फलदीपिका (मन्त्रेश्वर दैवज्ञ - सम्पूर्ण २८ अध्याय, भाव-विचार, दशा-फल एवं गोचर सटीक)
Phaladeepika of Mantreshwara Daivajna with Commentary
मन्त्रेश्वर दैवज्ञ (टीकाकार: पं. सूर्यनारायण व्यास) द्वारा
६४६ फलदीपिका द्वादशाष्टमजन्मस्थाः शन्यर्काङ्गारका गुरुः । कुर्वन्ति प्राणसन्देहं स्थानभ्रंशं धनक्षयम् ॥३३॥ जन्मकालीन चन्द्रराशि से प्रथम, अष्टम और द्वादश राशियों में जब सूर्य, मंगल, बृहस्पति और शनि गोचरवश होते हैं तो धनहानि, स्थानभ्रंशता (जगह छूटे, सम्मान में कमी आदि) अत्यन्त अशुभ फल दिखाते हैं। यहाँ तक कि प्राणों में भी सन्देह हो जाता है। ॥ ३३ ॥ चन्द्राष्टमे च धरणीतनयः कलत्रे राहुः शुभे कविररौ च गुरुस्तृतीये । अर्कः सुतेऽर्किरुदये च बुधश्चतुर्थे मानार्थहानिमरणानि वदेद्विशेषात् ॥३४॥ जन्मकालीन चन्द्रराशि से अष्टम राशि में चन्द्रमा, सप्तम में मंगल, नवम् में राहु, चौथे बुध, तीसरे बृहस्पति, छठे शुक्र, प्रथम में शनि और पंचम में सूर्य गोचर द्वारा अत्यन्त अनिष्ट फल देते हैं ।— धन- हानि, मान-हानि, मृत्यु या मृत्यु तुल्य कष्ट होता है ॥३४॥ अब नक्षत्र गोचर का अन्य प्रकार बतलाते हैं : जन्मकालीन चन्द्र नक्षत्र से गिनने पर गोचर द्वारा भिन्न-भिन्न नक्षत्रों में सूर्य के भ्रमण को काल पुरुष के भिन्न-भिन्न अंगों में भ्रमण माना गया है। इसका विवरण निम्नलिखित है । (क) प्रथम नक्षत्र में चेहरे पर । (ख) २, ३, ४ और ५वें नक्षत्र में सिर में, (ग) ६, ७, ८, ९ में छाती। (घ) १०, ११, १२, १३ दाहिनी बाहु ।
छब्बीसवाँ अध्याय : गोचरफल ६४७ वक्त्रे क्ष्मा मूर्ध्नि चत्वार्यु रसि च चतुरः सव्यहस्ते चतुष्कं पादे षड्वामहस्ते चतुरथ नयने द्वौ च गुह्ये द्वयं च । भानुर्नाशं विभूति विजयमथ धनं निर्धनं देहपीडां लाभं मृत्युं च चक्रे जनयति विविधान् जन्मभाद्देहसंस्थः ॥३५॥ (ङ) १४, १५, १६, १७, १८ तथा १९वें नक्षत्र में दोनों पैर । (च) २०, २१, २२, २३वें नक्षत्र ने बाँयी बाँह में । (छ) २४ तथा २५वें नक्षत्र में दोनों नेत्रों में । (ज) २६ तथा २७वें नक्षत्र में गुह्य अंग में भ्रमण करता है। इनका प्रभाव क्रमशः निम्नलिखित है। (क) नाश, (ख) विभूति, (ग) विजय, (घ) धन, (ङ) निर्धनता, (च) देहपीड़ा, (छ) लाभ और (ज) मृत्यु ॥ ३५ ॥ शीतांशोर्वदने द्वयोरतिभयं क्षेमं शिरस्यम्बुधौ पृष्ठे शत्रुजयं द्वयोर्नयनयोर्नेत्रे धनं जन्मभात् । पञ्चस्वात्मसुखं हृदि त्रिषु करे वामे विरोधं क्रमात् पादौ षट्सु विदेशतां जनयति त्रिष्वर्थलाभं करे ॥३६॥ जिस प्रकार विविध नक्षत्रों में सूर्य के भ्रमण का फल ऊपर बताया गया है । उसी प्रकार चन्द्रमा का २७ नक्षत्र में गोचर फल बताया जाता है । जन्मकालीन चन्द्र नक्षत्र से गिनने पर (क) १ और २ में—चेहरे में—इसका फल अत्यन्त भय । (ख) ३, ४, ५ और ६ नक्षत्र में—सिर में—फल क्षेम । (ग) ७ और ८ में—पीठ में—फल शत्रुओं पर जय । (घ) ९ और १० में—दोनों नेत्रों में—धनागम होता है । (ङ) ११, १२, १३, १४, १५—हृदय में—फल आत्मसुख ।
