भारतकोश
फलदीपिका (मन्त्रेश्वर दैवज्ञ - सम्पूर्ण २८ अध्याय, भाव-विचार, दशा-फल एवं गोचर सटीक)

फलदीपिका (मन्त्रेश्वर दैवज्ञ - सम्पूर्ण २८ अध्याय, भाव-विचार, दशा-फल एवं गोचर सटीक)

Phaladeepika of Mantreshwara Daivajna with Commentary

मन्त्रेश्वर दैवज्ञ (टीकाकार: पं. सूर्यनारायण व्यास) द्वारा

DevanagariHindipublished684 पृष्ठ

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पृष्ठ 78

चौथा अध्याय : ग्रह बल ७७ (ग) बुध और बृहस्पति प्रथमभाव (लग्न) मध्य पर हों तो इन्हें १ रूप बल प्राप्त होता है—यदि सप्तम भाव मध्य पर हों तो शून्य बल। मध्य में अनुपात से। (घ) शनि यदि सप्तम भाव मध्य पर हो तो उसे १ रूप बल प्राप्त होता है—यदि प्रथम भाव मध्य पर हो तो शून्य बल। मध्य में कहीं हो तो अनुपात से निकालिये। काल बल : यह ९ प्रकार के बलों का सम्मिश्रण है। काल बल के अन्तर्गत जो ९ प्रकार के बल आते हैं—उन्हें नीचे बताते हैं— (१) (क) सूर्य, बृहस्पति और शुक्र को—प्रत्येक को ठीक मध्याह्न के समय १ रूप (=६० षष्ट्यंश) बल प्राप्त है। ठीक मध्य रात्रि के समय, कुछ प्राप्त नहीं होता। मध्य काल में अनुपात से निकालना चाहिये। (ख) चन्द्र, मंगल और शनि को—प्रत्येक को ठीक मध्य- रात्रि के समय १ रूप (=६० षष्ट्यंश) बल प्राप्त होता है। ठीक मध्याह्न के समय ० बल प्राप्त होता है। मध्य काल में अनुपात से निकालना चाहिये। (ग) दिन रात के चाहे किसी भी काल में जन्म हो बुध को सदैव १ रूप बल मिलता है। (२) (क) जब सूर्य और चन्द्रमा एक-दूसरे से ठीक १८०° अंश पर हों तब शुभ ग्रहों को ६० षष्ट्यंश बल प्राप्त होता है—जब दोनों (सूर्य और चन्द्र) बिल्कुल एक ही राशि एक ही अंश पर हों तो शुभ ग्रहों को ० बल मिलता है। मध्य में (सूर्य और चन्द्रमा का अन्तर ०° से १८०° तक हो) तो अनुपात से निकालना चाहिये। चन्द्रमा, बुध, बृहस्पति और शुक्र शुभ ग्रह हैं। केशवी जातक का मत है कि पापयुत बुध को पाप ग्रह मानना। परन्तु कुछ अन्य आचार्य बुध को इस बल के लिये सदैव शुभ मानते हैं। हमारे विचार से बुध शुभ ग्रह ही है।