फलदीपिका (मन्त्रेश्वर दैवज्ञ - सम्पूर्ण २८ अध्याय, भाव-विचार, दशा-फल एवं गोचर सटीक)
Phaladeepika of Mantreshwara Daivajna with Commentary
मन्त्रेश्वर दैवज्ञ (टीकाकार: पं. सूर्यनारायण व्यास) द्वारा
पृष्ठ 646, कुल 684 में से
संदर्भ में पढ़ेंछब्बीसवां अध्याय : गोचरफल ६४५ हो और सौम्य ग्रह द्वारा गोचर काल में निरीक्षित हो तो उसकी अशुभता नष्ट हो जाती है। (२) यदि कोई शुभप्रद ग्रह हो और गोचर के समय अशुभ ग्रह से दृष्ट हो तो उसकी शुभता नष्ट हो जाती है। (३) यदि कोई ग्रह अपने शत्रु से दृष्ट हो तो उसकी शक्ति भी कम हो जाती है और शुभ फल देने में असमर्थ हो जाता है ॥३०॥ अनिष्टभावस्थितखेचरेन्द्रः स्वोच्चस्वगेहोपगतो यदि स्यात् । न दोषकृच्चोत्तमभावगश्चेत् पूर्णं फलं यच्छति गोचरेषु ॥ ३१ ॥ यदि कोई ग्रह गोचर द्वारा अनिष्ट भाव में हो किन्तु अपनी स्वराशि या उच्च राशि में हो तो दोष नही करता (अर्थात् हानि नहीं पहुँचाता)। यदि गोचर द्वारा शुभ भाव में हो और स्वराशि या उच्च राशि का भी हो तो पूर्ण शुभ फल करता है ।३१॥ ग्रहेश्वरास्ते शुभगोचरस्था नीचारिमौढ्यं समुपाश्रिताश्चेत् । ते निष्फलाः किन्त्वशुभाङ्कसंस्थाः कष्टं फलं संविदधत्यनल्पम् ॥३२॥ जो ग्रह गोचर में शुभ हों किन्तु नीच राशि, या शत्रु राशि के हों, या सूर्य के अत्यन्त सानिध्य के कारण मूढ़ावस्था को प्राप्त हों तो वह अपना शुभ प्रभाव दिखाने में निष्फल हो जाते हैं। यदि ऐसी अवस्था में (नीच या शत्रु राशि या मूढ़ावस्था) कोई ग्रह अशुभ भाव में हो तो अत्यन्त अशुभ फल दिखाते हैं ॥३२॥