६४८ फलदीपिका। (च) १६, १७, १८ में—बायें हाथ में—झगड़ा। (छ) १९, २०, २१, २२, २३ और २४ में—दोनों पैरों में—यात्रा। (ज) २५, २६, २७वें में—दाहिने हाथ में—इसका फल अर्थ लाभ है ॥३६॥ वक्त्रे द्वे मरणं करोत्यवनिर्जः षट् पादयोर्विग्रहं क्रोडे त्रीणि जयं चतुर्विधनतां वामे करे मस्तके। द्वे लाभं चतुराननेऽधिकभयं क्षेमंकरे दक्षिणे वार्द्धिर्द्वे नयने विदेशगमनं चक्रे स्वजन्मर्क्षतः ॥३७॥ अब मंगल का नक्षत्र पुरुष के किस अंग में कब भ्रमण समझना चाहिए यह बताया जाता है। जन्मकालीन चन्द्र नक्षत्र से गिनने पर (क) १ और २ नक्षत्र में—चेहरे में—इसका फल मृत्यु। (ख) ३, ४, ५, ६, ७, ८ में दोनों पैरों में—फल झगड़ा। (ग) ९, १०, ११ में—गोद में—इसका फल जय। (घ) १२, १३, १४, १५—बायें हाथ में—फल निर्धनता। (ङ) १६, १७—सिर में—फल लाभ। (च) १८, १९, २०, २१—चेहरे में—फल अत्यन्त भय। (छ) २२, २३, २४, २५ दाहिने हाथ में—फल क्षेम। (ज) २६, २७ नक्षत्रों में—विदेश गमन ॥३७॥ मूर्ध्नि त्रीणि मुखे त्रयं च करयोः षट् पञ्च कुक्षौ तथा लिङ्गे द्वे द्विचतुष्टयं चरणयोः प्राप्तेऽमरेन्द्रार्चितः। शोकं लाभमनर्थमर्थनिचयं नाशं प्रतिष्ठां तथा दद्यादात्मदिनात्तथैव भृगुजस्तद्वद्बुधोऽपि क्रमात् ॥३८॥ अब बुध, बृहस्पति और शुक्र का नक्षत्र पुरुष के विविध अंगों में भ्रमण का विवरण और फल बताया जाता है। बुध, बृहस्पति और
छब्बीसवां अध्याय : गोचरफल ६४९ शुक्र तीनों का एक ही क्रम और एक ही फल है । इस कारण एक साथ बताया जाता है । जन्मकालीन चन्द्र नक्षत्र से गिनने से । .(क) १, २, ३ नक्षत्रों में सिर में—फल-शोक । (ख) ४, ५, ६ नक्षत्र में चेहरे में-फल—लाभ । (ग) ७, ८, ९, १०, ११, १२ नक्षत्रों में-दोनों हाथों में-फल अनर्थ । (घ) १३, १४, १५, १६, १७ में कुक्षि में –फल-धन लाभ । (ङ) १८, १९ चक्षत्र में गुह्य स्थान में –फल-नाश । (च) २०, २१, २२, २३, २४ २५ २६ २७ नक्षत्र में-दोनों पैरों में-फल-प्रतिष्ठा ॥३८॥ ' भूवेदवह्निगुणवेदशराग्निनेत्र- दस्रं च वक्त्रकरपादपदेषु हस्ते । कुक्षौ च मूर्ध्नि नयनद्वयपृष्ठभागे न्यस्य क्रमेण शनिसंयुतभान्निजर्क्षात्॥३९॥ दुःखं च सौख्यं गमनं च नाशं लाभं स्वभोगं सुखसौख्यमृत्यून् । वक्त्रक्रमादाह फलानि मन्द- स्यैवं तमःखेचरयोर्वदन्तु ॥४०॥ अब शनि, राहु और केतु के नक्षत्र पुरुष के विविध अंगों में भ्रमण का फल बताया जाता है। तीनों का फल एक सा है। इस कारण एक साथ बताया जाता है। जन्मकालीन चन्द्र नक्षत्र से गिनने पर शनि, राहु या केतु :
६५० फलदीपिका (क) १ नक्षत्र में हो तो चेहरे में—इसका फल दुःख। (ख) २, ३, ४, ५ नक्षत्र में हो तो दाहिने हाथ में—फल-सौख्य। (ग) ६, ७, ८ नक्षत्र में हो तो दाहिने पैर में—फल-गमन। (घ) ९, १०, ११ नक्षत्र में हो तो बायें टाँग में—फल-नाश। (ङ) १२, १३, १४, १५ नक्षत्र में हो तो बायें हाथ में—फल लाभ। (च) १६, १७, १८, १९, २० नक्षत्र में हो तो कुक्षि में—फल- स्वभोग। (छ) २१, २२, २३ नक्षत्र में-सिर में-फल-सुख। (ज) २४, २५ नक्षत्र में-नेत्रों में-फल-सौख्य। (झ) २६, २७ नक्षत्र में-पीठ में-फल-मृत्यु। अब गोचर का एक नया प्रकार बतलाते हैं ॥३९-४०॥ यत्राष्टवर्गेऽधिकबिन्दवः स्यु- स्तत्र स्थितो गोचरतो ग्रहेन्द्रः । तद्गतफलं प्राह शुभं व्ययारि- रन्ध्रस्थितो वाऽपि शुभं विधत्ते ॥४१॥ नक्षत्र गोचर विस्तारपूर्वक बताने पर भी पुनः अष्टक वर्ग गोचर की ओर ध्यान दिलाते हैं कि यदि किसी राशि में अष्टक वर्ग के अनुसार किसी ग्रह का गोचर शुभ हो तो—ऐसा ग्रह चाहे चन्द्र राशि से छठे, आठवें या बारहवें भी पड़ा हो,—इसका आशय यह है कि छठा, आठवाँ, बारहवाँ, अनिष्ट स्थान है किन्तु अष्टक वर्ग में अधिक शुभ बिन्दु (उत्तर भारत की संस्कृत पुस्तकों में इन्हें रेखा कहते हैं) पड़े हों—तो शुभ फल ही होता है—अशुभ फल नहीं होता।
