फलदीपिका (मन्त्रेश्वर दैवज्ञ - सम्पूर्ण २८ अध्याय, भाव-विचार, दशा-फल एवं गोचर सटीक)
Phaladeepika of Mantreshwara Daivajna with Commentary
मन्त्रेश्वर दैवज्ञ (टीकाकार: पं. सूर्यनारायण व्यास) द्वारा
पृष्ठ 645, कुल 684 में से
संदर्भ में पढ़ें६४४ फलदीपिका विपत् । (घ) बाईसवां नक्षत्र वैनाशिक । (ङ) पाँचवां नक्षत्र प्रत्यरि, (च) और सातवां नक्षत्र वध कहलाता है । ऊपर लिखे हुए छः नक्षत्र तथा जन्म नक्षत्र इन सातों का यदि पाप ग्रहों द्वारा वेध होता हो तो मृत्यु का भय होता है । यदि साथ ही शुभ ग्रहों से भी वेधू हो तो केवल कार्य हानि (भाग्य हानि, घाटा) आदि अशुभ फल होकर रह जाते हैं ।।२८।। आदित्यसङ्क्रान्तिदिने ग्रहाणां प्रवेशने वा ग्रहणे च युद्धे । उल्कानिपाते च तथाऽद्भुते च जन्मत्रयं स्यान्मरणादिदुःखम् ॥२९॥ (१) जिस दिन सूर्य का एक राशि से दूसरी राशि में संक्रमण हो । (२) या अन्य ग्रह का किसी राशि में संक्रमण हो । (३) ग्रहण हो । (४) ग्रह युद्ध हो । (५) उल्का निपात हो । (६) या कोई अद्भुत “आकाशी चमत्कार” हो । उस दिन यदि जन्म नक्षत्र, अनुजन्म (जन्म नक्षत्र से दसवां नक्षत्र) तथा त्रिजन्म (जन्म नक्षत्र से उन्नीसवां) नक्षत्र हो तो मृत्यु आदि दुःखदायक फल होता है ॥२९॥ असत्फलः सौम्यनिरीक्षितो यः शुभप्रदश्चाप्यशुभेक्षितश्च । द्वौ निष्फलौ द्वावपि खेचरेन्द्रौ यः शत्रुुणा स्वेन विलोकितश्च ॥३०॥ तीन परिस्थितियों में ग्रह गोचर द्वारा अपना पूर्ण प्रभाव दिखाने में निष्फल हो जाते हैं : (१) यदि कोई अशुभ फल देने वाला ग्रह