फलदीपिका (मन्त्रेश्वर दैवज्ञ - सम्पूर्ण २८ अध्याय, भाव-विचार, दशा-फल एवं गोचर सटीक)
Phaladeepika of Mantreshwara Daivajna with Commentary
मन्त्रेश्वर दैवज्ञ (टीकाकार: पं. सूर्यनारायण व्यास) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंछब्बीसवां अध्याय : गोचरफल ६४३ रेखाः सप्तसमालिखेदुपरीगास्तिर्यक्तथैव क्रमा- द्दीशादग्निभमादितोऽपि गणयेदादित्यभस्यावधि । वेधा जन्मदिने मृतिर्भयमथाधानाख्यनक्षत्रे कर्मण्यर्थविनाशनं खलु रविर्दद्यात्सपापो मृतिम् ॥२६॥ सूर्य जिस नक्षत्र में गोचर से हो उसका यदि जन्मकालीन चन्द्र नक्षत्र से वेध होता हो तो प्राण भय होता है । यदि आधान नक्षत्र (जन्म नक्षत्र से उन्नीसवाँ नक्षत्र) का वेध होता हो तो भय और चिंता होगी । यदि कर्म नक्षत्र (जन्म नक्षत्र से दसवां नक्षत्र) का वेध होता हो तो धन नाश होगा । यदि सूर्य के साथ-साथ कोई क्रूर ग्रह भी हो तो विशेष अनिष्ट परिणाम होता है । एवं विद्धे खचरैः क्रूरैरन्यैर्मरणम् । सौम्यैर्विद्धे न मृतिर्विद्यादेवं सकलम् ॥२७॥ ऊपर जो तीन नक्षत्र बताये गये हैं,उनका यदि अन्य क्रूर ग्रहों से वेध हो रहा हो तो मृत्यु होती है । यदि शुभ ग्रहों से भी वेध हो तो मृत्यु नहीं होती, इसी प्रकार जैसे सूर्य का नक्षत्र गोचर ऊपर बताया गया है, अन्य ग्रहों के नक्षत्र गोचर का भी विचार करना चाहिए ॥२७॥ आधानकर्मर्क्षविपन्निजर्क्षे वैनाशिके प्रत्यरभे वधाख्ये । पापग्रहो मृत्युभयं विदध्या द्वेधेतथा कार्यहरः शुभाख्ये ॥२८॥ जन्मकालीन चन्द्र नक्षत्र से (क) उन्नीसवाँ नक्षत्र आधान नक्षत्र कहलाता है, (ख) दसवाँ नक्षत्र कर्म नक्षत्र । (ग) तीसरा नक्षत्र