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फलदीपिका (मन्त्रेश्वर दैवज्ञ - सम्पूर्ण २८ अध्याय, भाव-विचार, दशा-फल एवं गोचर सटीक)

Phaladeepika of Mantreshwara Daivajna with Commentary

मन्त्रेश्वर दैवज्ञ (टीकाकार: पं. सूर्यनारायण व्यास) द्वारा

DevanagariHindipublished684 पृष्ठ

६६६ फलदीपिका (ii) आठवाँ नक्षत्र 'शूल' (iii) चौदहवाँ नक्षत्र 'सन्निपात' (iv) अठारहवाँ नक्षत्र 'केतु' (v) इक्कीसवाँ नक्षत्र 'उल्का' (vi) बाईसवाँ नक्षत्र 'कम्प' (vii) तेइसवाँ नक्षत्र 'वज्रक' तथा (viii) चौबीसवाँ नक्षत्र निर्घात कहलाता है। यदि इन आठों नक्षत्रों में से एक या अधिक नक्षत्र में कोई ग्रह हों तो वे कार्य में बाधा करते हैं। चन्द्र-विचार जन्म के समय जिस नक्षत्र में चन्द्रमा हो वह जन्म नक्षत्र कहलाता है। जन्म नक्षत्र से दसवाँ नक्षत्र 'कर्म', सोलहवाँ नक्षत्र, सांघातिक अठारहवाँ 'सामुदायिक', उन्तीसवाँ नक्षत्र 'आधान', तेईसवाँ विनाशी, छब्बीसवाँ नक्षत्र 'जाति', सत्ताइसवाँ नक्षत्र देश और अट्ठाइसवाँ नक्षत्र 'अभिषेक' कहलाता है। यदि जन्म, कर्म, आधान और विनाश नक्षत्रों में पाप ग्रह गोचर वश हों तो कष्ट कलह दुःख शोक आदि फल होते हैं। सामुदायिक नक्षत्र में पाप ग्रह हो तो कोई अनिष्ट, उत्पात होता है। 'जाति' नक्षत्र का वेध हो तो कुटुम्ब कष्ट, 'अभिषेक' नक्षत्र का पाप ग्रह से वेध हो तो कष्ट (जेल आदि)। 'देश' नक्षत्र में पाप ग्रह हो तो देश- निष्कासन आदि अनिष्ट फल। यदि शुभ ग्रहों से वेध हो तो शुभ फल होता है।

छब्बीसवाँ अध्याय : गोचरफल ६६७ सर्वतो भद्र चक्रोक्त शुभवेधाः शुभावहाः । पापवेधा दुःखतरा गोचरेताश्च चित्तयेत् ॥४८॥ वेधकारक पापग्रह दुःखदायी होते हैं शुभग्रह वेध कारक होने से शुभ फल करते हैं, इस कारण गोचर में सर्वतोभद्र में जो वेध द्वारा शुभ या अशुभ फल बताये गये हैं उनका भी विचार कर लेना चाहिए ॥४८॥ दशापहाराष्टक वर्गगोचरे ग्रहेषु नृणां विषमस्थितेष्वपि । जपेच्च तत्प्रीतिकरैः सुकर्मभिः करोति शान्तिं व्रतदानवन्दनैः ॥४६॥ यदि कोई ग्रह गोचर में अशुभ हो या किसी अनष्टप्रद ग्रह की दशा अन्तर्दशा हो तो उस ग्रह को प्रसन्न करने वाले सुकर्मों द्वारा व्रत, दान, वन्दना, जप, शांति आदि द्वारा उसके अशुभ फल की निवृत्ति करनी चाहिए अहिंसकस्य दान्तस्य धर्मार्जितधनस्य च । सर्वदा नियमस्थस्य सदा सानुग्रहा ग्रहाः ॥५०॥ जो व्यक्ति किसी की हिंसा नहीं चाहता, संयमी होता है (अपने मन और आचरण पर संयम रखता है) तथा धर्म मार्ग से धनोपार्जन करता है और सर्वदा शास्त्रोपदिष्ट नियमों का पालन करता है उस पर ग्रह सदैव अनुग्रह करते हैं।

