फलदीपिका (मन्त्रेश्वर दैवज्ञ - सम्पूर्ण २८ अध्याय, भाव-विचार, दशा-फल एवं गोचर सटीक)
Phaladeepika of Mantreshwara Daivajna with Commentary
मन्त्रेश्वर दैवज्ञ (टीकाकार: पं. सूर्यनारायण व्यास) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंचौथा अध्याय ग्रह बल इस अध्याय में ग्रह और भावों का बल कैसे ज्ञात करना चाहिये यह बताया गया है। इस सम्बन्ध में मन्त्रेश्वर महाराज का मत क्या है यह जानने के पूर्व यह ज्ञात होना आवश्यक है कि अन्य आचार्यों का मत क्या है। जिनको षड्बल (ग्रहों का ६ प्रकार का बल) निकालने का प्रकार मालूम है उन्हें तो फलदीपिका के श्लोकों का अर्थ आसानी से समझ में आ जावेगा। किन्तु जिनका षड्बल से परिचय नहीं है उन्हें निम्नलिखित विवरण ध्यान से पढ़ लेना चाहिये। ग्रहों का षड्बल भारतीय ज्योतिष की एक विशेष चीज़ है। षड्बल— (क) स्थान बल, (ख) दिक् बल, (ग) काल बल, (घ) चेष्टा बल, (ङ) नैसर्गिक बल तथा (च) दृक् बल के योग को कहते हैं। अब इनमें से प्रत्येक को समझाते हैं। स्थान बल—यह १२ प्रकार के बलों का योग है। (१) उच्च बल—जब कोई ग्रह अपनी परमोच्च अवस्था में* होता है तो उसे १ रूप (=६० षष्ट्यंश) बल प्राप्त होता है; यदि वह परम नीचांश में हो तो उसे कुछ बल प्राप्त नहीं होता—अर्थात् ० प्राप्त होता है। मध्य में कहीं हो तो त्रैराशिक से बल निकालना चाहिये। इसे उच्च बल कहते हैं। (२) यदि ग्रह अपनी मूल त्रिकोण राशि में हो (किसी ग्रह की मूल *जिस राशि के जिस अंश पर ग्रह परम उच्च होता है वह उसकी परमोच्च अवस्था और जिस राशि के जिस अंश पर वह परम नीच होता है वह उसकी परम नीच स्थिति कहलाती है।