फलदीपिका (मन्त्रेश्वर दैवज्ञ - सम्पूर्ण २८ अध्याय, भाव-विचार, दशा-फल एवं गोचर सटीक)
Phaladeepika of Mantreshwara Daivajna with Commentary
मन्त्रेश्वर दैवज्ञ (टीकाकार: पं. सूर्यनारायण व्यास) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें६५० फलदीपिका (क) १ नक्षत्र में हो तो चेहरे में—इसका फल दुःख। (ख) २, ३, ४, ५ नक्षत्र में हो तो दाहिने हाथ में—फल-सौख्य। (ग) ६, ७, ८ नक्षत्र में हो तो दाहिने पैर में—फल-गमन। (घ) ९, १०, ११ नक्षत्र में हो तो बायें टाँग में—फल-नाश। (ङ) १२, १३, १४, १५ नक्षत्र में हो तो बायें हाथ में—फल लाभ। (च) १६, १७, १८, १९, २० नक्षत्र में हो तो कुक्षि में—फल- स्वभोग। (छ) २१, २२, २३ नक्षत्र में-सिर में-फल-सुख। (ज) २४, २५ नक्षत्र में-नेत्रों में-फल-सौख्य। (झ) २६, २७ नक्षत्र में-पीठ में-फल-मृत्यु। अब गोचर का एक नया प्रकार बतलाते हैं ॥३९-४०॥ यत्राष्टवर्गेऽधिकबिन्दवः स्यु- स्तत्र स्थितो गोचरतो ग्रहेन्द्रः । तद्गतफलं प्राह शुभं व्ययारि- रन्ध्रस्थितो वाऽपि शुभं विधत्ते ॥४१॥ नक्षत्र गोचर विस्तारपूर्वक बताने पर भी पुनः अष्टक वर्ग गोचर की ओर ध्यान दिलाते हैं कि यदि किसी राशि में अष्टक वर्ग के अनुसार किसी ग्रह का गोचर शुभ हो तो—ऐसा ग्रह चाहे चन्द्र राशि से छठे, आठवें या बारहवें भी पड़ा हो,—इसका आशय यह है कि छठा, आठवाँ, बारहवाँ, अनिष्ट स्थान है किन्तु अष्टक वर्ग में अधिक शुभ बिन्दु (उत्तर भारत की संस्कृत पुस्तकों में इन्हें रेखा कहते हैं) पड़े हों—तो शुभ फल ही होता है—अशुभ फल नहीं होता।