छब्बीसवाँ अध्याय : गोचरफल ६५१ रवेर्द्वादशनक्षत्रं भूसुतस्य तृतीयकम् । गुरोः षट्तारकं चैव शनेरष्टमतारकम् ॥४२॥ एतेषां च पुरोलत्ता पृष्ठलत्ताः प्रकीर्त्तिताः । शुक्रस्य पञ्चमं तारं चन्द्रजस्य तु सप्तमम् ॥४३॥ राहोस्तु नवमं चैव द्वाविंशं भं हिमद्युतेः । ग्रहस्थितर्क्षाद्गणयेल्लत्तायां जन्मभे व्यथा ॥४४॥ रवेः सर्वार्थहानिः स्यात्तमसोर्दुःखमुच्यते । मरणं जीवलत्तायां बन्धुनाशो भयावहः ॥४५॥ शुक्रस्य कलहो भ्रंश अनर्थः शशिजस्य तु । चन्द्रस्य तु महाहानिर्लत्तामात्रफलं भवेत् ॥४६॥ सर्वत्र लत्तासाङ्कर्ये द्विगुणत्रिगुणादिकम् । वदेद्दोषफलं नॄणां ग्रहाल्लत्ताधिकक्रमात् ॥४७॥ जिस समय का गोचर फल विचार करना हो, उस समय (क) सूर्य जिस नक्षत्र में हो उससे १२वाँ नक्षत्र । (ख) मंगल जिस नक्षत्र में हो उससे तृतीय नक्षत्र । (ग) बृहस्पति जिस नक्षत्र में हो उससे छठा नक्षत्र । (घ) शनि जिस नक्षत्र में हो उससे आठवां नक्षत्र । यह सब पुरोलत्ता कहलाती हैं । इनमें आगे की ओर गिनते हैं । जैसे अश्विनी में सूर्य हो तो उत्तरा फाल्गुनी में पुरोलत्ता होती है ।
६५२ फलदीपिका (ङ) शुक्र जिस नक्षत्र में हो उससे उलटा गिनने से पाँचवां नक्षत्र । (च) बुध जिसमें हो उससे उलटा गिनने से सातवां नक्षत्र । (छ) राहु जिसमें हो उससे उलटा गिनने से नवाँ नक्षत्र ।,और (ज) चन्द्रमा जिसमें हो उससे उलटा गिनने से बाईसवां नक्षत्र पृष्ठलत्ता कहलाती हैं । जैसे, उलटा गिनने से अभिप्राय यह है कि अश्विनी में शुक्र हो तो शतभिषा में शुक्र की लत्ता हुई । यदि जन्म नक्षत्र पर लत्ता पड़े तो व्यथा होती है ॥४४॥ यदि सूर्य की लत्ता हो तो सब प्रकार की अर्थ हानि । राहु या केतु की लत्ता हो तो दुःख । बृहस्पति की लत्ता में मरण, बन्धु नाश और भय । शुक्र की लत्ता में कलह । बुध की लत्ता में स्थान हानि- अनर्थ । चन्द्र की लत्ता में महाहानि । यह भिन्न-भिन्न ग्रहों के लत्ता फल बताये गये हैं ॥४५-४६॥ ऊपर जो लत्ता के अशुभ फल बताये गये हैं वह—एक ही ग्रह की लत्ता पड़े तो साधारण अशुभ फल कारक होता है । किंतु यदि दो या अधिक अशुभ ग्रहों की लत्ता एक साथ पड़ें तो अशुभता की बहुत वृद्धि हो जायगी और जितनी अधिक ग्रहों की लत्ता एक साथ जन्म नक्षत्र पर पड़े उतना ही अधिक अशुभ फल कहना चाहिए ॥४७॥ सर्वतोभद्र चक्र विचार अब गोचर देखने का एक नया प्रकार बताया जाता है:- अब नीचे सर्वतोभद्र चक्र दिया जाता है । इस सर्वतोभद्र चक्र में (i) स्वर (ii) नक्षत्र (iii ) नामाक्षर (iv) राशि (v) तिथि तथा (vi) ग्रहों का विन्यास किया गया है। क्रम इस प्रकार है ।
छब्बीसवाँ अध्याय : गोचरफल ६५३ पूर्व । घ ङ छ । ईशान आग्नेय ┌─────┬────┬────┬────┬───────────┬────┬─────┬────┬────┐ │ अ │ कृ │ रो │ मृ │ आ │ पु │ पु │ आ │ आ │ ├─────┼────┼────┼────┼───────────┼────┼─────┼────┼────┤ │ भ │ उ │ अ │ व │ क │ ह │ ङ │ ऊ │ म. │ ├─────┼────┼────┼────┼───────────┼────┼─────┼────┼────┤ │ अ │ ल │ लृ │वृष │ मिथुन │कर्क│ लृ │ म │ पू.│ ├─────┼────┼────┼────┼───────────┼────┼─────┼────┼────┤ │ रे │ च │ मं.│ ओ │सू. नन्दा मं│ ओ │ सि. │ ट │ उ │ ┌────┐
