फलदीपिका (मन्त्रेश्वर दैवज्ञ - सम्पूर्ण २८ अध्याय, भाव-विचार, दशा-फल एवं गोचर सटीक)
Phaladeepika of Mantreshwara Daivajna with Commentary
मन्त्रेश्वर दैवज्ञ (टीकाकार: पं. सूर्यनारायण व्यास) द्वारा
चौथा अध्याय : ग्रह बल ८१ (१) नतोन्नत बल या दिवारात्रि बल, (२) पक्ष बल, (३) त्रिभाग बल, (४) अब्द बल, (५) मास बल, (६) वार बल, (७) होरा बल, (८) अयन बल, (९) युद्ध बल। बहुत-से लोग प्रथम सात बलों को ही काल बल कहते हैं। अयन बल और युद्ध बल को पृथक् मानते हैं। चेष्टा बल : अब चेष्टा बल किसे कहते हैं यह समझाते हैं । सूर्य और चन्द्र कभी वक्री नहीं होते बाकी मंगल, बुध, बृहस्पति, शुक्र और शनि कभी मार्गी होते हैं, कभी वक्री। इनकी 'गति' या चेष्टा के कारण इन्हें जो बल मिलता है उसे चेष्टा बल कहते हैं । यह बल निकालने के लिये मन्दोच्च, चेष्टा केन्द्र आदि निकालना पड़ता है—जिसके लिये बहुत गणित की आव- श्यकता है यहाँ स्थानाभाव के कारण वह नहीं समझाया जा सकता। यहाँ कुछ स्थूल गणना बताई जाती है (क) यदि ग्रह वक्री हो तो ६० षष्ट्यंश, (ख) अनुवक्र१ हो तो ३० षष्ट्यंश, (ग) विकल हो तो १५ षष्ट्यंश, (घ) समागम हो तो ३० षष्ट्यंश, (ङ) मन्द (गति बढ़ रही हो किन्तु मध्यम गति से कम हो) मार्गी गति हो तो १५ षष्ट्यंश (च) मन्दतर (गति कम हो रही हो किन्तु मध्यम गति से अधिक हो—मार्गी हो) हो तो ७॥ षष्ट्यंश (छ) शीघ्र हो (मार्गी गति कम हो रही हो किन्तु मध्यम गति से अधिक हो) तो ४५ षष्ट्यंश (ज) शीघ्रतर हो (मार्गी गति बढ़ रही हो और मध्यम गति से अधिक हो) तो ३० षष्ट्यंश बल प्राप्त होता है। यह स्थूल विचार है। सूक्ष्म बल गणित साध्य है। नैसर्गिक बल स्वभावतः कौन-सा ग्रह कितना बली है इसे नैसर्गिक बल कहते हैं। यह कभी नहीं बदलता। सूर्य ६०.०० षष्ट्यंश चन्द्र ५१.४३ ,, १. अनुवक्र गति को ऋजुगति भी कहते हैं।
८२ फलदीपिका शुक्र ४२.८५ ,, बृहस्पति ३४.२८ ,, बुध २५.७० ,, मंगल १७.१४ ,, शनि ८.५७ ,, दृक् बल दृक् बल कहते हैं दृष्टि को। जिस ग्रह पर शुभ ग्रहों की दृष्टि होती है उसे शुभ दृष्ट कहते हैं। दृक् बल निकालने में जिस ग्रह की अन्य ग्रह पर दृष्टि होती है, उन दोनों का अन्तर (कितने अंश का फासला है) निकाल- कर गणितानुसार दृष्टि निकाली जाती है।* *टिप्पणी—सूर्य,, चन्द्र, बुध, शुक्र की अपने से ३० अंश पर शून्य, ६० अंश पर चौथाई दृष्टि होती है : ९० अंश पर त्रिपाद, १२० अंश पर आधी, १५०° पर शून्य, १८० अंश पर पूर्ण २१०° पर त्रिपाद, २४० अंश पर आधी और २७० अंश पर चौथाई, ३०० अंश पर शून्य। मध्य में अनुपात से निकालना चाहिये। मंगल, बृहस्पति तथा शनि की कितने अंश पर कितनी दृष्टि होती है यह नीचे बताया जाता है। मंगल बृहस्पति शनि ३० अंश पर शून्य शून्य शून्य ६० ,, चौथाई चौथाई पूर्ण ९० ,, पूर्ण त्रिपाद त्रिपाद १२० ,, आधी पूर्ण आधी १५० ,, शून्य शून्य शून्य १८० ,, पूर्ण पूर्ण पूर्ण २१० ,, पूर्ण त्रिपाद त्रिपाद २४० ,, आधी पूर्ण आधी २७० ,, चौथाई चौथाई पूर्ण ३०० ,, शून्य शून्य शून्य बीच के किसी अंश पर कितनी दृष्टि है यह त्रैराशिक से निकालना चाहिये।
