भारतकोश
फलदीपिका (मन्त्रेश्वर दैवज्ञ - सम्पूर्ण २८ अध्याय, भाव-विचार, दशा-फल एवं गोचर सटीक)

फलदीपिका (मन्त्रेश्वर दैवज्ञ - सम्पूर्ण २८ अध्याय, भाव-विचार, दशा-फल एवं गोचर सटीक)

Phaladeepika of Mantreshwara Daivajna with Commentary

मन्त्रेश्वर दैवज्ञ (टीकाकार: पं. सूर्यनारायण व्यास) द्वारा

DevanagariHindipublished684 पृष्ठ

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७६ फलदीपिका कन्या, वृश्चिक या मीन) नवांश में हो उसको—प्रत्येक को—१५ षष्ट्यंश बल प्राप्त होता है। (११) जो ग्रह केन्द्र राशि में हो उसे १ रूप (=६० षष्ट्यंश) जो पणफर राशि में हो उसे ३० षष्ट्यंश और जो आपोक्लिम राशि में हो उसे केवल १५ षष्ट्यंश बल मिलता है। (१२) (क) सूर्य, मंगल या बृहस्पति यदि किसी राशि के प्रथम द्रेष्काण में हों तो उनकी (जो हो—प्रत्येक को) १५ षष्ट्यंश बल प्राप्त होता है। अन्य द्रेष्काण में होने से कुछ नहीं मिलता। (ख) शनि या बुध—जो भी—किसी राशि के द्वितीय द्रेष्काण में हो उसे १५ षष्ट्यंश बल मिलता है। (ग) चन्द्रमा और शुक्र इनमें से जो भी ग्रह किसी राशि के अन्तिम द्रेष्करण में हो उसे १५ षष्ट्यंश बल प्राप्त होता है। इन १२ प्रकार के बलों का योग स्थान बल कहलाता है। इनके संस्कृत नाम निम्नलिखित हैं :—(१) उच्च बल, (२)—(८) सप्तवर्गज बल, (९) ओज युग्म राशि बल, (१०) ओज युग्म नवांश बल, (११) केन्द्रादिबल, (१२) द्रेष्काण बल। दिक् बल दिक् बल कहिये, दिशा* बल कहिये एक ही बात है। (क) सूर्य और मंगल—इन दोनों में जो भी—दशम भाव मध्य पर हो उसे १ रूप बल प्राप्त होता है और यदि ये चतुर्थ भाव मध्य पर . हों तो ० बल प्राप्त होता है। मध्य में अनुपात से निकालिये। (ख) चन्द्रमा और शुक्र इन दोनों में जो भी चतुर्थ भाव मध्य पर हो या हों—उसे १ रूप बल प्राप्त होता है और दशम भाव मध्य पर ०। मध्य में अनुपात से निकालिये। *प्रथम भाव मध्य को पूर्व, सप्तम भाव मध्य को पश्चिम, चतुर्थ भाव मध्य को उत्तर और दशम भाव मध्य को दक्षिण कहते हैं।