६५४ फलदीपिका (i) स्वर ईशान कोण आग्नेय कोण नैऋत्य कोण तथा वायव्य कोण में अ, आ, इ, ई रखे गये। फिर इसी क्रम से इन कोणों में उ, ऊ, ऋ, ॠ रखे गए। इसके बाद इसी क्रम से चारो कोणों में ऌ, ॡ, ए, ऐ रखे गए। और अन्दर के चारो कोनों (कोणों) में बाकी के चार स्वर ओ, औ, अं, अः रखे गये हैं। इस प्रकार इन १६ स्वरों का विन्यास क्रमपूर्वक है। (ii) नक्षत्र ऊपर प्रथम पंक्ति (लाइन) में कृत्तिका से प्रारंभ कर चारों ओर २८ नक्षत्र (२७ प्रसिद्ध नक्षत्र और एक अभिजित्) लिखे गये हैं। (iii) नक्षत्रों के नीचे अ ब क ह ड म ट प र त न य भ ज ख ग श द च ल यह २० वर्ण लिखे हैं। ऊपर अ, आ, इ, ई इस क्रम में जो "अ" आया है वह स्वर का बोधक है। और अ ब क ह ड इस क्रम में जो अ आया है वह नामाक्षर का बोधक है। पंचांगों में २७ नक्षत्रों के १०८ चरण के आगे १०८ अक्षर लिखे रहते हैं जो पहले दिये गये हैं। जैसे किसी का अश्विनी नक्षत्र के प्रथम चरण में जन्म हुआ हो तो उसके जन्म नाम का पहला अक्षर 'चू' से शुरू होना चाहिये। प्रायः प्रत्येक नक्षत्र की मात्रा दी गई है-जैसे च, ची, चू, चे, चो, ख ज की केवल दो मात्रा हैं 'ज' और 'जी'। 'ख' की चार मात्रा है—खी खू खे खो (देखिये मकर राशि के नामाक्षरों की सूची।) इसका कारण क्या है ? इसका कारण यह है कि श्रवण के बाद अभिजित् नक्षत्र की भी गणना होती है। जब मेष लग्न पूर्व दिशा में उदित हो तो आकाश में पृथ्वी के ऊपर (दशम भाव में) अभिजित् नक्षत्र होता था। इसी कारण मध्याह्न (ठीक दोपहर के काल को—समय को, अभिजित् काल या अभिजित् मुहूर्त कहते हैं) यदि इस अभिजित् की नामाक्षरों में गणना की जावे तो इसके चारों चरणों के नामाक्षर होंगे जू जे जो ख। इस प्रकार
छब्बीसवाँ अध्याय : गोचरफल ६५५ 'ज' और 'ख' की भी पांच-पांच मात्रा नक्षत्र नामों में आ जावेंगी । अस्तु, अब जो विषय चल रहा है उस पर आइये । कहीं केवल एक ही अक्षर (केवल अ की मात्रा वाला) दिया गया है जैसे घ, ङ, छ, ष, ण, ठ थ, फ, ढ़, थ, त, झ, ञ यह किस सिद्धान्त पर किया गया है यह ज्ञात नहीं। हमारे ऋषि प्रणीत शास्त्रों में बिना सिद्धान्त के कोई नियम नहीं बनाया गया है परन्तु बहुत से विषयों का सिद्धान्त क्या है यह मालूम नहीं पड़ता यथा शुक्र की महादशा के २० वर्ष, सूर्य की महादशा के ६ वर्ष ही क्यों ? अस्तु इस सर्वतोभद्रचक्र में अब कहड आदि २० अक्षर तो भीतर लिखे गये हैं और १२ अक्षर घङछ आदि बाहर लिखे गये हैं। अश्विन्यादि २७ नक्षत्रों के नामाक्षर की जो सूची पहिले दी गई है उसमें कृत्तिका नक्षत्र से प्रारम्भ करने से निम्नलिखित अक्षर आते हैं:- अ, ब, क घ ङ छ ह, ड, म ट प ष ण ठ र, त, न य भ घ फ ढ ज ख ग स द थ झ ञ च ल इनमें से रेखांकित शब्दों को एक साथ रखिये तो अ ब क ह ड म ट पर त न य भ ज ख ग स द च ल यह अक्षरब नते हैं । इन्हीं बीस अक्षरों को सर्वतोभद्र चक्र में अन्दर रक्खा गया है । व में ब भी शामिल समझना चाहिए । अर्थात् यदि 'व' से जिसका नाम शुरू होता है (जैसे विद्याभूषण) उसका भी विचार 'ब' वाले कोष्ठ से ही होगा । श और स दोनों का एक कोष्ठ (खाने) से । (iv) वृष, मिथुन, कर्क इस क्रम से १२ राशियां अन्दर चारों ओर लिखी है । पहिले कृत्तिका नक्षत्र से गणना प्रारम्भ करते थे इस कारण (कृत्तिका का तीन चौथाई भाग वृष राशि में पड़ता है) वृष राशि से प्रारम्भ कर राशियां स्थापित की गई हैं ।
