फलदीपिका (मन्त्रेश्वर दैवज्ञ - सम्पूर्ण २८ अध्याय, भाव-विचार, दशा-फल एवं गोचर सटीक)

फलदीपिका (मन्त्रेश्वर दैवज्ञ - सम्पूर्ण २८ अध्याय, भाव-विचार, दशा-फल एवं गोचर सटीक)
Phaladeepika of Mantreshwara Daivajna with Commentary
मन्त्रेश्वर दैवज्ञ (टीकाकार: पं. सूर्यनारायण व्यास) द्वारा
DevanagariHindipublished684 पृष्ठ
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छब्बीसवां अध्याय : गोचरफल ६४१ गोचरफलचक्रम्
| सूर्य | चन्द्रः | भौमः | बुधः | गुरुः | शुक्रः | श.रा.के. | ग्रहाः |
|---|---|---|---|---|---|---|---|
| ३।६। १०।११॥ | १।२।३।५।६। ७।९।१०।११ | ३।६ १०।११ | २।६ १०।११ | २।५।७ १२।११ | १।२।३ १२।११ | ३।६।१० ।११। | उत्तम |
| १।२।५ ७।९ | + + | १।२।५ ७।९ | १।३।५ ७।९ | १।३।६ ११।१०॥ | ५।६। ७।१० | १।२।५ ।७।९। | अरिष्टकारक |
| ४।८।१२ | ४।८।१२ | ४।८।१२ | ४।८।१२ | ४।८।१२ | ४।८।१२ | ४।८।१२ | विशेष अनिष्ट |
| प्रायः गोचर वश जो फल ऊपर दिये गये हैं वही वराहमिहिर आदि अन्य आचार्यों ने दिये हैं। | |||||||
| इस कारण पिष्टपेषण नहीं किया जाता है। विद्वानों ने गोचर-विचार का एक चक्र प्रस्तुत किया है, वह | |||||||
| साथ में दिया गया है। इस प्रसंग में ही मंत्रेश्वर ने नक्षत्र-गोचर का भी विचार किया है और कब ग्रह | |||||||
| गोचर द्वारा फल कम करते हैं—कब अधिक इसका विचार भी किया है। वह आगे दिया जाता है : |