फलदीपिका (मन्त्रेश्वर दैवज्ञ - सम्पूर्ण २८ अध्याय, भाव-विचार, दशा-फल एवं गोचर सटीक)
Phaladeepika of Mantreshwara Daivajna with Commentary
मन्त्रेश्वर दैवज्ञ (टीकाकार: पं. सूर्यनारायण व्यास) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें८६ फलदीपिका अब अयन बल बताते हैं। शनि बुध और चन्द्र दक्षिण अयन में बलवान् होते हैं। अन्य ग्रह उत्तर अयन में ॥ २ ॥ स्वोच्चस्वर्क्षसुहृद्गृहेषु बलिनः षट्सु स्ववर्गेषु वा प्रोक्तं स्थानबलं चतुष्टयमुखात्पूर्णार्द्धपादाः क्रमात् । मध्याद्यन्तकषण्डमर्त्यवनिताः खेटा बलिष्ठाः क्रमात् मन्दारज्ञगुरूशनोब्जरवयो नैजे बले वर्द्धनाः ॥३॥ ग्रह को अपनी उच्च, स्व (अपनी) या मित्र राशि या छः वर्गों में स्थित होने के कारण जो बल प्राप्त होता है उसे स्थान बल कहते हैं। ग्रह यदि केन्द्र में हो तो एक रूप बल मिलता है, पणफर में हो तो आधा रूप और यदि आपोक्लिम में हो तो चौथाई रूप बल मिलता है। नपुंसक ग्रह राशि के मध्यम में (११° से २०°) पुरुष ग्रह राशि के प्रथम भाग (१° से १०° तक) में, तथा स्त्रीग्रह अंतिम भाग (२१° से ३०° तक) बली होते हैं। नैसर्गिक बल में शनि, मंगल, बुध, गुरु, शुक्र, चन्द्र तथा सूर्य क्रमशः अधिकाधिक बली होते हैं। अर्थात् शनि से बली मंगल, मंगल से बली बुध इत्यादि ॥ ३ ॥ वक्रं गतो रुचिररश्मिसमहपूर्णो नीचारिभांशसहितोऽपि भवेत्स खेटः । वीर्यान्वितस्तुहिनरश्मिरिवोच्चमित्र- स्वक्षेत्रगोऽपि विबलो हतदीधितिश्चेत् ॥ ४ ॥