फलदीपिका (मन्त्रेश्वर दैवज्ञ - सम्पूर्ण २८ अध्याय, भाव-विचार, दशा-फल एवं गोचर सटीक)
Phaladeepika of Mantreshwara Daivajna with Commentary
मन्त्रेश्वर दैवज्ञ (टीकाकार: पं. सूर्यनारायण व्यास) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंसत्ताईसवां अध्याय : प्रव्रज्या योग ६७१ जनयति पृथिवीशं दीक्षितं साधुशीलं । प्रणतनृपशिरोभिः स्पृष्टपादाम्बजयुग्मम् ॥७॥ पिछले श्लोक में “मुनि” होने का जो योग कहा गया है--वैसी कुंडली में यदि राजयोग भी हो तो जो कुछ अशुभ फल ऊपर श्लोक ६ में बताया है वह दूर हो जाता है और प्रबल राज योग होने से जातक पृथिवी का स्वामी दीक्षित, साधु-शील (साधु के सौशील्यादि गुणयुक्त) राजा होता है, जिसकी अन्य लोग वन्दना करते हैं ॥७॥ चत्वारो द्युचराः खनाथसहिताः केन्द्रे त्रिकोणेऽथवा सुस्थाने बलिनस्त्रयो यदि तदा सन्याससिद्धिर्भवेत् । सद्बाहुल्यवशाच्च तत्र सुशुभस्थानस्थितैस्तैर्वदेत् प्रव्रज्यां महितां सतामभिमतां चेदन्यथा निन्दिताम् ॥८॥ यदि चार ग्रह (जिन चार में एक ग्रह दसवें घर का स्वामी भी हो) केन्द्र या त्रिकोण में हों या तीन ग्रह बली अच्छे