सत्ताईसवां अध्याय प्रव्रज्या योग ग्रहैश्चतुर्भिः सहिते खनाथे त्रिकोणगैः केन्द्रगतैस्तु मुक्तः । लग्ने गृहान्ते सति सौम्यभागे केन्द्रे गुरौ कोणगते च मुक्तः ॥१॥ यदि दशम भवन का स्वामी चार ग्रहों के साथ केन्द्र या त्रिकोण में हो तो वह जातक "मुक्त" हो जावेगा अर्थात् इस जीवन के बाद उसे मोक्ष प्राप्त होगा । एकर्क्षसंस्थैश्चतुरादिकैस्तु ग्रहैर्वदेत्तत्र बलान्वितेन । प्रव्रज्यकां तत्र वदन्ति केचित् कर्मेशतुल्यां सहिते खनाथे ॥२॥ यदि चार ग्रह एक साथ हों तो उन चारों में जो बली हो उस बली ग्रह से जिस प्रकार की प्रव्रज्या द्योतित हो--वैसी प्रव्रज्या जातक की होती है । यदि उन चारों ग्रहों में दसवें ग्रह का स्वामी हो तो उस दसवें घर के स्वामी के सदृश प्रव्रज्या होती है ऐसा कुछ का मत है ॥२॥

सत्ताईसवां अध्याय : प्रव्रज्या योग ६६९ शशी दृगाणे रविजस्य संस्थितः कुजार्किदृष्टः प्रकरोति तापसम् । कुजांशके वा रविजेन दृष्टो नवांशतुल्यां कथयन्ति तां पुनः ॥३॥ यदि चन्द्रमा शनि के द्रेष्काण में हो और उस पर मंगल और शनि की दृष्टि हो तो जातक तपस्वी होगा । यह एक योग हुआ । अब दूसरा योग बताते हैं। यदि चन्द्रमा मंगल के नवांश में हो और उस पर शनि की दृष्टि हो तो—चन्द्रमा जिस नवांश में है उसके तुल्य प्रव्रज्या होगी ॥३॥ जन्माधिपः सूर्यसुतेन दृष्टः शेषैरदृष्टः पुरुषस्य सूतौ । आत्मीयदीक्षां कुरुते ह्यवश्यं पूर्वोक्तमत्रापि विचारणीयम् ॥४॥ जन्मराशि (जन्म के समय चन्द्रमा जिस राशि में हो) के स्वामी को, जिसकी जन्मकुंडली में केवल शनि देखता हो, अन्य ग्रह न देखते हों वह जातक अपनी दीक्षा अवश्य करता है। जो पहिले कहा गया है (अर्थात् किस प्रकार की प्रव्रज्या होगी) उसका विचार यहाँ भी कर लेना चाहिये ॥४॥ योगीशं दीक्षितं वा कलयति तरणिस्तीर्थपान्थं हिमांशु- र्दुर्मन्त्रज्ञं च बौधाश्रयमवनिसुतो ज्ञो मतान्यप्रविष्टम् ।