चौथा अध्याय : ग्रह बल ८३ यदि किसी ग्रह पर पापों ग्रहों की दृष्टि हो तो उसे पाप-दृष्ट कहते हैं। पाप दृष्टि भी उपर्युक्त प्रकार से गणित कर निकाली जाती है। जातक- पद्धति आदि में दृष्टि की सारणियां दी हुई रहती हैं। यदि शुभ दृष्टि अधिक हो तो पाप दृष्टि को उसमें से घटाकर जो शेष बचे उसे पूर्व के स्थान बल, काल बल आदि के सम्मिलित योग में जोड़ देना चाहिये। किन्तु यदि पाप दृष्टि अधिक हो तो इसमें से शुभ दृष्टि को घटाकर जो शेष बचे वह स्थान बल, काल बल आदि के सम्मिलित योग में से घटा देनी चाहिये। जो शेष बचे षड्बलपिंड या छः प्रकार के बलों का योग कहलाता है। ग्रहों का बल कैसे निकाला जाता है इसका कुछ परिचय करा देने के बाद भाव बल निकालना बताते हैं। भाव बल भाव बल ३ बलों का सम्मिश्रण कर निकाला जाता है— (१) भावेश बल, (२) भाव दिग्बल तथा (३) शुभ दृष्टि बल। भाव के स्वामी के बल को भावेश बल कहते हैं। भावदिग् बल (क) मिथुन, कन्या, तुला कुंभ तथा धन का पूर्वार्द्ध द्विपद राशियां हैं। यह यदि लग्न में हो तो एक रूप बल प्राप्त होता है। सप्तम में हो तो शून्य मध्य, में किसी भाव में हो तो अनुपात से । (ख) मेष, वृषभ, सिंह तथा धनु का उत्तरार्द्ध और मकर का पूर्वार्द्ध चतुष्पाद राशियां हैं। यदि यह दशम में हों तो एक रूप बल प्राप्त होता
८४ फलदीपिका है। यदि चतुर्थ में हों तो शून्य। बीच के किसी भाव में हो तो त्रैराशिक से निकालिये। (ग) कर्क और वृश्चिक कीट राशियाँ हैं। यदि यह सप्तम में हों तो एक रूप बल प्राप्त होता है। लग्न में हों तो शून्य। मध्य के किसी भाव में हो तो त्रैराशिक से निकालिये। (घ) मीन और मकर का पश्चिमार्द्धं जलराशियाँ हैं। यह चतुर्थ में हों तो तो इन्हें १ रूप बल प्राप्त होता है। दशम में शून्य। मध्य में अनुपात से। शुभाशुभ दृष्टिबल भाव पर शुभ दृष्टि अधिक हो तो उसमें से अशुभ दृष्टि कम करके, जो शेष बचे उसे भावेश बल तथा भाव दिक्बल में जोड़ने से भावेश बल होता है। यदि भाव पर अशुभ दृष्टि अधिक है तो अशुभ दृष्टि में से शुभ दृष्टि घटाकर जो शेष बचे उसे भावेश बल* तथा भाव दिक् बल के योग में से घटाने से भावबल निकलता है। भाव पर शुभाशुभ दृष्टि कैसे निकाली जाती है यह विस्तृत विषय है। जातक पद्धति आदि से समझना चाहिये। √ ऊपर जो ग्रह बल और भाव बल के विषय में कुछ रूप रेखा मात्र दिखाई गई है वह केवल परिचय मात्र है। फल दीपिका के चतुर्थ अध्याय में मंत्रेश्वर ने यही विषय बतलाया है। अब नीचे फलदीपिका के श्लोकों का भावार्थ बताया जाता है :— *जो ग्रह भाव का स्वामी हो। √ग्रहों का षड्बल तथा भाव बल का विस्तृत परिचय प्राप्त करने के लिये देखिये (१) केशवी जातक, (२) श्रीपति पद्धति तथा वटश्रेणि भूदेव प्रणीत जातक-पद्धति।
चौथा अध्याय : ग्रह बल ८५ वीर्यं षड्विधमाह कालजबलं चेष्टाबलं स्वोच्चजं दिग्वीर्यं त्वयनोद्भवं दिविषदां स्थानोद्भवं च क्रमात् । निश्यारेन्दुसिताः परे दिवि सदा ज्ञः शुक्लपक्षे शुभाः; कृष्णेऽन्ये च निजाब्दमासदिनहोरास्वङ्घ्रिवृद्ध्या क्रमात् ॥१॥ ग्रह का बल छः प्र कार का होता है काल बल, चेष्टाबल, उच्च बल, दिक् बल, अयन बल और स्थान बल। मंगल चन्द्रमा और शुक्र रात्रि में बलवान् होते हैं—अन्य ग्रह दिन में। बुध रात्रि हो या दिन सदैव बलवान् समझा जाता है। शुक्ल पक्ष में शुभ ग्रह बलवान् होते हैं— अन्य ग्रह कृष्ण पक्ष में। अब्द पति को चौथाई रूप बल प्राप्त होता है। मास पति (जो ग्रह मास का स्वामी हो) को आधा रूप बल मिलता है। दिन पति (जन्म के दिन जिस ग्रह का वार हो ) को ३/४ रूप तथा जन्म के समय जिस ग्रह की होरा हो उसे १ रूप बल मिलता है ॥ १ ॥ राकाचन्द्रस्य चेष्टाबलमुदगयने भास्वतो वक्रगानां युद्धे चोदक्स्थितानां स्फुटबहुलरुचां स्वोच्चवीर्यं स्वतुङ्गे । दिग्वीर्यं खेडर्कभौमौ सुहृदि शशिसितौ विद्गुरू लग्नगौ चे- न्मन्देऽस्ते याम्यमार्गे बुधशनिशशिनोऽन्येऽयनाख्ये परस्मिन् ॥२॥ चन्द्रमा को पूर्णिमा के दिन पूर्ण चेष्टाबल प्राप्त होता है। सूर्य को उत्तर अयन में चेष्टाबल मिलता है। अन्य ग्रह जब वक्री होते हैं तब उन्हें चेष्टा बल प्राप्त होता है। ग्रहों के युद्ध में जो अस्त न हो और जो उत्तर की ओर हो उसे विजयी समझना चाहिये। जब ग्रह अपने परमोच्च स्थान (अंश) पर हो तब उसे पूर्ण उच्च बली समझना चाहिये। अब दिक् बल बताते हैं। दशम में सूर्य और मंगल बली होते हैं। चन्द्रमा और शुक्र चतुर्थ में बली होते हैं। बुध और बृहस्पति लग्न में बली होते हैं। शनि सप्तम में।
