फलदीपिका (मन्त्रेश्वर दैवज्ञ - सम्पूर्ण २८ अध्याय, भाव-विचार, दशा-फल एवं गोचर सटीक)
Phaladeepika of Mantreshwara Daivajna with Commentary
मन्त्रेश्वर दैवज्ञ (टीकाकार: पं. सूर्यनारायण व्यास) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें८४ फलदीपिका है। यदि चतुर्थ में हों तो शून्य। बीच के किसी भाव में हो तो त्रैराशिक से निकालिये। (ग) कर्क और वृश्चिक कीट राशियाँ हैं। यदि यह सप्तम में हों तो एक रूप बल प्राप्त होता है। लग्न में हों तो शून्य। मध्य के किसी भाव में हो तो त्रैराशिक से निकालिये। (घ) मीन और मकर का पश्चिमार्द्धं जलराशियाँ हैं। यह चतुर्थ में हों तो तो इन्हें १ रूप बल प्राप्त होता है। दशम में शून्य। मध्य में अनुपात से। शुभाशुभ दृष्टिबल भाव पर शुभ दृष्टि अधिक हो तो उसमें से अशुभ दृष्टि कम करके, जो शेष बचे उसे भावेश बल तथा भाव दिक्बल में जोड़ने से भावेश बल होता है। यदि भाव पर अशुभ दृष्टि अधिक है तो अशुभ दृष्टि में से शुभ दृष्टि घटाकर जो शेष बचे उसे भावेश बल* तथा भाव दिक् बल के योग में से घटाने से भावबल निकलता है। भाव पर शुभाशुभ दृष्टि कैसे निकाली जाती है यह विस्तृत विषय है। जातक पद्धति आदि से समझना चाहिये। √ ऊपर जो ग्रह बल और भाव बल के विषय में कुछ रूप रेखा मात्र दिखाई गई है वह केवल परिचय मात्र है। फल दीपिका के चतुर्थ अध्याय में मंत्रेश्वर ने यही विषय बतलाया है। अब नीचे फलदीपिका के श्लोकों का भावार्थ बताया जाता है :— *जो ग्रह भाव का स्वामी हो। √ग्रहों का षड्बल तथा भाव बल का विस्तृत परिचय प्राप्त करने के लिये देखिये (१) केशवी जातक, (२) श्रीपति पद्धति तथा वटश्रेणि भूदेव प्रणीत जातक-पद्धति।