६७० फलदीपिका वेदान्तज्ञानिनं वा यतिवरममरेड्यो भृगुर्लिङ्गवृत्तिं व्रात्यं शैलूषवृत्तिं शनिरिह पतितं वाऽथ पाषण्डिनं वा ॥५॥ सूर्य “योगीश” या “दीक्षित” बनाता है। चन्द्रमा तीर्थ पान्थ (तीर्थ यात्रा करने वाला) बनाता है। “दुर्मन्त्र” (दुष्ट मंत्र वाला या कठिन मंत्र साध्य करने वाला) “बुद्ध का आश्रय लेना” (बुद्ध का आश्रय लेने से तात्पर्य है—बौद्ध भिक्षु) मंगल के प्रभाव से होता है। जो अन्य के मत में प्रविष्ट हो—ऐसा बुध के प्रभाव से होता है। बृहस्पति वेदान्त ज्ञानी या यतियों में श्रेष्ठ बनाता है। यदि शुक्र प्रबल हो तो लिंगवृत्ति (अर्थात् बाहर से तो साधु संन्यासियों के लक्षण वाला परन्तु भीतर से पाषण्डी या व्रात्य या नाचने-गाने वाला (नाच, गान, नाटक आदि कर जो संन्यासी धर्म का प्रचार करने वाला हो) और शनि के प्रभाव से पतित या पाखण्डी होता है ॥५॥ अतिशयबलयुक्तः शीतगुः शुक्लपक्षे बलविरहितमेनं प्रेक्षते लग्ननाथः । यदि भवति तपस्वी दुःखितः शोकतप्तो धनजनपरिहीनः कृच्छ्रलब्धान्नपानः ॥६॥ शुक्ल पक्ष में चन्द्रमा अत्यन्त बलवान् होता है। जब चन्द्रमा निर्बल हो (जन्म कुंडली में) और उसको लग्न का स्वामी देखता हो, ऐसा जातक यदि तपस्वी हो तो वह दुःखित, शोकतप्त, धन और जन से हीन—कठिनता से भोजन और पान (दूध आदि) प्राप्त करेगा। ॥६॥ प्रकथितमुनियोगे राजयोगो यदि स्या- दशुभफलविपाकं सर्वमुन्मूल्य पश्चात् ।

सत्ताईसवां अध्याय : प्रव्रज्या योग ६७१ जनयति पृथिवीशं दीक्षितं साधुशीलं । प्रणतनृपशिरोभिः स्पृष्टपादाम्बजयुग्मम् ॥७॥ पिछले श्लोक में “मुनि” होने का जो योग कहा गया है--वैसी कुंडली में यदि राजयोग भी हो तो जो कुछ अशुभ फल ऊपर श्लोक ६ में बताया है वह दूर हो जाता है और प्रबल राज योग होने से जातक पृथिवी का स्वामी दीक्षित, साधु-शील (साधु के सौशील्यादि गुणयुक्त) राजा होता है, जिसकी अन्य लोग वन्दना करते हैं ॥७॥ चत्वारो द्युचराः खनाथसहिताः केन्द्रे त्रिकोणेऽथवा सुस्थाने बलिनस्त्रयो यदि तदा सन्याससिद्धिर्भवेत् । सद्बाहुल्यवशाच्च तत्र सुशुभस्थानस्थितैस्तैर्वदेत् प्रव्रज्यां महितां सतामभिमतां चेदन्यथा निन्दिताम् ॥८॥ यदि चार ग्रह (जिन चार में एक ग्रह दसवें घर का स्वामी भी हो) केन्द्र या त्रिकोण में हों या तीन ग्रह बली अच्छे

अट्ठाईसवां अध्याय उपसंहाराध्याय संज्ञाध्यायः कारको वर्गसंज्ञो वीर्याध्यायः कर्मजीवोऽथ योगः । योगो राज्ञां राशिशीलो ग्रहाणां मेषादीनां लग्नसम्प्राप्तशीलः ॥१॥ भार्याभावो जातकं कामिनीनां सूनुर्बालारिष्टयोगोऽथ रोगः । भावस्तस्माद्द्वादशावाप्तभावा निर्याणं स्याद् द्विग्रहाद्याश्च तस्मात् ॥२॥ सूर्यादीनां यत्फलं तद्दशाप्तं भावादीनामीश्वराङ्गा दशा च । सूर्यादीनामन्तराख्या दशाऽथ सव्यासव्या कालचक्रोऽष्टवर्गः ॥३॥ होरासारावाप्तयद्यष्टवर्गो मान्द्यध्यायो गोचर स्यात्प्रव्रज्यः । अध्यायानां विंशतिः सप्तयुक्तान् जन्मन्येतद्गोलजं संवदामि ॥४॥ श्रीशालिवाटिजातेन मया मन्त्रेश्वरेण वै । दैवज्ञेन द्विजाग्रेण सतां ज्योतिर्विदां मुदे ॥५॥ सुकुन्तलाम्बां सम्पूज्य सर्वाभीष्टप्रदायिनीम् । तत्कटाक्षविशेषेण कृता या फलदीपिका ॥६॥