८६ फलदीपिका अब अयन बल बताते हैं। शनि बुध और चन्द्र दक्षिण अयन में बलवान् होते हैं। अन्य ग्रह उत्तर अयन में ॥ २ ॥ स्वोच्चस्वर्क्षसुहृद्गृहेषु बलिनः षट्सु स्ववर्गेषु वा प्रोक्तं स्थानबलं चतुष्टयमुखात्पूर्णार्द्धपादाः क्रमात् । मध्याद्यन्तकषण्डमर्त्यवनिताः खेटा बलिष्ठाः क्रमात् मन्दारज्ञगुरूशनोब्जरवयो नैजे बले वर्द्धनाः ॥३॥ ग्रह को अपनी उच्च, स्व (अपनी) या मित्र राशि या छः वर्गों में स्थित होने के कारण जो बल प्राप्त होता है उसे स्थान बल कहते हैं। ग्रह यदि केन्द्र में हो तो एक रूप बल मिलता है, पणफर में हो तो आधा रूप और यदि आपोक्लिम में हो तो चौथाई रूप बल मिलता है। नपुंसक ग्रह राशि के मध्यम में (११° से २०°) पुरुष ग्रह राशि के प्रथम भाग (१° से १०° तक) में, तथा स्त्रीग्रह अंतिम भाग (२१° से ३०° तक) बली होते हैं। नैसर्गिक बल में शनि, मंगल, बुध, गुरु, शुक्र, चन्द्र तथा सूर्य क्रमशः अधिकाधिक बली होते हैं। अर्थात् शनि से बली मंगल, मंगल से बली बुध इत्यादि ॥ ३ ॥ वक्रं गतो रुचिररश्मिसमहपूर्णो नीचारिभांशसहितोऽपि भवेत्स खेटः । वीर्यान्वितस्तुहिनरश्मिरिवोच्चमित्र- स्वक्षेत्रगोऽपि विबलो हतदीधितिश्चेत् ॥ ४ ॥
चौथा अध्याय : ग्रह बल ८७ चाहे ग्रह अपनी नीच राशि या नीच अंश (नवांश) में भी हो यदि वह वक्री है और सुन्दर किरण समूहों से पूर्ण है (अर्थात् अस्त नहीं है) तो बली समझा जाता है। चन्द्रमा की तरह—ग्रह चाहे वह उच्च राशि स्वराशि और मित्रराशि में भी क्यों न हो—यदि उसकी किरणें मर गई हों (सूर्य के समीप होने के कारण) तो वह निर्बल होता है। भावार्थ यह है कि चाहे वृष या कर्क का ही चन्द्रमा क्यों न हो यदि वह अमावास्या का चन्द्र हो तो निर्बल है और चाहे वृश्चिक का ही चन्द्रमा क्यों न हो यदि पूर्णिमा तिथि है तो वह बली है। यह सिद्धान्त अन्य ग्रहों पर भी लागू करना चाहिये ।। ४ ।। तुङ्गस्था बलिनोऽखिलाश्च शशिनः इलाघ्यं हि पक्षोद्भवं भानोर्दिग्बलमाह वक्रगमने ताराग्रहाणां बलम् । कर्क्युक्षाजघटालिगोहिरबलान्त्योक्षाशिवपाश्चात्यगः केतुस्तत्परिवेषधन्वसु बली चेन्द्रर्कयोगो निशि ।। ५ ।। सब ग्रह तुंगी (उच्च) होने से बली होते हैं। चन्द्रमा के पक्ष-बल को विशेष महत्त्व देना चाहिये। सूर्य के दिग्बल को मुख्यता है और अन्य ग्रहों के वक्र बल की। राहु, कर्क, वृषभ, मेष, कुंभ और वृश्चिक में तथा केतु, मीन कन्या वृषभ और धनु के उत्तरार्द्ध में और परिवेष तथा इन्द्रचाप में बलवान् होते हैं यदि रात्रि का समय हो और सूर्य तथा चन्द्र का योग हो (अर्थात् सूर्य चन्द्र एक राशि में हों) । रूपं मानुषभेदलिभेडङ्घ्रिपरेष्वद्धं बलं स्यात्तनोः तुल्यं स्वामिबलेन चोपचयगे नाथेऽतिवीर्योत्कटम् । स्वामीडचज्ञयुतेक्षिते कवियुते चान्यैरयुक्तेक्षिते शर्वर्या 'निशि राशयोऽहनि परे वीर्यान्विताः कीर्तिताः ।।६।।