६५६ फलदीपिका (v) इसके अन्दर के दायरे में (खानों या कोष्ठों में) तिथियाँ और वार रखे गये हैं। नन्दा, भद्रा, जया, रिक्ता और पूर्णा-यह तिथियों के पांच विभाग हैं। नन्दाः--प्रतिपद् (पड़वा) षष्ठी (छठ) एकादशी भद्राः--द्वितीया (दोज) सप्तमी द्वादशी जयाः--तृतीया (तीज) अष्टमी त्रयोदशी रिक्ताः--चतुर्थी (चौथ) नवमी चतुर्दशी पूर्णाः-पंचमी दशमी पूर्णिमा या अमावास्या (vi) सूर्यवार, चन्द्रवार, मंगलवार आदि सातों वार भी सर्वतो भद्र चक्र में स्थापित हैं। इसे सर्वतोभद्र चक्र क्यों कहते हैं क्योंकि चारों ओर से एक सा होता है। जो मकान चारों ओर से एक सा हो और मकान के चारों ओर पूर्व पश्चिम, उत्तर, दक्षिण में मध्य में-मुख्य द्वार हों उन्हें सर्वतोभद्र आकार का मकान कहते हैं। चारों दिशा में क्रमशः घ ङ छ, ष ण ठ ध फ ढ, थ झ ञ लिखे हैं। आर्द्रा नक्षत्र के नामाक्षर घङछ हैं इस लिये इन अक्षरों को आर्द्रा नक्षत्र के ऊपर लिखा है। देखिये पृष्ठ ६५३। इसी प्रकार हस्त के नीचे ष ण ठ। इसी प्रकार पूर्वाषाढ के नीचे ध फ ढ और उत्तरा भाद्र के बगल में थ झ ञ। स्वस्तिक या सर्वतोभद्र चक्र चारो ओर से एक सा होता है। अब सर्वतोभद्र चक्र से शुभाशुभ विचार कैसे करना यह बताया जाता है। नियम १. (i) शनि, सूर्य केतु, मंगल पाप ग्रह हैं। बाकी के शुभ ग्रह हैं। (ii) यदि क्रूर ग्रहों के साथ बुध हो तो, बुध भी पाप ग्रह समझा जाता है। (iii) क्षीण चन्द्र पाप है।
छब्बीसवां अध्याय : गोचरफल ६५७ २. गोचरवश पहले यह निश्चय कीजिये कि किस ग्रह का शुभा- शुभ आपको विचार करना है । मान लीजिये शनि का गोचर विचार करना है। अब गोचर के समय (अर्थात् जिस समय का विचार करता है । उस समय) शनि किस नक्षत्र में है यह देखिये । किसी भी नक्षत्र में ग्रह हो वह तीन प्रकार से वेध करता है : (i) वाम दृष्टि से । (ii) दक्षिण दृष्टि से (iii) सम्मुख दृष्टि से (i) जब ग्रह वक्र होता है तब उसकी दक्षिण दृष्टि होती है । (ii) जब ग्रह 'शीघ्र' हो तो--अपनी स्वाभाविक गति (चाल) से जल्दी चल रहा हो तो--वाम दृष्टि होती है । (iii) जब साधारण चाल से या मध्य गति से चल रहे हों तो सम्मुख दृष्टि होती है । ३. (i) किसी नक्षत्र में स्थिति ग्रह—वाम दृष्टि से वेध करता है तो नक्षत्र, स्वर, वर्ण (अक्षर) आदि का वेध करता है । (ii) इसी प्रकार किसी नक्षत्र में स्थित ग्रह दक्षिण दृष्टि से नक्षत्र, स्वर, वर्ण (अक्षर) आदि का वेध करता है । (iii) किन्तु सम्मुख दृष्टि से नक्षत्र का वेध करता है । स्वर, वर्ण आदि का नहीं करता । ४. (i) उदाहरण के लिए मान लीजिये शनि रोहिणी में है तो ब (अक्षर), मिथुन राशि, औ (स्वर), कन्या (राशि) र (अक्षर) स्वाति (नक्षत्र) को वेध करता है । (ii) 'उ' स्वर, तथा अश्विनी (नक्षत्र) को वेध करता है । (iii) यदि मध्य गति (साधारण चाल) हुई तो सम्मुख दृष्टि से केवल अभिजित् (नक्षत्र) का वेध करेगा ।