अट्ठाईसवां अध्याय : उपसंहार ६७३ मैं शालिवाटि (सम्प्रति टिन्नेवेली) का रहने वाला ब्राह्मणों में श्रेष्ठ ज्योतिषी हूँ। सब अभीष्ट वरों को प्रदान करने वाली भगवती सुकुन्तला माता की आराधना करके, ज्योतिषियों के आनन्द के लिये इस फलदीपिका का मैंने निर्माण किया है । मेरा नाम मन्त्रेश्वर है। इसके पिछले २७ अध्यायों में मैंने निम्नलिखित विषयों का विवेचन किया है। १. संज्ञाध्याय (परिभाषा) । २. ग्रहों का कारकत्व । ३. वर्ग, होरा, द्रेष्काण आदि । ४. ग्रहों का बल और उनकी निर्बलता । ५. किस कर्म से आजीविका प्राप्त होगी । ६. योग । ७. राज योग । ८. भिन्न-भिन्न ग्रहों का भिन्न-भिन्न राशि में होने से प्रभाव । ९. यदि मेष आदि लग्न जन्मकुंडली में हो तो उनका प्रभाव । १०. भार्याभाव । ११. स्त्रियों की जन्मकुंडली में विशेष विचार । १२. सन्तान भाव का विचार । १३. बालारिष्ट (बचपन में बच्चों की मृत्यु) । १४. रोगाध्याय । १५. भावों का फल विवेचन । १६. बारह भावों के फल । १७. निर्याण (मृत्यु) १८. दो या अधिक ग्रहों के योगों का फल । १९. उडुदशा (विंशोत्तरी महादशा)। २०. भावाधीश के कारण ग्रहों का 'फल । २१. अन्तर्दशा तथा प्रत्यन्तर्दशा । २२. कालचक्र दशा आदि । २३. अष्टकवर्ग । २४. अष्टक वर्ग प्रक्रिया जैसी होरा-सार में वर्णित है। २५. मान्दि और अन्य उपग्रहों का फल । २६. गोचर । २७. सन्यास योग ।

18 = 126 days = 4 months 6 days -> मं. | ० | ४ | ६ 4. Rahu: 18 * 18 = 324 days = 10 months 24 days -> रा. | ० | १० | २४ 5. Jupiter: 16 * 18 = 288 days = 9 months 18 days -> गु. | ० | ९ | १८ (or बृ.) 6. Saturn: 19 * 18 = 342 days = 11 months 12 days -> श. | ० | ११ | १२ 7. Mercury: 17 * 18 = 306 days = 10 months 6 days -> बु. | ० | १० | ६ 8. Ketu: 7 * 18 = 126 days = 4 months 6 days -> के. | ० | ४ | ६ 9. Venus: 20 * 18 = 360 days = 1 year 0 months 0 days -> शु. | १ | ० | ०

Let's check the image for Column 1 (Sun): Row 1: सू. | ० | ३ | १८ Row 2: चं. | ० | ६ | ० Row 3: मं. | ० | ४ | ६ Row 4: रा. | ० | १० | २४

