भारतकोश
फलदीपिका (मन्त्रेश्वर दैवज्ञ - सम्पूर्ण २८ अध्याय, भाव-विचार, दशा-फल एवं गोचर सटीक)

फलदीपिका (मन्त्रेश्वर दैवज्ञ - सम्पूर्ण २८ अध्याय, भाव-विचार, दशा-फल एवं गोचर सटीक)

Phaladeepika of Mantreshwara Daivajna with Commentary

मन्त्रेश्वर दैवज्ञ (टीकाकार: पं. सूर्यनारायण व्यास) द्वारा

DevanagariHindipublished684 पृष्ठ

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चौथा अध्याय : ग्रह बल ८९ स्वोच्चे पूर्णं स्वत्रिकोणे त्रिपादं स्वक्षेत्रऽर्द्धं मित्रभे पादमव । द्विट्क्षेत्रेऽल्पं नीचगेऽस्तं गतेऽपि क्षेत्रं वीर्यं निष्फलं स्याद् ग्रहाणाम् ॥ यदि ग्रह अपनी उच्च राशि में हो तो उसे १ रूप बल प्राप्त होता है, यदि मूल त्रिकोण राशि में हो तो ३।४ रूप स्वराशि में १।२ रूप, मित्र राशि में १।४ । शत्रु राशि में बहुत कम बल मिलता है । यदि ग्रह नीच राशि में हो या अस्त हो तो उसे कुछ बल नहीं मिलता ॥ ७ ॥ केन्द्रे ग्रहाणामुदितं बलं यत्सुखे नभस्यस्तगृहे विलग्ने । उपर्युपर्युक्तपदक्रमेण बलाभिवृद्धि हि विकल्पयन्ति ॥८॥ चारों केन्द्रों में किसका कितना महत्त्व है यह बतलाते हैं । लग्न में पूर्ण बली, सप्तम में ३।४, दशम में १।२ और चतुर्थ में १।४ ॥ ८ ॥ अब किस दृष्टि को क्या महत्त्व देना यह समझाते हैं :— श्रेष्ठेति सा सप्तमदृष्टिरेव सर्वत्र वाच्या न तथाऽन्यदृष्टिः । योगादिषु न्यूनफलप्रदेति विशेषदृष्टिर्न तु कैश्चिदुक्ता ॥ ९ ॥ सर्वत्र सप्तम दृष्टि को ही श्रेष्ठ समझना चाहिये । अन्य दृष्टि (नवम, पंचम आदि) का वह प्रभाव नहीं है । किन्तु कुछ अन्य आचार्यों का मत (३) ११-२०-२८-२२ — ६- ०- ०- ० ५-२०-२८-२२ परिवेश (४) १२- ०- ०- ० — ५-२०-२८-२२ ६- ९-३१-३८ इन्द्रचाप