६५८ फलदीपिका दूसरा उदाहरण लीजिये : यदि ग्रह (जिसका गोचर से विचार करना है) कृत्तिका नक्षत्र में है तो (i) दृष्टि से अ (अक्षर) वृष राशि, नन्दा तिथि (पड़वा, छठ, एकादशी) सूर्य और मंगल ग्रहों को, भद्रा (दोज, सप्तमी तथा द्वादशी) तिथियों को, तुला राशि, 'त' अक्षर, विशाखा नक्षत्र को वेध करता है। (ii) दृष्टि से भरणी नक्षत्र का वेध करता है । (iii) सम्मुख दृष्टि से श्रवण नक्षत्र का वेध करता है । ५. (i) सूर्य और चन्द्र की सदैव वाम दृष्टि होती है । (ii) राहु और केतु की सदैव दक्षिण दृष्टि होती है । (iii) बाकी पाँच ग्रहों की—मंगल, बुध, बृहस्पति, शुक्र, शनि, की सम्मुख, वाम, दक्षिण-भिन्न-भिन्न समय--इन तीनों दृष्टियों में से एक दृष्टि होती है। जैसा ऊपर नियम २ में बताया गया है। कुछ विद्वानों का मत है कि सूर्य, चन्द्र, राहु और केतु, इनकी सदैव तीनों प्रकार की दृष्टि होती है—वाम, दक्षिण और सम्मुख, परन्तु हमारे विचार से सूर्य चन्द्र की सदैव वाम और राहु केतु की सदैव दक्षिण दृष्टि होती है । ६. (i) जब क्रूर ग्रह वक्री होते हैं तो वह महाक्रूर फल दिखाते हैं । (ii) जब शुभ ग्रह वक्री होते हैं तो अत्यन्त शुभ फल दिखाते हैं। (iii) यदि शुभ ग्रह वक्री हों तो राज्य प्रदान सदृश अत्यन्त शुभ फल करते हैं (iv) यदि पाप ग्रह वक्री हों तो, जातक (जिसकी जन्म कुण्डली का विचार करना हो) को अनेक कष्टों में डालते हैं और वह व्यर्थ में मारा-मारा फिरता है— परिश्रम भी होता है—सफलता भी हाथ नहीं आती ।
छब्बीसवाँ अध्याय : गोचरफल ६५९ ७. (i) जब 'क' अक्षर का वेध हो तब 'घ, ङ छ' का भी वेध होता है। (ii) जब 'प' अक्षर का वेध हो तो 'ष, ण ठ' इन अक्षरों का भी वेध होता है। (iii) जब 'भ' (अक्षर) का वेध हो तब 'ध, फ, ढ' इन वर्णों (अक्षरों) का भी वेध होता है। (iv) जब 'द' (अक्षर) का वेध हो तो 'थ, झ, ञ' इनका भी वेध समझना। ८. (i) 'व' का वेध हो तो 'ब' का 'ब' का वेध हो तो व का भी वेध समझना चाहिये। (ii) 'स' का वेध ही तो 'श' का 'श' का हो तो 'स' भी समझना (iii) 'ख' का वेध हो तो ष का, ष का हो तो ख का भी वेध होता है (iv) 'य' का वेध हो तो ज का 'ज' का हो तो 'य' का भी समझना (v) 'न' का वेध हो तो ण का, 'ण' का हो तो 'न' का भी होता है। ९. (i) अ, आ इन दोनों स्वरों में एक का वेध हो तो दूसरे का भी होता है (ii) इ, ई " " " (iii) उ, ऊ " " " (iv) ऋ, ॠ " " " (v) ऌ, ॡ " " " (vi) ए, ऐ " " "
६६० फलदीपिका (vii) ओ, औ इन दोनों स्वरों में एक का बोध हो तो दूसरे का भी होता है (viii) अ का वेध हो तो अं, अः का भी वेध होता है । १०. (i) जब कोई ग्रह भरणी नक्षत्र के चतुर्थ चरण में या कृत्तिका के प्रथम चरण में हो तो, अ, उ, लृ, ओ इन स्वरों का वेध करता है । (ii) जब कोई ग्रह आश्लेषा के अन्तिम चरण में या मघा के प्रथम चरण में हो तो आ, ऊ, लॄ, औ इन स्वरों का वेध करता है । (iii) जब कोई ग्रह विशाखा के चतुर्थ चरण या अनुराधा के प्रथम चरण में हो तो 'इ, ऋ, ए, अं--इन स्वरों का वेध करता है । (iv) जब कोई ग्रह श्रवण के अन्तिम चरण में हो तो ई, ॠ, ऐ तथा अः--इन स्वरों का वेध करता है । (v) ऊपर की चारों स्थितियों में कोई सी हालत हो--पूर्णा तिथि (पंचमी, दशमी, पूर्णिमा, अमावस्या) इनका वेध होता है । ११. अब जिस व्यक्ति का शुभाशुभ सर्वतोभद्र से विचार करना है उसका (i) नाम का (प्रसिद्ध नाम का) प्रथम अक्षर (ii) स्वर (iii) जन्म नक्षत्र (iv) जन्म तिथि तथा (v) जन्म राशि एक काग़ज़ पर नोट कीजिये । ऊपर जो जन्म के नाम का प्रथम अक्षर, जन्म नक्षत्र, जन्म की तिथि तथा जन्म राशि को नोट करना बताया गया है, सो इन चारों से तो पाठक अच्छी तरह परिचित हैं--इस कारण इनको समझाने की आवश्यकता नहीं । किन्तु "स्वर' को समझाने की आवश्यकता है ।
