसवाँ नक्षत्र 'अभिषेक' कहलाता है। यदि जन्म, कर्म, आधान और विनाश नक्षत्रों में पाप ग्रह गोचर वश हों तो कष्ट कलह दुःख शोक आदि फल होते हैं। सामुदायिक नक्षत्र में पाप ग्रह हो तो कोई अनिष्ट, उत्पात होता है। 'जाति' नक्षत्र का वेध हो तो कुटुम्ब कष्ट, 'अभिषेक' नक्षत्र का पाप ग्रह से वेध हो तो कष्ट (जेल आदि)। 'देश' नक्षत्र में पाप ग्रह हो तो देश- निष्कासन आदि अनिष्ट फल। यदि शुभ ग्रहों से वेध हो तो शुभ फल होता है।