भारतकोश
फलदीपिका (मन्त्रेश्वर दैवज्ञ - सम्पूर्ण २८ अध्याय, भाव-विचार, दशा-फल एवं गोचर सटीक)

फलदीपिका (मन्त्रेश्वर दैवज्ञ - सम्पूर्ण २८ अध्याय, भाव-विचार, दशा-फल एवं गोचर सटीक)

Phaladeepika of Mantreshwara Daivajna with Commentary

मन्त्रेश्वर दैवज्ञ (टीकाकार: पं. सूर्यनारायण व्यास) द्वारा

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छब्बीसवाँ अध्याय : गोचरफल ६६७ सर्वतो भद्र चक्रोक्त शुभवेधाः शुभावहाः । पापवेधा दुःखतरा गोचरेताश्च चित्तयेत् ॥४८॥ वेधकारक पापग्रह दुःखदायी होते हैं शुभग्रह वेध कारक होने से शुभ फल करते हैं, इस कारण गोचर में सर्वतोभद्र में जो वेध द्वारा शुभ या अशुभ फल बताये गये हैं उनका भी विचार कर लेना चाहिए ॥४८॥ दशापहाराष्टक वर्गगोचरे ग्रहेषु नृणां विषमस्थितेष्वपि । जपेच्च तत्प्रीतिकरैः सुकर्मभिः करोति शान्तिं व्रतदानवन्दनैः ॥४६॥ यदि कोई ग्रह गोचर में अशुभ हो या किसी अनष्टप्रद ग्रह की दशा अन्तर्दशा हो तो उस ग्रह को प्रसन्न करने वाले सुकर्मों द्वारा व्रत, दान, वन्दना, जप, शांति आदि द्वारा उसके अशुभ फल की निवृत्ति करनी चाहिए अहिंसकस्य दान्तस्य धर्मार्जितधनस्य च । सर्वदा नियमस्थस्य सदा सानुग्रहा ग्रहाः ॥५०॥ जो व्यक्ति किसी की हिंसा नहीं चाहता, संयमी होता है (अपने मन और आचरण पर संयम रखता है) तथा धर्म मार्ग से धनोपार्जन करता है और सर्वदा शास्त्रोपदिष्ट नियमों का पालन करता है उस पर ग्रह सदैव अनुग्रह करते हैं।