फलदीपिका (मन्त्रेश्वर दैवज्ञ - सम्पूर्ण २८ अध्याय, भाव-विचार, दशा-फल एवं गोचर सटीक)
Phaladeepika of Mantreshwara Daivajna with Commentary
मन्त्रेश्वर दैवज्ञ (टीकाकार: पं. सूर्यनारायण व्यास) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें६४८ फलदीपिका। (च) १६, १७, १८ में—बायें हाथ में—झगड़ा। (छ) १९, २०, २१, २२, २३ और २४ में—दोनों पैरों में—यात्रा। (ज) २५, २६, २७वें में—दाहिने हाथ में—इसका फल अर्थ लाभ है ॥३६॥ वक्त्रे द्वे मरणं करोत्यवनिर्जः षट् पादयोर्विग्रहं क्रोडे त्रीणि जयं चतुर्विधनतां वामे करे मस्तके। द्वे लाभं चतुराननेऽधिकभयं क्षेमंकरे दक्षिणे वार्द्धिर्द्वे नयने विदेशगमनं चक्रे स्वजन्मर्क्षतः ॥३७॥ अब मंगल का नक्षत्र पुरुष के किस अंग में कब भ्रमण समझना चाहिए यह बताया जाता है। जन्मकालीन चन्द्र नक्षत्र से गिनने पर (क) १ और २ नक्षत्र में—चेहरे में—इसका फल मृत्यु। (ख) ३, ४, ५, ६, ७, ८ में दोनों पैरों में—फल झगड़ा। (ग) ९, १०, ११ में—गोद में—इसका फल जय। (घ) १२, १३, १४, १५—बायें हाथ में—फल निर्धनता। (ङ) १६, १७—सिर में—फल लाभ। (च) १८, १९, २०, २१—चेहरे में—फल अत्यन्त भय। (छ) २२, २३, २४, २५ दाहिने हाथ में—फल क्षेम। (ज) २६, २७ नक्षत्रों में—विदेश गमन ॥३७॥ मूर्ध्नि त्रीणि मुखे त्रयं च करयोः षट् पञ्च कुक्षौ तथा लिङ्गे द्वे द्विचतुष्टयं चरणयोः प्राप्तेऽमरेन्द्रार्चितः। शोकं लाभमनर्थमर्थनिचयं नाशं प्रतिष्ठां तथा दद्यादात्मदिनात्तथैव भृगुजस्तद्वद्बुधोऽपि क्रमात् ॥३८॥ अब बुध, बृहस्पति और शुक्र का नक्षत्र पुरुष के विविध अंगों में भ्रमण का विवरण और फल बताया जाता है। बुध, बृहस्पति और