भारतकोश
फलदीपिका (मन्त्रेश्वर दैवज्ञ - सम्पूर्ण २८ अध्याय, भाव-विचार, दशा-फल एवं गोचर सटीक)

फलदीपिका (मन्त्रेश्वर दैवज्ञ - सम्पूर्ण २८ अध्याय, भाव-विचार, दशा-फल एवं गोचर सटीक)

Phaladeepika of Mantreshwara Daivajna with Commentary

मन्त्रेश्वर दैवज्ञ (टीकाकार: पं. सूर्यनारायण व्यास) द्वारा

DevanagariHindipublished684 पृष्ठ

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सत्ताईसवां अध्याय प्रव्रज्या योग ग्रहैश्चतुर्भिः सहिते खनाथे त्रिकोणगैः केन्द्रगतैस्तु मुक्तः । लग्ने गृहान्ते सति सौम्यभागे केन्द्रे गुरौ कोणगते च मुक्तः ॥१॥ यदि दशम भवन का स्वामी चार ग्रहों के साथ केन्द्र या त्रिकोण में हो तो वह जातक "मुक्त" हो जावेगा अर्थात् इस जीवन के बाद उसे मोक्ष प्राप्त होगा । एकर्क्षसंस्थैश्चतुरादिकैस्तु ग्रहैर्वदेत्तत्र बलान्वितेन । प्रव्रज्यकां तत्र वदन्ति केचित् कर्मेशतुल्यां सहिते खनाथे ॥२॥ यदि चार ग्रह एक साथ हों तो उन चारों में जो बली हो उस बली ग्रह से जिस प्रकार की प्रव्रज्या द्योतित हो--वैसी प्रव्रज्या जातक की होती है । यदि उन चारों ग्रहों में दसवें ग्रह का स्वामी हो तो उस दसवें घर के स्वामी के सदृश प्रव्रज्या होती है ऐसा कुछ का मत है ॥२॥