६७५

परिशिष्ट

कालचक्र दशामें अन्तर्दशा

(i) जहाँ तक दशा में अन्तर्दशा समय का प्रश्न है चाहे आप मेष दशा में सिंह अन्तर्दशा कहिये या मंगल में सूर्य कहिये— एक ही समय अन्तर्दशा का आवेगा । यदि वार हों राशियों की दशा में वारहों राशियों की अन्तर्दशा की सारिणी दी जाती तो बहुत विस्तृत हो जाती इस कारण ग्रहों की दशा में ग्रहों की अन्तर्दशा दी गई है । दूसरी बात यह है कि जितना सूर्य में मंगल, उतना ही मंगल में सूर्य । इस कारण सूर्य × मंगल एक बार ही लिख दिया । (ii) जहां १०० वर्ष की पूर्ण आयु वाले नक्षत्र चरणों में जन्म होने से राशियों की दशा होती है, मकर या कुम्भ (शनि) की अन्तर्दशा नहीं होती । इस कारण १०० वर्ष की पूर्ण आयु की महादशाओं में शनि की अन्तर्दशा या यों कहिये कि मकर या कुंभ की अन्तर्दशा का समय नहीं दिया गया है। (iii) पूर्ण आयु ८३ की महादशा में सूर्य (सिंह) तथा चन्द्र की दशा नहीं होती—इसलिये अन्तर्दशा भी नहीं होती । इसी कारण सूर्य (सिंह) या चन्द्र (कर्क) की दशा में अन्य ग्रह (राशि) की अन्तर्दशा का समय या अन्य ग्रह की दशा में इनकी अन्तर्दशा का समय नहीं दिया गया है । (iv) त्रैराशिक के अनुसार शुद्ध गणित करने से, अन्तर्दशा का समय वर्ष, मास, दिन घड़ी, पल में आता है । सुविधा के लिये घड़ी पल छोड़ दिये गये हैं । यदि अन्तर्दशाओं का जोड़ दशा के पूर्ण काल से एक या दो दिन अधिक आवे तो बड़ी अन्तर्दशाओं में से एक या दो दिन कम कर— योग दशामान के अनुसार बना लेना चाहिये । इसी प्रकार यदि अन्तर्दशाओं का योग दशा के पूर्ण मान से कम आवे तो बड़ी अन्तर्दशाओं में एक या दो दिन जोड़कर—योग दशामान के समान बना लेना चाहिये ।

परिशिष्ट कालचक्र दशा में अन्तर्दशा समय ६७६ | ग्रह (राशि) | पूर्णायु १०० वर्ष<br>व.मा.दि. | पूर्णायु ८६ वर्ष<br>व मा.दि. | पूर्णायु ८५ वर्ष<br>व.मा.दि. | पूर्णायु ८३ वर्ष<br>व.मा.दि. | | :--- | :--- | :--- | :--- | | सूर्य × सूर्य | ०-३- ० | ०-३-१५ | ०-३-१५ | | | ,, × चन्द्र | १-०-१८ | १-२-२० | १-२-२५ | | | ,, × मंगल | ०-४- ६ | ०-४-२७ | ०-४-२८ | | | ,, × बुध | ०-५-१२ | ०-६- ८ | ०-६-१० | | | ,, × गुरु | ०-६- ० | ०-६-२९ | ०-७- १ | | | ,, × शुक्र | ०-९-१८ | ०-११-५ | ०-११-९ | | | ,, × शनि | | ०-२-२४ | ०-२-२५ | | | चन्द्र × चन्द्र | ४-४-२८ | ५-१-१६ | ५-२- ८ | | | ,, × मंगल | १-५-२० | १-८-१५ | १-८-२३ | | | ,, × बुध | १-१०-२० | २-२-११ | २- २-२१ | | | ,, × गुरु | ०-१०-२४ | २-५- ९ | २- ५-२० | | | ,, × शुक्र | ३- ४-१० | ३-१०-२६ | ३-११-१३ | | | ,, × शनि | | ०-११-२२ | ०-११-२६ | | | मंगल × मंगल | ०-५-२६ | ०-६-२५ | ०-६-२७ | ०- ७-२ | | ,, × बुध | ०-७-१७ | ०-८-२४ | ०-८-२७ | ०- ९-४ | | ,, × गुरु | ०-८-१२ | ०-९-२३ | ०-९-२७ | ०-१०-४ | | ,, × शुक्र | १-१-१३ | १-३-१९ | १-३-२४ | १- ४-६ | | ,, × शनि | | ०-३-२७ | ०-३-२९ | ०- ४-९ |

३७७

ग्रह (राशि)पूर्णायु १०० वर्षपूर्णायु ८६ वर्षपूर्णायु ८५ वर्षपूर्णायु ८३ वर्ष
वा.मा.दिव.मा.दि.व.मा.दि.व.मा.दि.
बुध × बुध०- ९-२२०-११- १०-११-१३०-११-२१
,, × गुरु०-१०-२४१- ०-१७१- ०-२११- १- ०
,, × शुक्र१- ५- ८१- ८- ३१- ८-१०१- ८-२४
,, × शनि०- ५- ००- ५ -२०- ५- ६
गुरु × गुरु१- ०- ०१- १- २९१- २- ३१- २-१४
,, × शुक्र१- ७- ६१-१०-१०१-१०-१७१-११- ४
,, × शनि०- ५- १७०- ५-११०- ५-२३
शुक्र × शुक्र२- ६-२२२-११-२२३- ०- ४३- १- ०
,, × शनि०- ८ -२७०- ९- १०- ९- ८
शनि × शनि०- २- ७०- २- ८०- २- ९

