भारतकोश
फलदीपिका (मन्त्रेश्वर दैवज्ञ - सम्पूर्ण २८ अध्याय, भाव-विचार, दशा-फल एवं गोचर सटीक)

फलदीपिका (मन्त्रेश्वर दैवज्ञ - सम्पूर्ण २८ अध्याय, भाव-विचार, दशा-फल एवं गोचर सटीक)

Phaladeepika of Mantreshwara Daivajna with Commentary

मन्त्रेश्वर दैवज्ञ (टीकाकार: पं. सूर्यनारायण व्यास) द्वारा

DevanagariHindipublished684 पृष्ठ

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अनर्थ । छः में सुखहीनता । यदि पांच वर्गों में बलवान् हो तो बन्धुओं का प्यारा । ६ वर्गों में बलवान् होने से बन्धुओं में श्रेष्ठ हो । ७ वर्गों में बलवान् होने का फल है राजा की कृपा प्राप्त होना । ८ का फल है धनी होना । ९ का फल है राजा होना और दसों वर्गों में बलवान् होने से महाराजा होता है । अब राजा महाराजा होते नहीं इस कारण यह अर्थ समझना चाहिये कि जितने अधिक वर्गों में बलवान् हो उतना ही शुभ फल अधिक होगा । यदि ग्रह बालावस्था में हो तो व्यक्ति वृद्धि को प्राप्त हो, कुमारावस्था में ग्रह हो तो जातक को सुख प्रदान करे । यदि ग्रह युवावस्था में हो तो जातक को नृप बना दे । अर्थात् अधिक अभ्युदय करे । यदि ग्रह प्रौढ़ावस्था में हो तो बीमारी पैदा करता है । और वृद्ध अवस्था में मृत्यु पैदा करता है। यहां भी शब्दार्थ न लेकर भावार्थ लेना चाहिये कि ग्रह यदि बाल हो तो क्रमशः उन्नति यदि कुमार हो तो बाल से अधिक अच्छा फल, युवा हो फल प्रदान करने में पूर्ण शक्तिमान्, प्रौढ़ हो तो भलाई करने में अशक्त, बुराई के लिये उद्यत और मृत अवस्था में हो तो अत्यन्त निकृष्ट फल देता है ।। १० ।। षड् वर्गेषु शुभग्रहाधिकगुणैः* श्रीमांश्चिरं जीवति क्रूरांशे बहुले विलग्नभवने दीनोऽल्पजीवः शठः । तन्नाथा बलिनो नृपोऽस्त्यथ नवांशेशो दृगाणेश्वरो लग्नेशः क्रमशः सुखी नृपसमः क्षोणीपतिर्भाग्यवान् ।। ११ ।। यदि शुभ ग्रह षड्वर्गों में बलवान् हो तो मनुष्य धनवान् और दीर्घायु होता है। जिस प्रकार ग्रहों के षड्वर्ग देखे जाते हैं उसी प्रकार लग्न स्पष्ट करके यह देखना चाहिये कि जो राशि, अंश कला, विकला उदय हो रही है *राशि, होरा, द्रेष्काण नवांश, द्वादशांश, और त्रिंशांश यह षड्वर्ग कहलाते हैं ।