छब्बीसवां अध्याय : गोचरफल ६६१ वर्ण स्वर मालूम करने का निम्नलिखित प्रकार है : वर्ण स्वरचक्र | क | छ | ड | ध | भ | व | इनका वर्ण स्वर 'अ' | | ख | ज | ढ | न | म | श | इनका वर्ण स्वर 'इ' | | ग | झ | त | प | य | ष | इनका वर्ण स्वर उ | | घ | ट | थ | फ | र | स | इनका वर्ण स्वर ए | | च | ठ | द | ब | ल | ह | इनका वर्ण स्वर ओ | यद्यपि (i) ब और व, (ii) श और स (iii) प और ख इनका वर्ण स्वर ऊपर के चक्र में अलग-अलग है लेकिन दोनों में से (जैसे ब और व) के एक का वर्ण स्वर विद्ध हो तो दूसरे का भी समझना चाहिये । ‘क’ से ‘ह’ तक ३३ व्यंजन होते हैं। यहाँ चक्र में व्यञ्जन सिर्फ ३० ही दिये गये हैं । ङ, ञ, ण नहीं दिये गये हैं क्योंकि प्रायः इन अक्षरों से कोई नाम शुरू नहीं होता । यदि ङ, ञ, ण, इनका वर्ण स्वर ज्ञात करना हो तो ङ का 'उ', ञ का 'इ', तथा ण का 'अ' वर्ण स्वर होता है । १२. (i) अब वेध का फल बताते हैं। ऊपर जन्म नक्षत्र, जन्म राशि, जन्म तिथि, नाम का प्रथम अक्षर, नाम के प्रथम अक्षर का वर्ण स्वर यह जो पांच बताये गये हैं उनमें (i) यदि एक का क्रूर वेध हो तो उद्वेग (चिन्ता, परेशानी) (ii) दो का क्रूर वेध हो तो भय (iii) तीन
६६२ फलदीपिका का क्रूर वेध हो तो हानि (घाटा, नुकसान) (iv) चार का क्रूर वेध हो तो रोग (बीमारी) (v) पांचों का क्रूर वेध हो तो मृत्यु । यदि जन्म राशि—शनि, मंगल, राहु, केतु, सूर्य इन पांचों से वेध में आवे तो भी मृत्यु या मृत्यु सदृश कष्ट होता है । (ii) जैसे पाप ग्रहों से वेध का ऊपर कष्ट फल बताया गया है उसी प्रकार शुभ ग्रहों के वेध से शुभ फल होता है । जितने अधिक (जन्म नक्षत्र, जन्म राशि आदि का) का जितने अधिक शुभ ग्रह (बृहस्पति आदि) से वेध होगा उतना ही अधिक शुभ फल होगा । (iii) पाप ग्रह और शुभ ग्रह दोनों वेध करते हों तो तार- तम्य करके फल कहना चाहिये । पापग्रह का वेध १३. (i) साधारणतः जन्म नक्षत्र का वेध होने से भ्रम (इधर उधर भटकना या मन के विचारों में ऊल जलूल व्यव- स्था होना) नामक्षर के वेध से हानि, स्वर वेध होने से हानि, तिथि वेध होने से भय और जन्म राशि के वेध होने से महाविघ्न—पांचों का एक साथ वेध हो तो जातक ज़िन्दा नहीं रहता । (ii) अब युद्ध के समय (अर्थात् जिस आदमी का शुभा-शुभ विचार कर रहे हैं वह लड़ाई के मैदान में शस्त्र मेंलड़ रहा हो) तो एक) जन्म नाम, जन्म नक्षत्र आदि) के वेध से भय, दो के वेध से धन-क्षय (यदि मुकदमा लड़ रहा हो)