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स्पष्टचन्द्र से भोग्य काल चक्र दशा निकालने की सारिणी नं. ३ पूर्ण आयु ८३ वर्ष

१०११
नक्षत्र चरणस्पष्ट चन्द्रस्पष्ट चन्द्रस्पष्ट चन्द्रस्पष्ट चन्द्रस्पष्ट चन्द्रस्पष्ट चन्द्रस्पष्ट चन्द्रस्पष्ट चन्द्रस्पष्ट चन्द्रयदि १० कोष्ठ वाला स्पष्ट चन्द्र स्पष्ट ही तो अन्य सारिणी देखिये जिसमें यह चन्द्र स्पष्ट कोष्ठ २ में हो।
अश्विनी तृ० च००- ६-४००- ७- ५०- ७-३००- ७-५५०- ८-२००- ८-४५०- ९-१००- ९-३५०-१०- ०
भरणी ,,०-२०- ००-२०-२५०-२०-५००-२१-१५०-२१-४००-२२- ५०-२२-३००-२२-५५०-२३-२०
कृत्तिका ,,१- ३-२०१- ३-४५१- ४-१०१- ४-३५१- ५- ०१- ५-२५१- ५-५०१- ६-१५१- ६-४०
रोहिणी द्वि० च०१-१३-२०१-१३-४५१-१४-१०१-१४-३५१-१५- ०१-१५-२५१-१५-५०१-१६-१५१-१६-४०
मृगशिर ,,१-२६-४०१-२७- ५१-२७-३०१-२७-५५१-२८-२०१-२८-४५१-२९-१०१-२९-३५२- ०- ०
आर्द्रा ,,२-१०- ०२-१०-२५२-१०-५०२-११-१५२-११-४०२-१२- ५२-१२-३०२-१२-५५२-१३-२०
पुनर्वसु तृ० च०२-२६-४०२-२७- ५२-२७-३०२-२७-५५२-२८-२०२-२८-४५२-२९-१०२-२९-३५३- ०- ०
पुष्य ,,३-१०- ०३-१०-२५३-१०-५०३-११-१५३-११-४०३-१२- ५३-१२-३०३-१२-५५३-

चन्द्र स्पष्ट से भोग्य काल चक्र दशा निकालने की सारणी नं १ पूर्ण आयु-१०० वर्ष (नोट: यदि १०वें कोष्ठ का स्पष्ट चन्द्र हो तो अन्य सारिणी देखिये जिसमें यह चन्द्र स्पष्ट कोष्ठ २ में हो।)

