भारतकोश
फलदीपिका (मन्त्रेश्वर दैवज्ञ - सम्पूर्ण २८ अध्याय, भाव-विचार, दशा-फल एवं गोचर सटीक)

फलदीपिका (मन्त्रेश्वर दैवज्ञ - सम्पूर्ण २८ अध्याय, भाव-विचार, दशा-फल एवं गोचर सटीक)

Phaladeepika of Mantreshwara Daivajna with Commentary

मन्त्रेश्वर दैवज्ञ (टीकाकार: पं. सूर्यनारायण व्यास) द्वारा

DevanagariHindipublished684 पृष्ठ

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६६४ फलदीपिका मुहूर्त के समय 'वेध' देखना चाहिये १६. (१) जो तिथि, राशि, नवांश, या नक्षत्र पाप ग्रह से वेध किये जा रहे हों—उनको शुभ कार्य प्रारंभ के समय नहीं लेना। उदाहरण के लिये अष्टमी तिथि का वेध (पाप ग्रह) से हो रहा है तो कोई नवीन कार्य अष्टमी को प्रारंभ न करना। (२) ऐसे समय जो बीमार पड़ता है जल्दी अच्छा नहीं होता। विवाह करता है तो वैवाहिक सुख नहीं होता। यात्रा करता है तो यात्रा सफल नहीं होती। (३) यदि जन्म का वार विद्ध हो (देखिये सर्वतो भद्र चक्र में तिथियों के कोष्ठों में सू. च. मं आदि लिखे हैं—उन से उन-उन ग्रहों के वार समझना) तो उस वार को मन को खुशी नहीं होती, पीड़ा होती है। १७. अस्त दिशा (i) पूर्व की वृष, मिथुन, कर्क राशि है। जब इन तीनों राशियों में से किसी में सूर्य हो तब पूर्व दिशा को अस्त समझना। ईशान कोण में जो स्वर हैं—अर्थात् अ, उ लृ ओ—यह भी अस्त समझना। (ii) दक्षिण की ओर सिंह, कन्या और तुला राशियाँ हैं। जब इन में से किसी राशि में सूर्य हो तो दक्षिण दिशा को अस्त समझना। आ, ऊ लृ और औ—यह जो चार स्वर हैं इनको अस्त मानिये। (iii) पश्चिम दिशा की ओर वृश्चिक, धन, मकर राशियाँ हैं। जब इनमें से किसी में सूर्य हो तो इन दिशाओं