फलदीपिका (मन्त्रेश्वर दैवज्ञ - सम्पूर्ण २८ अध्याय, भाव-विचार, दशा-फल एवं गोचर सटीक)
Phaladeepika of Mantreshwara Daivajna with Commentary
मन्त्रेश्वर दैवज्ञ (टीकाकार: पं. सूर्यनारायण व्यास) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंचौथा अध्याय ग्रह बल ९१ सब दोषों को दूर करने में और शुभ फल को बढ़ाने में बृहस्पति सबसे अधिक शक्तिशाली है । जितनी शुभता की सामर्थ्य बृहस्पति की है उसकी आधी शुक्र की समझनी चाहिये और शुक्र से आधी सामर्थ्य बुध की। लेकिन चन्द्रमा का बल सब ग्रहों की सामर्थ्य का बीज (मूल) है । चन्द्रक्रियादि अब चन्द्रक्रिया, चन्द्र अवस्था तथा चन्द्रवेला कैसे निकालना और उनका क्या फल है यह बताते हैं। जन्मकुंडली विचार, प्रश्न कुंडली विचार तथा मुहूर्त विचार तीनों में चन्द्र क्रिया, चन्द्र अवस्था तथा चन्द्रवेला का विचार करें। चन्द्र क्रिया कुल ६० होती हैं। चन्द्र अवस्था १२ तथा चन्द्र वेला ३६ । जन्मर्क्षविघटी नीतैर्ज्ञानाङ्गैर्ननयैर्भजेत् । लब्धाश्चन्द्रक्रियावस्थावेलाख्यास्तत्फलं क्रमात् ॥१२॥ यह देखिये कि किस नक्षत्र में जन्म है या प्रश्न या मुहूर्त के समय कौन- सा नक्षत्र है । जितने घड़ी और पल व्यतीत हो चुके हों—उनके पल बना लीजिये :— (१) चन्द्रक्रिया—इन पलों में ६० का भाग दीजिये—जो भजनफल आवे उसका फल नीचे १३-१५ श्लोकों में बताया है । (२) जन्म मुहूर्त या प्रश्न के समय जितना नक्षत्र बीत चुका है— उसकी पल बना लीजिये । ३०० का भाग दीजिये । जो लब्धि या भजनफल आया वह चन्द्र-अवस्था हुई । प्रत्येक का फल नीचे १६वें श्लोक में बताया गया है । (३) जन्म, प्रश्न या मुहूर्त के समय जितने घड़ी, पल बीत चुके हैं— उनके पल बनाकर १०० का भाग दीजिये । जो लब्धि या भजनफल आवे वह चन्द्रवेला हुई । प्रत्येक चन्द्र वेला का फल आगे श्लोक १७-१९ में बताया है ।