८८ फलदीपिका यदि प्रथम भाव (लग्न) में मनुष्य राशि हो तो एक रूप बल मिलता है। यदि लग्न में वृश्चिक हो तो १/४ रूप बल मिलता है। और कोई राशि लग्न में हो तो १/२ रूप बल प्राप्त होता है । लग्न को वही बल प्राप्त होता है जो उसके स्वामी लग्नेश का बल है। यदि लग्नेश उपचय में हों तो लग्न को बहुत बली समझना चाहिये। यदि लग्न शुक्र से युत हो अपने स्वामी बुध या बृहस्पति से युत हो या अपने स्वामी बुध या बृहस्पति से दृष्ट हो और अन्य ग्रहों से युत वीक्षित न हो—तो भी लग्न को बलवान् समझना चाहिये। भावार्थ यह है कि शुक्र से युत होने को महत्त्व है—शुक्र की दृष्टि का उतना महत्त्व नहीं किन्तु लग्नेश बुध, बृहस्पति—इनकी युति हो या दृष्टि हो—दोनों बली बनाती हैं। दिवा बली राशियाँ दिन में बली होती हैं। रात्रि बली राशियाँ रात्रि में बली होती हैं ॥ ६ ॥ (१) सूर्य स्पष्ट (राशि, कला, विकला में ४ रा. १३ अं. २० कला जोड़िये। जो योग आवे वह 'धूम हुआ'। (२) १२ राशि अर्थात् १२ रा. ० अं. ० क. ० वि. ० में से 'धूम घटाइये जो बचे वह 'व्यतीपात हुआ'। (३) व्यतीपात की राशि, अंश कला विकला में ६ राशि अर्थात् ६-०-० जोड़िये यह परिवेष हुआ । (४) १२ राशि अर्थात् १२ रा. ० अं. ० क. ० वि. में से परिवेष घटाइये यह इन्द्र चाप हुआ । उदाहरण के लिये किसी के जन्म समय का स्पष्ट सूर्य ७-२६-११-३८ है। (१) स्पष्ट सूर्य ७-२६-११-३८
- ४-१३-२० ०- ९-३१-३८ धूम (२) १२- ०- ०- ० — ० - ९-३१-३८ ११-२०-२८-२२ व्यतीपात
चौथा अध्याय : ग्रह बल ८९ स्वोच्चे पूर्णं स्वत्रिकोणे त्रिपादं स्वक्षेत्रऽर्द्धं मित्रभे पादमव । द्विट्क्षेत्रेऽल्पं नीचगेऽस्तं गतेऽपि क्षेत्रं वीर्यं निष्फलं स्याद् ग्रहाणाम् ॥ यदि ग्रह अपनी उच्च राशि में हो तो उसे १ रूप बल प्राप्त होता है, यदि मूल त्रिकोण राशि में हो तो ३।४ रूप स्वराशि में १।२ रूप, मित्र राशि में १।४ । शत्रु राशि में बहुत कम बल मिलता है । यदि ग्रह नीच राशि में हो या अस्त हो तो उसे कुछ बल नहीं मिलता ॥ ७ ॥ केन्द्रे ग्रहाणामुदितं बलं यत्सुखे नभस्यस्तगृहे विलग्ने । उपर्युपर्युक्तपदक्रमेण बलाभिवृद्धि हि विकल्पयन्ति ॥८॥ चारों केन्द्रों में किसका कितना महत्त्व है यह बतलाते हैं । लग्न में पूर्ण बली, सप्तम में ३।४, दशम में १।२ और चतुर्थ में १।४ ॥ ८ ॥ अब किस दृष्टि को क्या महत्त्व देना यह समझाते हैं :— श्रेष्ठेति सा सप्तमदृष्टिरेव सर्वत्र वाच्या न तथाऽन्यदृष्टिः । योगादिषु न्यूनफलप्रदेति विशेषदृष्टिर्न तु कैश्चिदुक्ता ॥ ९ ॥ सर्वत्र सप्तम दृष्टि को ही श्रेष्ठ समझना चाहिये । अन्य दृष्टि (नवम, पंचम आदि) का वह प्रभाव नहीं है । किन्तु कुछ अन्य आचार्यों का मत (३) ११-२०-२८-२२ — ६- ०- ०- ० ५-२०-२८-२२ परिवेश (४) १२- ०- ०- ० — ५-२०-२८-२२ ६- ९-३१-३८ इन्द्रचाप
९० फलदीपिका है कि जहाँ 'योग का विचार करना हो वहां गुरु की नवम पञ्चम (विशेष दृष्टि) मंगल की चतुर्थ, अष्टम (विशेष दृष्टि) तथा शनि की तृतीय, दशम (विशेष दृष्टि) भी सप्तम की भाँति ही पूर्ण फल देने वाली होती है ॥ ९ ॥ ग्रहों की मित्रता या शत्रुता दो प्रकार की होती हैं—नैसर्गिक तथा तात्कालिक—इनमें किसको क्या महत्त्व देना यह बतलाते हैं :— नैसर्गिकं शत्रुसुहृत्त्वमेव भवेत्प्रमाणं फलकारि सम्यक् । तात्कालिकं कार्यवशेन वाच्यं तच्छत्रुमित्रत्वमनित्यमेव ॥१०॥ ग्रहों की नैसर्गिक या स्वाभाविक मित्रता, शत्रुता आदि ही विशेष फल देने वाली होती है—तात्कालिक शत्रुता, मित्रता कार्यवश¹ कहनी चाहिये—वह स्थायी नहीं होती । (जो ग्रह नैसर्गिक शत्रु हैं—वह एक की महादशा एक की अन्तर्दशा होने पर अच्छा फल नहीं दिखाते । लग्न का शत्रु, या जिस भाव का विचार करना है उस भावेश का शत्रु भी अपनी दशा अन्तर्दशा में अपने शत्रु के भाव को बिगाड़ता है—यह सब विचार करना चाहिये ।) निःशेषदोषहरणे शुभवर्द्धने च वीर्यं गुरोरधिकमस्त्यखिलग्रहेभ्यः । तद्वीर्यपाददलशक्तिभृतौ ज्ञशुक्रौ चान्द्रं बलं तु निखिलग्रहवीर्यबीजम् ॥ ११॥ १. मूल संस्कृत श्लोक में 'कार्यवश शब्द आया है । यद्यपि फल- दीपिका जातक का ग्रंथ है—प्रश्न का नहीं, तथापि प्रश्न कुंडली में 'कार्य' होगा या नहीं—इसमें तात्कालिक संबंध देखना ।
