फलदीपिका (मन्त्रेश्वर दैवज्ञ - सम्पूर्ण २८ अध्याय, भाव-विचार, दशा-फल एवं गोचर सटीक)
Phaladeepika of Mantreshwara Daivajna with Commentary
मन्त्रेश्वर दैवज्ञ (टीकाकार: पं. सूर्यनारायण व्यास) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें९२ फलदीपिका चन्द्रक्रिया फल स्थानाद्भ्रष्टस्तपस्वी परयुवतिरतो द्यूतकृद्धस्तिमुख्या- रूढः सिंहासनस्थो नरपतिररिहा दण्डनेता गुणी च । निष्प्राणश्छिन्नमूर्द्धा क्षतकरचरणो बन्धनस्थो विनष्टो राजा वेदानधीते स्वपिति सुचरितः संस्मृतो धर्मकर्ता ॥१३॥ सद्द्वंश्यो निधिसंगतः श्रुतकुलो व्याख्यापरः शत्रुहा रोगी शत्रुजितः स्वदेशचलितो भृत्यो विनष्टार्थकः । अस्थानो च सुमन्त्रकः परमहीभर्ता सभार्यो गज- त्रस्तः संयुगभीतिमानतिभयो लीनोन्नदाताग्निगः ॥१४॥ क्षुद्बाधासहितोऽन्मत्ति विचरन्मांसाननोऽस्त्रक्षतः सोद्वाहो धृतकन्दुको विहरति द्यूतैर्नृपो दुःखितः । शय्यास्थो रिपुसेवितश्च ससुहृद्योगी च भार्यान्वितो मिष्टाशी च पयः पिबन् सुकृतकृत् स्वस्थस्तथास्ते सुखम् ॥१५॥ (१) स्थान भ्रष्ट, (२) तपस्वी, (३) दूसरे की युवती में रत, (४) जुआ खेलने वाला, (५) मुख्य हाथी पर चढ़ा हुआ, (६) सिंहासन पर बैठा हुआ, (७) राजा, (८) शत्रुओं का नाश करने वाला, (९) सेना- पति या फौजदार, (१०) गुणी । (११) निष्प्राण (निःशक्त या मरा हुआ), (१२) जिसका सिर कटा हुआ है, (१३) जिसके हाथ और पैर में चोट लगी हुई है, (१४) गिरफ्तार (बन्धन में), (१५) विनष्ट, (१६) राजा, (१७) वेदों को पढ़ता है, (१८) सोता है, (१९) सच्चरित्र, (२०) धर्माचरण करने वाला। (२१) अच्छे वंश (कुल) का (२२) खज़ाना प्राप्त करने वाला,