१०
नक्षत्र चरणस्पष्ट चन्द्रस्पष्ट चन्द्रस्पष्ट चन्द्रस्पष्ट चन्द्रस्पष्ट चन्द्रस्पष्ट चन्द्रस्पष्ट चन्द्रस्पष्ट चन्द्रस्पष्ट चन्द्र
रा. अं. क.
अश्विनी प्र० चरण०- ०- ००- ०-२५०- ०-५००- १-१५०- १-४००- २- ५०- २-३००- २-५५०- ३-२०
भरणी "०-१३-२००-१३-४५०-१४-१००-१४-३५०-१५-०००-१५-२५०-१५-५००-१६-१५०-१६-४०
कृत्तिका "०-२६-४००-२७- ५०-२७-३००-२७-५५०-२८-२००-२८-४५०-२९-१००-२९-३५१- ०- ०
रोहिणी च० चरण१-२०- ०१-२०-२५१-२०-५०१-२१-१५१-२१-४०१-२२- ५१-२२-३०१-२२-५५१-२३-२०
मृगशिर "२- ३-२०२- ३-४५२- ४-१०२- ४-३५२- ५-००२- ५-२५२- ५-५०२- ६-१५२- ६-४०
आर्द्रा "२-१६-४०२-१७- ५२-१७-३०२-१७-५५२-१८-२०२-१८-४५२-१९-१०२-१९-३५२-२०- ०
पुनर्वसु प्र० च० "२-२०- ०२-२०-२५२-२०-५०२-२१-१५२-२१-४०२-२२- ५२-२२-३०२-२२-५५२-२३-२०
पुष्य "३- ३-२०३- ३-४५३- ४-१०३- ४-३५३- ५-००३- ५-२५३- ५-५०३- ६-१५३- ६-४०
आश्लेषा "३-१६-४०३-१७- ५३-१७-३०३-१७-५५३-१८-२०३-१८-४५३-१९-१०३-१९-३५३-२०- ०
मघा चं० च०४-१०- ०४-१०-२५४-१०-५०४-११-१५४-११-४०४-१२- ५४-१२-३०४-१२-५५४-१३-२०
पूर्वा फा० "४-२३-२०४-२३-४५४-२४-१०४-२४-३५४-२५- ०४-२५-२५४-२५-५०४-२६-१५४-२६-४०
उत्तरा "५- ६-४०५- ७- ५५- ७-३०५- ७-५५५- ८-२०५- ८-४५५- ९-१०५- ९-३५५-१०- ०
हस्त प्र० चं०५-१०- ०५-१०-२५५-१०-५०५-११-१५५-११-४०५-१२- ५५-१२-३०५-१२-५५५-१३-२०
चित्रा "५-२३-२०५-२३-४५५-२४-१०५-२४-३५५-२५- ०५-२५-२५५-२५-५०५-२६-१५५-२६-४०
स्वाती "०६- ६-४०६- ७- ५६- ७-३०६- ७-५५६- ८-२०६- ८-४५६- ९-१०६- ९-३५६-१०- ०
विशाखा च० च०७- ०-२०७- ०-२५७- ०-५०७- १-१५७- १-४०७- २- ५७- २-३०७- २-५५७- ३-२०
अनुराधा "७-१३-२०७-१३-४५७-१४-१०७-१४-३५७-१५- ०७-१५-२५७-१५-५०७-१६-१५७-१६-४०
ज्येष्ठा "७-२६-४०७-२७- ५७-२७-३०७-२७-५५७-२८-२०७-२८-४५७-२९-१०७-२९-३५८- ०- ०
मूल प्र० च० "८- ०- ०८- ०-२५८- ०-५०८- १-१५८- १-४०८- २- ५८- २-३०८- २-५५८- ३-२०
पूर्वाषाढ "८-१३-२०८-१३-४५८-१४-१०८-१४-३५८-१५- ०८-१५-२५८-१५-५०८-१६-१५८-१६-४०
उत्तराषाढ "८-२६-४०८-२७- ५८-२७-३०८-२७-५५८-२८-२०८-२८-४५८-२९-१०८-२९-३५९- ०- ०
श्रवण चं० च०९-२०- ०९-२०-२५९-२०-५०९-२१-१५९-२१-४०९-२२- ५९-२२-३०९-२२-५५९-२३-२०
धनिष्ठा "१०- ३-२०१०- ३-४५१०- ४-१०१०- ४-३५१०- ५- ०१०- ५-२५१०- ५-५०१०- ६-१५१०- ६-४०
शतभिषा "१०-१६-४०१०-१७- ५१०-१७-३०१०-१७-५५१०-१८-२०१०-१८-४५१०-१९-१०१०-१९-३५१०-२०- ०
पूर्वाभाद्र प्र० च०१०-२०- ०१०-२०-२५१०-२०-५०१०-२१-१५१०-२१-४०१०-२२- ५१०-२२-३०१०-२२-५५१०-२३-२०
उत्तराभाद्र "११- ३-२०११- ३-४५११- ४-१०११- ४-३५११- ५- ०११- ५-२५११- ५-५०११- ६-१५११- ६-४०
रेवती "११-१६-४०११-१७- ५११-१७-३०११-१७-५५११-१८-२०११-१८-४५११-१९-१०११-१९-३५११-२०- ०
भोग्य दशा१०० वर्ष८७ वर्ष ६ मास७५ वर्ष६२ वर्ष ६ मास५० वर्ष३७ वर्ष ६ मास२५ वर्ष१२ वर्ष ६ मासकुछ नहीं