चौथा अध्याय ग्रह बल ९१ सब दोषों को दूर करने में और शुभ फल को बढ़ाने में बृहस्पति सबसे अधिक शक्तिशाली है । जितनी शुभता की सामर्थ्य बृहस्पति की है उसकी आधी शुक्र की समझनी चाहिये और शुक्र से आधी सामर्थ्य बुध की। लेकिन चन्द्रमा का बल सब ग्रहों की सामर्थ्य का बीज (मूल) है । चन्द्रक्रियादि अब चन्द्रक्रिया, चन्द्र अवस्था तथा चन्द्रवेला कैसे निकालना और उनका क्या फल है यह बताते हैं। जन्मकुंडली विचार, प्रश्न कुंडली विचार तथा मुहूर्त विचार तीनों में चन्द्र क्रिया, चन्द्र अवस्था तथा चन्द्रवेला का विचार करें। चन्द्र क्रिया कुल ६० होती हैं। चन्द्र अवस्था १२ तथा चन्द्र वेला ३६ । जन्मर्क्षविघटी नीतैर्ज्ञानाङ्गैर्ननयैर्भजेत् । लब्धाश्चन्द्रक्रियावस्थावेलाख्यास्तत्फलं क्रमात् ॥१२॥ यह देखिये कि किस नक्षत्र में जन्म है या प्रश्न या मुहूर्त के समय कौन- सा नक्षत्र है । जितने घड़ी और पल व्यतीत हो चुके हों—उनके पल बना लीजिये :— (१) चन्द्रक्रिया—इन पलों में ६० का भाग दीजिये—जो भजनफल आवे उसका फल नीचे १३-१५ श्लोकों में बताया है । (२) जन्म मुहूर्त या प्रश्न के समय जितना नक्षत्र बीत चुका है— उसकी पल बना लीजिये । ३०० का भाग दीजिये । जो लब्धि या भजनफल आया वह चन्द्र-अवस्था हुई । प्रत्येक का फल नीचे १६वें श्लोक में बताया गया है । (३) जन्म, प्रश्न या मुहूर्त के समय जितने घड़ी, पल बीत चुके हैं— उनके पल बनाकर १०० का भाग दीजिये । जो लब्धि या भजनफल आवे वह चन्द्रवेला हुई । प्रत्येक चन्द्र वेला का फल आगे श्लोक १७-१९ में बताया है ।
९२ फलदीपिका चन्द्रक्रिया फल स्थानाद्भ्रष्टस्तपस्वी परयुवतिरतो द्यूतकृद्धस्तिमुख्या- रूढः सिंहासनस्थो नरपतिररिहा दण्डनेता गुणी च । निष्प्राणश्छिन्नमूर्द्धा क्षतकरचरणो बन्धनस्थो विनष्टो राजा वेदानधीते स्वपिति सुचरितः संस्मृतो धर्मकर्ता ॥१३॥ सद्द्वंश्यो निधिसंगतः श्रुतकुलो व्याख्यापरः शत्रुहा रोगी शत्रुजितः स्वदेशचलितो भृत्यो विनष्टार्थकः । अस्थानो च सुमन्त्रकः परमहीभर्ता सभार्यो गज- त्रस्तः संयुगभीतिमानतिभयो लीनोन्नदाताग्निगः ॥१४॥ क्षुद्बाधासहितोऽन्मत्ति विचरन्मांसाननोऽस्त्रक्षतः सोद्वाहो धृतकन्दुको विहरति द्यूतैर्नृपो दुःखितः । शय्यास्थो रिपुसेवितश्च ससुहृद्योगी च भार्यान्वितो मिष्टाशी च पयः पिबन् सुकृतकृत् स्वस्थस्तथास्ते सुखम् ॥१५॥ (१) स्थान भ्रष्ट, (२) तपस्वी, (३) दूसरे की युवती में रत, (४) जुआ खेलने वाला, (५) मुख्य हाथी पर चढ़ा हुआ, (६) सिंहासन पर बैठा हुआ, (७) राजा, (८) शत्रुओं का नाश करने वाला, (९) सेना- पति या फौजदार, (१०) गुणी । (११) निष्प्राण (निःशक्त या मरा हुआ), (१२) जिसका सिर कटा हुआ है, (१३) जिसके हाथ और पैर में चोट लगी हुई है, (१४) गिरफ्तार (बन्धन में), (१५) विनष्ट, (१६) राजा, (१७) वेदों को पढ़ता है, (१८) सोता है, (१९) सच्चरित्र, (२०) धर्माचरण करने वाला। (२१) अच्छे वंश (कुल) का (२२) खज़ाना प्राप्त करने वाला,
