भारतकोश
फलदीपिका (मन्त्रेश्वर दैवज्ञ - सम्पूर्ण २८ अध्याय, भाव-विचार, दशा-फल एवं गोचर सटीक)

फलदीपिका (मन्त्रेश्वर दैवज्ञ - सम्पूर्ण २८ अध्याय, भाव-विचार, दशा-फल एवं गोचर सटीक)

Phaladeepika of Mantreshwara Daivajna with Commentary

मन्त्रेश्वर दैवज्ञ (टीकाकार: पं. सूर्यनारायण व्यास) द्वारा

DevanagariHindipublished684 पृष्ठ

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पृष्ठ 86

चौथा अध्याय : ग्रह बल ८५ वीर्यं षड्विधमाह कालजबलं चेष्टाबलं स्वोच्चजं दिग्वीर्यं त्वयनोद्भवं दिविषदां स्थानोद्भवं च क्रमात् । निश्यारेन्दुसिताः परे दिवि सदा ज्ञः शुक्लपक्षे शुभाः; कृष्णेऽन्ये च निजाब्दमासदिनहोरास्वङ्घ्रिवृद्ध्या क्रमात् ॥१॥ ग्रह का बल छः प्र कार का होता है काल बल, चेष्टाबल, उच्च बल, दिक् बल, अयन बल और स्थान बल। मंगल चन्द्रमा और शुक्र रात्रि में बलवान् होते हैं—अन्य ग्रह दिन में। बुध रात्रि हो या दिन सदैव बलवान् समझा जाता है। शुक्ल पक्ष में शुभ ग्रह बलवान् होते हैं— अन्य ग्रह कृष्ण पक्ष में। अब्द पति को चौथाई रूप बल प्राप्त होता है। मास पति (जो ग्रह मास का स्वामी हो) को आधा रूप बल मिलता है। दिन पति (जन्म के दिन जिस ग्रह का वार हो ) को ३/४ रूप तथा जन्म के समय जिस ग्रह की होरा हो उसे १ रूप बल मिलता है ॥ १ ॥ राकाचन्द्रस्य चेष्टाबलमुदगयने भास्वतो वक्रगानां युद्धे चोदक्स्थितानां स्फुटबहुलरुचां स्वोच्चवीर्यं स्वतुङ्गे । दिग्वीर्यं खेडर्कभौमौ सुहृदि शशिसितौ विद्गुरू लग्नगौ चे- न्मन्देऽस्ते याम्यमार्गे बुधशनिशशिनोऽन्येऽयनाख्ये परस्मिन् ॥२॥ चन्द्रमा को पूर्णिमा के दिन पूर्ण चेष्टाबल प्राप्त होता है। सूर्य को उत्तर अयन में चेष्टाबल मिलता है। अन्य ग्रह जब वक्री होते हैं तब उन्हें चेष्टा बल प्राप्त होता है। ग्रहों के युद्ध में जो अस्त न हो और जो उत्तर की ओर हो उसे विजयी समझना चाहिये। जब ग्रह अपने परमोच्च स्थान (अंश) पर हो तब उसे पूर्ण उच्च बली समझना चाहिये। अब दिक् बल बताते हैं। दशम में सूर्य और मंगल बली होते हैं। चन्द्रमा और शुक्र चतुर्थ में बली होते हैं। बुध और बृहस्पति लग्न में बली होते हैं। शनि सप्तम में।