भारतकोश
फलदीपिका (मन्त्रेश्वर दैवज्ञ - सम्पूर्ण २८ अध्याय, भाव-विचार, दशा-फल एवं गोचर सटीक)

फलदीपिका (मन्त्रेश्वर दैवज्ञ - सम्पूर्ण २८ अध्याय, भाव-विचार, दशा-फल एवं गोचर सटीक)

Phaladeepika of Mantreshwara Daivajna with Commentary

मन्त्रेश्वर दैवज्ञ (टीकाकार: पं. सूर्यनारायण व्यास) द्वारा

DevanagariHindipublished684 पृष्ठ

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९० फलदीपिका है कि जहाँ 'योग का विचार करना हो वहां गुरु की नवम पञ्चम (विशेष दृष्टि) मंगल की चतुर्थ, अष्टम (विशेष दृष्टि) तथा शनि की तृतीय, दशम (विशेष दृष्टि) भी सप्तम की भाँति ही पूर्ण फल देने वाली होती है ॥ ९ ॥ ग्रहों की मित्रता या शत्रुता दो प्रकार की होती हैं—नैसर्गिक तथा तात्कालिक—इनमें किसको क्या महत्त्व देना यह बतलाते हैं :— नैसर्गिकं शत्रुसुहृत्त्वमेव भवेत्प्रमाणं फलकारि सम्यक् । तात्कालिकं कार्यवशेन वाच्यं तच्छत्रुमित्रत्वमनित्यमेव ॥१०॥ ग्रहों की नैसर्गिक या स्वाभाविक मित्रता, शत्रुता आदि ही विशेष फल देने वाली होती है—तात्कालिक शत्रुता, मित्रता कार्यवश¹ कहनी चाहिये—वह स्थायी नहीं होती । (जो ग्रह नैसर्गिक शत्रु हैं—वह एक की महादशा एक की अन्तर्दशा होने पर अच्छा फल नहीं दिखाते । लग्न का शत्रु, या जिस भाव का विचार करना है उस भावेश का शत्रु भी अपनी दशा अन्तर्दशा में अपने शत्रु के भाव को बिगाड़ता है—यह सब विचार करना चाहिये ।) निःशेषदोषहरणे शुभवर्द्धने च वीर्यं गुरोरधिकमस्त्यखिलग्रहेभ्यः । तद्वीर्यपाददलशक्तिभृतौ ज्ञशुक्रौ चान्द्रं बलं तु निखिलग्रहवीर्यबीजम् ॥ ११॥ १. मूल संस्कृत श्लोक में 'कार्यवश शब्द आया है । यद्यपि फल- दीपिका जातक का ग्रंथ है—प्रश्न का नहीं, तथापि प्रश्न कुंडली में 'कार्य' होगा या नहीं—इसमें तात्कालिक संबंध देखना ।