चौथा अध्याय ग्रह बल ९३ (२३) प्रसिद्ध या विद्वान् कुल का, (२४) व्याख्या करने वाला, (२५) शत्रुओं का नाश करने वाला, (२६) रोगी (२७) शत्रुओं से हराया हुआ, (२८) जिसने अपना देश छोड़ दिया है, (२९) नौकर, (३०) जिसका धन नष्ट हो गया है । (३१) राजसभा में रहने वाला, (३२) अच्छा मंत्री या विचार देने वाला, (३३) दूसरे की पृथ्वी का स्वामी, (३४) पत्नी सहित, (३५) हाथी से डरा हुआ, (३६) डरपोक, (३७) बहुत डरा हुआ, (३८) छिप- कर रहने वाला, (३९) जो दूसरों को अन्न देता हो, (४०) अग्नि में पड़ा हुआ । (४१) भूखा, (४२) अन्न खाता हुआ, (४३) भ्रमण करने वाला, (४४) मांस खाने वाला, (४५) अस्त्र से जिसको घाव लगा है, (४६) विवाहित, (४७) जिसके हाथ में गेंद है, (४८) जुआ खेलने वाला, (४९) राजा, (५०) दुःखित । (५१) शय्या में लेटा हुआ, (५२) जिसकी सेवा शत्रु करें, (५३) मित्र सहित, (५४) योगी, (५५) भार्या सहित, (५६) मिठाई खाने वाला, (५७) दूध पीने वाला, (५८) अच्छे कर्म करने वाला, (५९) स्वस्थ, (६०) सुखी ॥ १३-१५ ॥ चन्द्र-अवस्था फल आत्मस्थानात्प्रवासो महितनृपहितो दासता प्राणहानि- र्भूपालत्वं स्ववंशोचितगुणनिरतो रोग आस्थानवत्त्वम् । भीतिः क्षुद्बाधितत्वं युवतिपरिणयो रम्यशय्यानुषक्ति र्मृष्टाशित्वं च गीता इति नियमवशात्सद्भिरिन्दोरवस्था ॥१६॥ (१) अपने घर से बाहर गया हुआ, (२) किसी बड़े राजा का कृपा पात्र, (३) दासता से प्राण हानि, (४) भूपालत्व (राजत्व), (५) अपने कुलोचित गुणों से युक्त, (६) रोग, (७) राज दरबार में होना, (८) भय, (९) भूख से व्याकुल (१०) युवती से विवाह, (११) सुन्दर शय्या में आराम की इच्छा, (१२) उत्तम भोजन करने वाला ॥ १६ ॥
९४ फलदीपिका चन्द्रवेला-फल मूर्द्धामयो मुदितता यजनं सुखस्थो नेत्रामयः सुखितता वनिताविहारः । उग्रज्वरः कनकभूषणमश्रुमोक्षः क्ष्वेला नं निधुवनं जठरस्य रोगः ॥ १७ ॥ क्रीडा जले हसनचित्रविलेखने च क्रोधश्च नृत्तकरणं घृतभुक्तिनिद्रे । दानक्रिया दशनरुक् कलहः प्रयाण- मुन्मत्तता च सलिलाप्लवनं विरोधः ॥ १८ ॥ स्वेच्छास्नानं क्षुद्भयं शास्त्रलाभं स्वैरं गोष्ठी योधनं पुण्यकर्म । पापा चारः क्रूरक र्मा प्रहर्षं प्राज्ञैरेवं चन्द्रवेला प्रदिष्टा ॥ १९ ॥ ३६ चन्द्र वेलाओं का फल निम्नलिखित है :- (१) सिरदर्द, (२) प्रसन्नता, (३) यज्ञ करना, (४) सुखी या सुखपूर्वक बैठा हुआ, (५) नेत्र रोग, (६) सुखी होना, (७) स्त्रियों से विहार, (८) तीव्र ज्वर, (९) सोने के आभूषण, (१०) नेत्रों से आंसू बहाते हुए, (११) जहर खाना, (१२) संभोग करना । (१३) पेट का रोग, (१४) जल में क्रीड़ा करना, हंसना, चित्रकला करना, (१५) क्रोध, (१६) नृत्य करना, (१७) घी खाना, (१८) सोना (निद्रा), (१९) दान देना, (२०) दांत का रोग, (२१) कलह (झगड़ा), (२२) यात्रा करना, (२३) उन्मत्तता, (नशा या पागलपन), (२४) पानी में तैरना । (२५) विरोध, (२६) अपनी इच्छा से स्नान करना, (२७) भूख, (२८) भय, (२९) शास्त्राध्ययन, (३०) अपनी मनमानी करने वाला, (३१) गोष्ठी (दोस्तों के साथ गपशप), (३२)युद्ध करना, (३३) पुण्य कर्म, (३४) पापाचार, (३४) क्रूर कर्म करने वाला, (३६) हर्ष ॥१९॥
चौथा अध्याय : ग्रह बल ९५ चन्द्र क्रिया देखने के लिये एक नक्षत्र के ६० भाग १३ अंश २० कला एक नक्षत्र का मान होता है। प्रत्येक भाग १३ कला, २० विकला का होता है। अंश कला विकला अं. क. वि. अं. क. वि. अं. क. वि. ( १) ०-१३-२० (१६) ३-३३-२० (३१) ६-५३-२० (४६) १०-१३-२० ( २) ०-२६-४० (१७) ३-४६-४० (३२) ७- ६-४० (४७) १०-२६-४० ( ३) ०-४०- ० (१८) ४- ०- ० (३३) ७-२०- ० (४८) १०-४०- ० ( ४) ०-५३-२० (१९) ४-१३-२० (३४) ७-३३-२० (४९) १०-५३-२० ( ५) १- ६-४० (२०) ४-२६-४० (३५) ७-४६-४० (५०) ११- ६-४० ( ६) १-२०- ० (२१) ४-४०- ० (३६) ८- ०- ० (५१) ११-२०- ० ( ७) १-३३-२० (२२) ४-५३-२० (३७) ८-१३-२० (५२) ११-३३-२० ( ८) १-४६-४० (२३) ५- ६-४० (३८) ८-२६-४० (५३) ११-४६-४० ( ९) २- ०- ० (२४) ५-२०- ० (३९) ८-४०- ० (५४) १२- ०- ० (१०) २-१३-२० (२५) ५-३३-२० (४०) ८-५३-२० (५५) १२-१३-२० (११) २-२६-४० (२६) ५-४६-४० (४१) ९- ६-४० (५६) १२-३६-४० (१२) २-४०- ० (२७) ६- ०- ० (४२) ९-२०- ० (५७) १२-४०- ० (१३) २-५३-२० (२८) ६-१३-२० (४३) ९-३३-२० (५८) १२-५३-२० (१४) ३- ६-४० (२८) ६-२६-४० (४४) ९-४६-४० (५९) १३- ६-४० (१५) ३-२०- ० (३०) ६-४०- ० (४५) १०-०- ० (६०) १३- २०-० उदाहरण के लिये किसी का चन्द्र स्पष्ट ११-२०-३७-२१ है तो रेवती नक्षत्र का मान ११-१६-४० से १२-०-० तक होने से स्पष्ट चन्द्र ११-२०-३७-२१ रेवती नक्षत्र का प्रारंभ ११-१६-४०- ० गत रेवती नक्षत्र ――――――――――― ३-५७-२१
