फलदीपिका (मन्त्रेश्वर दैवज्ञ - सम्पूर्ण २८ अध्याय, भाव-विचार, दशा-फल एवं गोचर सटीक)
Phaladeepika of Mantreshwara Daivajna with Commentary
मन्त्रेश्वर दैवज्ञ (टीकाकार: पं. सूर्यनारायण व्यास) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें९६ फलदीपिका अब ऊपर की सारिणी (टेबिल) देखने से विदित हुआ कि ३-४६-४० पर १७वां भाग व्यतीत हो गया । १८वां भाग ४-०-० पर समाप्त होता है। इस कारण १७ भाग गत होने से १७वें भाग का चन्द्र क्रिया का फल हुआ जो वेदों को पढ़ता है। अर्थात् ऐसा व्यक्ति विद्वान् होता है । चन्द्र-अवस्था देखने के लिये एक नक्षत्र के १२ भाग किये १३ अंश, २० कला, एक नक्षत्र का मान होता है। एक भाग का मान १-६-४० हुआ । अं. क. वि. अं. क. वि. अं. क. वि. (१) १- ६-४० (५) ५-३३-२० (९) १०- ०- ० (२) २-१३-२० (६) ६-४०- ० (१०) ११- ६-४० (३) ३-२०- ० (७) ७-४६-४० (११) १२-१३-२० (४) ४-२६-४० (८) ८-५३-२० (१२) १३-२०- ० उदाहरण के लिये गत रेवती नक्षत्र ३°-५७'-२१" है (गत नक्षत्र का मान कैसे निकालना है यह चन्द्र क्रिया के उदाहरण में ऊपर बताया गया है) । (३) भाग ३°-२०"-०" पर समाप्त होता है। (४) भाग ४°२६'४०" पर समाप्त होगा । इस प्रकार गत भाग ३ हुए । इसका फल हुआ 'दासता से प्राण हानि, अर्थात् दूसरे की नौकरी में किसी कार्य को करने के प्रयत्न में मृत्यु । प्राण-शक्ति (स्वाभाविक प्राण-जीवनदायिनी शक्ति) का ह्रास या कमी इसका फल मान सकते हैं। चन्द्र वेला देखने के लिये एक नक्षत्र को ३६ भागों में विभाजित किया । एक नक्षत्र का मान १३°-२०' होता है। प्रत्येक भाग का मान ०-२२ कला, १३ विकला २० प्रतिविकला हुआ ।