फलदीपिका (मन्त्रेश्वर दैवज्ञ - सम्पूर्ण २८ अध्याय, भाव-विचार, दशा-फल एवं गोचर सटीक)
Phaladeepika of Mantreshwara Daivajna with Commentary
मन्त्रेश्वर दैवज्ञ (टीकाकार: पं. सूर्यनारायण व्यास) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंछब्बीसवाँ अध्याय : गोचरफल ६५१ रवेर्द्वादशनक्षत्रं भूसुतस्य तृतीयकम् । गुरोः षट्तारकं चैव शनेरष्टमतारकम् ॥४२॥ एतेषां च पुरोलत्ता पृष्ठलत्ताः प्रकीर्त्तिताः । शुक्रस्य पञ्चमं तारं चन्द्रजस्य तु सप्तमम् ॥४३॥ राहोस्तु नवमं चैव द्वाविंशं भं हिमद्युतेः । ग्रहस्थितर्क्षाद्गणयेल्लत्तायां जन्मभे व्यथा ॥४४॥ रवेः सर्वार्थहानिः स्यात्तमसोर्दुःखमुच्यते । मरणं जीवलत्तायां बन्धुनाशो भयावहः ॥४५॥ शुक्रस्य कलहो भ्रंश अनर्थः शशिजस्य तु । चन्द्रस्य तु महाहानिर्लत्तामात्रफलं भवेत् ॥४६॥ सर्वत्र लत्तासाङ्कर्ये द्विगुणत्रिगुणादिकम् । वदेद्दोषफलं नॄणां ग्रहाल्लत्ताधिकक्रमात् ॥४७॥ जिस समय का गोचर फल विचार करना हो, उस समय (क) सूर्य जिस नक्षत्र में हो उससे १२वाँ नक्षत्र । (ख) मंगल जिस नक्षत्र में हो उससे तृतीय नक्षत्र । (ग) बृहस्पति जिस नक्षत्र में हो उससे छठा नक्षत्र । (घ) शनि जिस नक्षत्र में हो उससे आठवां नक्षत्र । यह सब पुरोलत्ता कहलाती हैं । इनमें आगे की ओर गिनते हैं । जैसे अश्विनी में सूर्य हो तो उत्तरा फाल्गुनी में पुरोलत्ता होती है ।