९६ फलदीपिका अब ऊपर की सारिणी (टेबिल) देखने से विदित हुआ कि ३-४६-४० पर १७वां भाग व्यतीत हो गया । १८वां भाग ४-०-० पर समाप्त होता है। इस कारण १७ भाग गत होने से १७वें भाग का चन्द्र क्रिया का फल हुआ जो वेदों को पढ़ता है। अर्थात् ऐसा व्यक्ति विद्वान् होता है । चन्द्र-अवस्था देखने के लिये एक नक्षत्र के १२ भाग किये १३ अंश, २० कला, एक नक्षत्र का मान होता है। एक भाग का मान १-६-४० हुआ । अं. क. वि. अं. क. वि. अं. क. वि. (१) १- ६-४० (५) ५-३३-२० (९) १०- ०- ० (२) २-१३-२० (६) ६-४०- ० (१०) ११- ६-४० (३) ३-२०- ० (७) ७-४६-४० (११) १२-१३-२० (४) ४-२६-४० (८) ८-५३-२० (१२) १३-२०- ० उदाहरण के लिये गत रेवती नक्षत्र ३°-५७'-२१" है (गत नक्षत्र का मान कैसे निकालना है यह चन्द्र क्रिया के उदाहरण में ऊपर बताया गया है) । (३) भाग ३°-२०"-०" पर समाप्त होता है। (४) भाग ४°२६'४०" पर समाप्त होगा । इस प्रकार गत भाग ३ हुए । इसका फल हुआ 'दासता से प्राण हानि, अर्थात् दूसरे की नौकरी में किसी कार्य को करने के प्रयत्न में मृत्यु । प्राण-शक्ति (स्वाभाविक प्राण-जीवनदायिनी शक्ति) का ह्रास या कमी इसका फल मान सकते हैं। चन्द्र वेला देखने के लिये एक नक्षत्र को ३६ भागों में विभाजित किया । एक नक्षत्र का मान १३°-२०' होता है। प्रत्येक भाग का मान ०-२२ कला, १३ विकला २० प्रतिविकला हुआ ।
चौथा अध्याय : ग्रह बल ९७ चन्द्र वेला सारिणी अ. क. वि. प्र.वि. अं. क. वि. प्र.वि. अं. क. वि. प्र.वि. ( १ ) ०-२२-१३-२० ( १३ ) ४-४८-५३-२० ( २५ ) ९-१५-३३-२० ( २ ) ०-४४-२६-४० ( १४ ) ५-११- ६-४० ( २६ ) ९-३७-४६-४० ( ३ ) १- ६-४०- ० ( १५ ) ५-३३-२०- ० ( २७ ) १०- ०- ०- ० ( ४ ) १-२८-५३-२० ( १६ ) ५-५५-३३-२० ( २८ ) १०-२२-१३-२० ( ५ ) १-५१- ६-४० ( १७ ) ६-१७-४६-४० ( २९ ) १०-४४-२६-४० ( ६ ) २-१३-२०- ० ( १८ ) ६-४०- ०- ० ( ३० ) ११- ६-४०- ० ( ७ ) २-३५-३३-२० ( १९ ) ७- २-१३-२० ( ३१ ) ११-२८-५३-२० ( ८ ) २-५७-४६-४० ( २० ) ७-२४-२६-४० ( ३२ ) ११-५१- ६-४० ( ९ ) ३-२०- ०- ० ( २१ ) ७-४६-४०- ० ( ३३ ) १२-१३-२०- ० ( १० ) ३-४२-१३-२० ( २२ ) ८- ८-५३-२० ( ३४ ) १२-३५-३३-२० ( ११ ) ४- ४-२६-४० ( २३ ) ८-३१- ६-४० ( ३५ ) १२-५७-४६-४० ( १२ ) ४-२६-४०- ० ( २४ ) ८-५३-२०- ० ( ३६ ) १३-२०- ०- ० उदाहरण के लिये गत रेवती नक्षत्र ३ अं. ५७ कं. २१ वि. है । (देखिये पृष्ठ ९५) । भाग (१०) ३-४२-१३-२० पर समाप्त होता है । भाग (११) ४-४-२६-४० पर समाप्त होता है। इस कारण गत भाग (१०) हुआ । इसका फल ‘आँसू बहाते हुए’ दिया गया है । अर्थात् ऐसा जातक दुःखी रहेगा । जातके च मुहूर्ते च प्रश्ने चन्द्रक्रियादयः । सम्यक् फलप्रदास्तस्माद्विशेषेण विचिन्तयेत् ॥ २० ॥ जन्म कुंडली, मुहूर्त तथा प्रश्न कुंडली में चन्द्रक्रिया आदि का फल बहुत मिलता है इसलिये इनका विशेष विचार करें ॥ २० ॥
