भारतकोश
फलदीपिका (मन्त्रेश्वर दैवज्ञ - सम्पूर्ण २८ अध्याय, भाव-विचार, दशा-फल एवं गोचर सटीक)

फलदीपिका (मन्त्रेश्वर दैवज्ञ - सम्पूर्ण २८ अध्याय, भाव-विचार, दशा-फल एवं गोचर सटीक)

Phaladeepika of Mantreshwara Daivajna with Commentary

मन्त्रेश्वर दैवज्ञ (टीकाकार: पं. सूर्यनारायण व्यास) द्वारा

DevanagariHindipublished684 पृष्ठ

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तीसरा अध्याय : वर्ग विभाग ६३ ऊपर कितने स्ववर्ग आदि में ग्रह क्या-क्या कहलाता है यह बतलाने के बाद अब इसका फल बताते हैं; यदि कोई ग्रह "पारिजातांश" में हो तो वह जातक को अनेक गुणों से युक्त धनी, सुखी, मान प्रतिष्ठा वाला बनाता है। यदि कोई ग्रह उत्तमांश में हो तो वह उत्तम आचार वाला (कुलक्रमागत शिष्ट, जनानुमोदित) रास्ते पर चलने वाला चतुर और विनयी होता है। यदि किसी जातक का कोई ग्रह गोपुरांश में हो तो उसकी बुद्धि शुभ होती है और उसको गायों का, धन का, खेत का तथा अपने मकान का सुख प्राप्त होता है। यदि ग्रह सिंहासनांश में हो तो मनुष्य राजा का प्यारा हो; या राजा के बराबर हो या राजा ही हो जाय, यह सब परि- स्थिति देखकर फलादेश कहना चाहिये। यदि कोई ग्रह पारावतांश में हो तो जातक को श्रेष्ठ, घोड़े, हाथी, सवारी आदि प्राप्त हों और वैभव से युक्त हो। यदि कोई ग्रह देवलोकांश में हों तो जातक सत्कीर्ति से युक्त भूमण्डलाधीश (राजा) गवर्नर आदि हो। ऐरावतांश में ग्रह होने से वह साक्षात् इन्द्र के वैभव से युक्त होगा और अनेक राजा उसको सलाम करेंगे। सुरलोकांश का फल भी करीब- करीब ऐसा ही है। धन-धान्य, सौभाग्य, पुत्र सुख से युक्त महाराजा हो। ऊपर जो अधिकाधिक शुभ वर्गों में उत्तम फल बताये गये हैं; इनका शब्दार्थ नहीं लेना चाहिये। केवल भावार्थ लेना चाहिये, कि जितना अधिक कोई ग्रह स्ववर्गों में होगा उतना ही सुख, फल दिखाने में समर्थ होगा। केवल एक ग्रह अच्छा होने से न कोई राजा बनता है न कोई एक ग्रह खराब होने से कोई रंक हो जाता है। न सब ग्रह किसी के बनते हैं न सब ग्रह किसी के बिगड़ते हैं इसीलिये फलादेश करते समय सब ग्रहों के बलाबल का तारतम्य कर अन्तिम नतीजे पर पहुंचना चाहिये॥ ९॥ ऊपर के श्लोकों में ग्रहों के बलवान् होने का शुभ फल बताया है। अब ग्रहों के निर्बल होने का फल बताते हैं। दशों वर्गों में बलहीन हो तो मृत्यु हो जावे। यदि नौ में बलहीन हो तो 'नाश' हो, आठ में बलहीन हो तो "दुःख" उत्पन्न करे। सात में निर्बलता का फल है