छब्बीसवाँ अध्याय : गोचरफल ६६३ तीन के वेध से भंग (हाथ पैर टूटना) चार के वेध से मृत्यु । १४. (i) सूर्य के वेध से मनस्ताप (चिन्ता, परेशानी) । (ii) मंगल ,, द्रव्य-हानि (रुपये की हानि) । (iii) शनि ,, रोग और पीड़ा । (iv) राहु या केतु के वेध से विघ्न (रुकावट, अड़चन आपत्ति) (v) चन्द्रमा के वेध से मिला-जुला फल अर्थात् क्षीण चन्द्र के वेध से अनिष्ट फल, बलवान् चन्द्रमा के वेध से शुभ फल । (vi) शुक्र के वेध से—आदमियों की कुण्डलियों में स्त्रियों से सहवास, रति, स्त्रियों की कुंडलियों में रति-दोनों की कुण्डलियों में वस्त्र, आभूषण आदि सुन्दर प्रिय वस्तु प्राप्ति । (vii) बुध का वेध होने से बुद्धि अच्छी हो, नये विचार सूझें, ज्ञान की वृद्धि हो, वार्तालाप में सफलता-ख़ुशी देने वाले पत्र या समाचार आवें । (viii) बृहस्पति के वेध से सब शुभ फल । १५. (i) यदि ग्रह वेध के समय वक्री हो तो दुगुना फल देता है । पाप ग्रह हो तो दुगुना कष्ट । शुभ ग्रह हो तो दुगुना लाभ या प्रसन्नता । (ii) यदि ग्रह वेध के समय अपनी उच्च राशि में हो तो तिगुना फल (iii) सामान्य राशि में हो तो सामान्य फल। (iv) नीच राशि में हो तो आधा फल ।
६६४ फलदीपिका मुहूर्त के समय 'वेध' देखना चाहिये १६. (१) जो तिथि, राशि, नवांश, या नक्षत्र पाप ग्रह से वेध किये जा रहे हों—उनको शुभ कार्य प्रारंभ के समय नहीं लेना। उदाहरण के लिये अष्टमी तिथि का वेध (पाप ग्रह) से हो रहा है तो कोई नवीन कार्य अष्टमी को प्रारंभ न करना। (२) ऐसे समय जो बीमार पड़ता है जल्दी अच्छा नहीं होता। विवाह करता है तो वैवाहिक सुख नहीं होता। यात्रा करता है तो यात्रा सफल नहीं होती। (३) यदि जन्म का वार विद्ध हो (देखिये सर्वतो भद्र चक्र में तिथियों के कोष्ठों में सू. च. मं आदि लिखे हैं—उन से उन-उन ग्रहों के वार समझना) तो उस वार को मन को खुशी नहीं होती, पीड़ा होती है। १७. अस्त दिशा (i) पूर्व की वृष, मिथुन, कर्क राशि है। जब इन तीनों राशियों में से किसी में सूर्य हो तब पूर्व दिशा को अस्त समझना। ईशान कोण में जो स्वर हैं—अर्थात् अ, उ लृ ओ—यह भी अस्त समझना। (ii) दक्षिण की ओर सिंह, कन्या और तुला राशियाँ हैं। जब इन में से किसी राशि में सूर्य हो तो दक्षिण दिशा को अस्त समझना। आ, ऊ लृ और औ—यह जो चार स्वर हैं इनको अस्त मानिये। (iii) पश्चिम दिशा की ओर वृश्चिक, धन, मकर राशियाँ हैं। जब इनमें से किसी में सूर्य हो तो इन दिशाओं
छब्बीसवां अध्याय : गोचरफल ६६५ को तथा नैऋत्य कोण के स्वर-इ, ऋ, ए, अं—इन को अस्त कहा जाता है। (iv) उत्तर दिशा में कुंभ, मीन मेष यह राशियां है तथा वायव्य कोण के चार स्वर, ई, ॠ, ऐ और अः यह उस समय अस्त माने जाते हैं जब कुंभ, मीन मेष इन तीन राशियों में से किसी में सूर्य हो। (v) जो राशियाँ अस्त हों उनकी दिशा के नक्षत्र, स्वर, वर्ण, तिथि सब अस्त समझी जावेंगी। (vi) यदि किसी का नामाक्षर, स्वर, जन्म नक्षत्र, जन्म राशि तिथि सब अस्त हों तो- नक्षत्र के अस्त होने से रोग, वर्ण (नामाक्षर) के अस्त होने से हानि, स्वर के अस्त होने से शोक, राशि के अस्त होने से विघ्न, तिथि के अस्त होने से भय होता है। (vii) अस्त दिशा की ओर यात्रा नहीं करनी चाहिये। उस दिशा में मकान का दरवाजा न बनवाये । (vii) जब नामाक्षर अस्त हो तो कार्य में प्रायः सफलता नहीं मिलती । (viii) जन्म नक्षत्र उदित हो जावे अर्थात् 'अस्त' दोष न रहे तो पुष्टि, वर्ण नामाक्षर उदित हो तो लाभ, स्वर उदित हो तो सुख, जन्म राशि उदित हो तो जय, जन्म तिथि उदित हो तो तेज । पांचों उदित हों तो नवीन पद प्राप्ति । उपग्रहों के विचार स सर्वतोभद्र विचार में तारतम्य सूर्य विचार १८. सूर्य (गोचर के समय) जिस नक्षत्र में हो उस से (i) पाँचवां नक्षत्र 'विद्युन्मुख'