९८ फलदीपिका पक्षोद्भवं हिमकरस्य विशेष्टामाहुः स्थानोद्भवं तु बलमप्यधिकं परेषाम् । तत्संप्रयुक्तमितरैरधिकाधिकं स्या- दन्यानि तेन सदृशानि बहूनि ते स्युः ॥ २१ ॥ चन्द्रमा के पक्षबल को विशिष्ट (विशेष महत्त्व का ) कहा है । अन्य ग्रहों के स्थान बल को विशेष महत्त्व देना चाहिये । वैसे कई प्रकार के बलों के योग से—षड् बल पिंड में ग्रहों के षड्बलों का योग—किसी का किसी से अधिक हो जाता है क्योंकि कई प्रकार के बलों में कोई किसी प्रकार के बल में अधिक होता है, कोई किसी अन्य प्रकार के बल में । बलपिंड सार्द्धानि षट्तीक्ष्णकरो बलीयान् चन्द्रस्तु षट्पञ्च वसुन्धराजः सप्तेन्दुसूनो रविवद्गुरोस्तु सार्द्धानि पञ्चाथ सितो बली स्यात्।२२॥ अब यह बात बताते हैं कि कितने 'रूप' बल प्राप्त होने पर ग्रह को बली कहना । सूर्य को यदि ६।। रूप बल प्राप्त हों तो वह बली कहलाता है । चन्द्रमा ६ रूप बल मिलने से बली और मंगल ५ रूप बल प्राप्त करने से ही बली समझा जाता है । इसी प्रकार बुध को ७ रूप, बृहस्पति को ६।। और शुक्र को ५।। रूप बल प्राप्त होने से वह बली कहलाता है ॥ २२ ॥ मन्दस्तु पञ्चैव हि षड्बलानां संयोग एवापरथान्यथा स्युः । एवं ग्रहाणां स्वबलाबलानि विचिन्त्य सम्यक्कथयेत्फलानि ॥२३॥ शनि को यदि ५ रूप बल भी प्राप्त हो तो वह बली कहलाता है । यदि किसी ग्रह का षड्बल पिंड ऊपर बतायी गई संख्या से कम हो तो वह निर्बल समझा जावेगा । इस प्रकार किस ग्रह का कितना बल है यह अच्छी तरह विचार कर फलादेश करना चाहिये ॥ २३ ॥
चौथा अध्याय : ग्रह बल ९९ ग्रहों को षड्बल पिंड में—प्रत्येक को कितने रूप प्राप्त होने से वह बली समझा जाना चाहिये यह बता चुके हैं। अब अन्य शास्त्रों के आधार पर यह बताया जाता है कि (१) स्थान, (२) दिक्, (३) चेष्टा, (४) काल और (५) और अयन--इन पांच प्रकार के बलों में प्रत्येक को कितना बल मिलने से वह बली समझा जावे। नैसर्गिक बल में कम-से-कम कितने रूप मिलने चाहिएं यह इसलिये नहीं कहा क्योंकि नैसर्गिक बल का परिमाण, प्रत्येक ग्रह का, प्रत्येक कुंडली में एक ही होता है। ग्रह स्थान दिक् चेष्टा काल अयन योग रू. ष. रू. ष. रू. ष. रू. ष. रू. ष. • रू. ष. सूर्य २-४५ ०-३५ ०-५० १-५२ ०-३० ६-३२ चन्द्र २-१३ ०-५० ०-३० १-४० ०-४० ५-५३ मंगल १-३६ ०-३० ०-४० १- ७ ०-२० ४-१३ बुध २-४५ ०-३५ ०-५० १-५२ ०-३० ६-३२ बृहस्पति २-४५ ०-३५ ०-५० १-५२ ०-३० ६-३२ शुक्र २-१३ ०-५० ०-३० १-४० ०-४० ५-५३ शनि १-३६ ०-३० ०-४० १- ७ ०-२० ४-१३ एक रूप में ६० षष्ट्यंश होते हैं। यहाँ यह शंका नहीं करनी चाहिये कि श्लोक २२ में तो यह कह दिया कि सूर्य के ६ प्रकार के बलों का योग ६।। (६ रूप ३० षष्ट्यंश) हो तो बली समझना और यहाँ केवल पांच प्रकार के बलों का योग ६ रूप ३२ षष्ट्यंश बता दिया। यह इसी प्रकार है जैसे परीक्षा में ६ पत्र हों तो टोटल में ३३ प्रतिशत में पास (सफल या उत्तीर्ण) समझा जाता है, परन्तु प्रति पत्र में ४० प्रतिशत से पास समझा जावे।
१०० फलदीपिका अब भाव बल बताते हैं :— लग्नादिकानामधिपस्य पिण्डे रूपान्विते तद्बलपिण्डमाहुः । गृहस्य यस्यां दिशादिग्बलं स्यात्तद्भाववीर्य सहितस्य दृष्ट्या ॥२४॥ लग्न आदि किसी भाव का बल निकालना हो तो—जिस भाव का बल निकालना है तो उस भावेश को जितना बल (जितने रूप) प्राप्त हों¹ उसमें भाव दिग्बल तथा भाव पर जो दृक्बल हो वह जोड़ने से भाव बल निकल आता है भाव यदि अपने स्वामी, बृहस्पति, शुक्र या बुध से युत हो या अपने स्वामी, बृहस्पति, बुध से दृष्ट हो तो वह बल भी जोड़ना चाहिये । देखिये श्लोक ६ की व्याख्या पृष्ठ ८८ ॥ २४ ॥ भाव बल निकालने का प्रयोजन यह है कि भाव बली है तो उस भाव सम्बन्धी शुभ फल होगा । भाव निर्बल है तो उस भाव सम्बन्धी शुभ फल अल्प होगा, अशुभ फल अधिक होगा । १. एक टीकाकार ने लिखा है कि भावेश बल में एक रूप और जोड़ दें ।