फलदीपिका (मन्त्रेश्वर दैवज्ञ - सम्पूर्ण २८ अध्याय, भाव-विचार, दशा-फल एवं गोचर सटीक)
Phaladeepika of Mantreshwara Daivajna with Commentary
मन्त्रेश्वर दैवज्ञ (टीकाकार: पं. सूर्यनारायण व्यास) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंछब्बीसवाँ अध्याय : गोचरफल ६४७ वक्त्रे क्ष्मा मूर्ध्नि चत्वार्यु रसि च चतुरः सव्यहस्ते चतुष्कं पादे षड्वामहस्ते चतुरथ नयने द्वौ च गुह्ये द्वयं च । भानुर्नाशं विभूति विजयमथ धनं निर्धनं देहपीडां लाभं मृत्युं च चक्रे जनयति विविधान् जन्मभाद्देहसंस्थः ॥३५॥ (ङ) १४, १५, १६, १७, १८ तथा १९वें नक्षत्र में दोनों पैर । (च) २०, २१, २२, २३वें नक्षत्र ने बाँयी बाँह में । (छ) २४ तथा २५वें नक्षत्र में दोनों नेत्रों में । (ज) २६ तथा २७वें नक्षत्र में गुह्य अंग में भ्रमण करता है। इनका प्रभाव क्रमशः निम्नलिखित है। (क) नाश, (ख) विभूति, (ग) विजय, (घ) धन, (ङ) निर्धनता, (च) देहपीड़ा, (छ) लाभ और (ज) मृत्यु ॥ ३५ ॥ शीतांशोर्वदने द्वयोरतिभयं क्षेमं शिरस्यम्बुधौ पृष्ठे शत्रुजयं द्वयोर्नयनयोर्नेत्रे धनं जन्मभात् । पञ्चस्वात्मसुखं हृदि त्रिषु करे वामे विरोधं क्रमात् पादौ षट्सु विदेशतां जनयति त्रिष्वर्थलाभं करे ॥३६॥ जिस प्रकार विविध नक्षत्रों में सूर्य के भ्रमण का फल ऊपर बताया गया है । उसी प्रकार चन्द्रमा का २७ नक्षत्र में गोचर फल बताया जाता है । जन्मकालीन चन्द्र नक्षत्र से गिनने पर (क) १ और २ में—चेहरे में—इसका फल अत्यन्त भय । (ख) ३, ४, ५ और ६ नक्षत्र में—सिर में—फल क्षेम । (ग) ७ और ८ में—पीठ में—फल शत्रुओं पर जय । (घ) ९ और १० में—दोनों नेत्रों में—धनागम होता है । (ङ) ११, १२, १३, १४, १५—हृदय में—फल आत्मसुख ।