फलदीपिका (मन्त्रेश्वर दैवज्ञ - सम्पूर्ण २८ अध्याय, भाव-विचार, दशा-फल एवं गोचर सटीक)
Phaladeepika of Mantreshwara Daivajna with Commentary
मन्त्रेश्वर दैवज्ञ (टीकाकार: पं. सूर्यनारायण व्यास) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंचौथा अध्याय : ग्रह बल ८१ (१) नतोन्नत बल या दिवारात्रि बल, (२) पक्ष बल, (३) त्रिभाग बल, (४) अब्द बल, (५) मास बल, (६) वार बल, (७) होरा बल, (८) अयन बल, (९) युद्ध बल। बहुत-से लोग प्रथम सात बलों को ही काल बल कहते हैं। अयन बल और युद्ध बल को पृथक् मानते हैं। चेष्टा बल : अब चेष्टा बल किसे कहते हैं यह समझाते हैं । सूर्य और चन्द्र कभी वक्री नहीं होते बाकी मंगल, बुध, बृहस्पति, शुक्र और शनि कभी मार्गी होते हैं, कभी वक्री। इनकी 'गति' या चेष्टा के कारण इन्हें जो बल मिलता है उसे चेष्टा बल कहते हैं । यह बल निकालने के लिये मन्दोच्च, चेष्टा केन्द्र आदि निकालना पड़ता है—जिसके लिये बहुत गणित की आव- श्यकता है यहाँ स्थानाभाव के कारण वह नहीं समझाया जा सकता। यहाँ कुछ स्थूल गणना बताई जाती है (क) यदि ग्रह वक्री हो तो ६० षष्ट्यंश, (ख) अनुवक्र१ हो तो ३० षष्ट्यंश, (ग) विकल हो तो १५ षष्ट्यंश, (घ) समागम हो तो ३० षष्ट्यंश, (ङ) मन्द (गति बढ़ रही हो किन्तु मध्यम गति से कम हो) मार्गी गति हो तो १५ षष्ट्यंश (च) मन्दतर (गति कम हो रही हो किन्तु मध्यम गति से अधिक हो—मार्गी हो) हो तो ७॥ षष्ट्यंश (छ) शीघ्र हो (मार्गी गति कम हो रही हो किन्तु मध्यम गति से अधिक हो) तो ४५ षष्ट्यंश (ज) शीघ्रतर हो (मार्गी गति बढ़ रही हो और मध्यम गति से अधिक हो) तो ३० षष्ट्यंश बल प्राप्त होता है। यह स्थूल विचार है। सूक्ष्म बल गणित साध्य है। नैसर्गिक बल स्वभावतः कौन-सा ग्रह कितना बली है इसे नैसर्गिक बल कहते हैं। यह कभी नहीं बदलता। सूर्य ६०.०० षष्ट्यंश चन्द्र ५१.४३ ,, १. अनुवक्र गति को ऋजुगति भी कहते हैं।