फलदीपिका (मन्त्रेश्वर दैवज्ञ - सम्पूर्ण २८ अध्याय, भाव-विचार, दशा-फल एवं गोचर सटीक)
Phaladeepika of Mantreshwara Daivajna with Commentary
मन्त्रेश्वर दैवज्ञ (टीकाकार: पं. सूर्यनारायण व्यास) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें६७० फलदीपिका वेदान्तज्ञानिनं वा यतिवरममरेड्यो भृगुर्लिङ्गवृत्तिं व्रात्यं शैलूषवृत्तिं शनिरिह पतितं वाऽथ पाषण्डिनं वा ॥५॥ सूर्य “योगीश” या “दीक्षित” बनाता है। चन्द्रमा तीर्थ पान्थ (तीर्थ यात्रा करने वाला) बनाता है। “दुर्मन्त्र” (दुष्ट मंत्र वाला या कठिन मंत्र साध्य करने वाला) “बुद्ध का आश्रय लेना” (बुद्ध का आश्रय लेने से तात्पर्य है—बौद्ध भिक्षु) मंगल के प्रभाव से होता है। जो अन्य के मत में प्रविष्ट हो—ऐसा बुध के प्रभाव से होता है। बृहस्पति वेदान्त ज्ञानी या यतियों में श्रेष्ठ बनाता है। यदि शुक्र प्रबल हो तो लिंगवृत्ति (अर्थात् बाहर से तो साधु संन्यासियों के लक्षण वाला परन्तु भीतर से पाषण्डी या व्रात्य या नाचने-गाने वाला (नाच, गान, नाटक आदि कर जो संन्यासी धर्म का प्रचार करने वाला हो) और शनि के प्रभाव से पतित या पाखण्डी होता है ॥५॥ अतिशयबलयुक्तः शीतगुः शुक्लपक्षे बलविरहितमेनं प्रेक्षते लग्ननाथः । यदि भवति तपस्वी दुःखितः शोकतप्तो धनजनपरिहीनः कृच्छ्रलब्धान्नपानः ॥६॥ शुक्ल पक्ष में चन्द्रमा अत्यन्त बलवान् होता है। जब चन्द्रमा निर्बल हो (जन्म कुंडली में) और उसको लग्न का स्वामी देखता हो, ऐसा जातक यदि तपस्वी हो तो वह दुःखित, शोकतप्त, धन और जन से हीन—कठिनता से भोजन और पान (दूध आदि) प्राप्त करेगा। ॥६॥ प्रकथितमुनियोगे राजयोगो यदि स्या- दशुभफलविपाकं सर्वमुन्मूल्य पश्चात् ।