चन्द्र स्पष्ट से भोग्य कालचक्र महादशानिकालने की सारिणी नं. २ पूर्ण आयु-८५ वर्ष (नोट: यदि १० कोष्ठ वाला चन्द्र स्पष्ट हो तो अन्य सारिणी देखिये—जिसमें यह चन्द्र स्पष्ट कोष्ठ २ में हो।)

१०
नक्षत्रचन्द्र स्पष्टचन्द्र स्पष्टचन्द्र स्पष्टचन्द्र स्पष्टचन्द्र स्पष्टचन्द्र स्पष्टचन्द्र स्पष्टचन्द्र स्पष्टचन्द्र स्पष्ट
अश्विनी द्वि० च००- ३-२००- ३-४५०- ४-१००- ४-३५०- ५- ००- ५-२५०- ५-५००- ६-१५०- ६-४०
भरणी द्वि० च००-१६-४००-१७- ५०-१७-३००-१७-५५०-१८-२००-१८-४५०-१९-१००-१९-३५०-२०- ०
कृत्तिका द्वि० च०१- ०- ०१- ०-२५१- ०-५०१- १-१५१- १-४०१- २- ५१- २-३०१- २-५५१- ३-२०
रोहिणी तृ० च०१-१६-४०१-१७- ५१-१७-३०१-१७-५५१-१८-२०१-१८-४५१-१९-१०१-१९-३५१-२०- ०
मृगशिर तृ० च०२- ०- ०२- ०-२५२- ०-५०२- १-१५२- १-४०२- २- ५२- २-३०२- २-५५२- ३-२०
आर्द्रा तृ० च०२-१३-२०२-१३-४५२-१४-१०२-१४-३५२-१५- ०२-१५-२५२-१५-५०२-१६-१५२-१६-४०
पुनर्वसु द्वि० च०२-२३-२०२-२३-४५२-२४-१०२-२४-३५२-२५- ०२-२५-२५२-२५-५०२-२६-१५२-२६-४०
पुष्य "३- ६-४०३- ७- ५३- ७-३०३- ७-५५३- ८-२०३- ८-४५३- ९-१०३- ९-३५३-१०- ०
आश्लेषा "३-२०- ०३-२०-२५३-२०-५०३-२१-१५३-२१-४०३-२२- ५३-२२-३०३-२२-५५३-२३-२०
मघा तृ० च०४- ६-४०४- ७- ५४- ७-३०४- ७-५५४- ८-२०४- ८-४५४- ९-१०४- ९-३५४-१०- ०
पूर्वा फाल्गु० "४-२०- ०४-२०-२५४-२०-५०४-२१-१५४-२१-४०४-२२- ५४-२२-३०४-२२-५५४-२३-२०
उत्तरा फाल्गु० "५- ३-२०५- ३-४५५- ४-१०५- ४-३५५- ५- ०५- ५-२५५- ५-५०५- ६-१५५- ६-४०
हस्त द्वि० च०५-१३-२०५-१३-४५५-१४-१०५-१४-३५५-१५- ०५-१५-२५५-१५-५०५-१६-१५५-१६-४०
चित्रा "५-२६-४०५-२७- ५५-२७-३०५-२७-५५५-२८-२०५-२८-४५५-२९-१०५-२९-३५६- ०- ०
स्वाती "६-१०- ०६-१०-२५६-१०-५०६-११-१५६-११-४०६-१२- ५६-१२-३०६-१२-५५६-१३-२०
विशाखा तृ० च०६-२६-४०६-२७- ५६-२७-३०६-२७-५५६-२८-२०६-२८-४५६-२९-१०६-२९-३५७- ०- ०
अनु० "७-१०- ०७-१०-२५७-१०-५०७-११-१५७-११-४०७-१२- ५७-१२-३०७-१२-५५७-१३-२०
ज्येष्ठा "

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