फलदीपिका (मन्त्रेश्वर दैवज्ञ - सम्पूर्ण २८ अध्याय, भाव-विचार, दशा-फल एवं गोचर सटीक)
Phaladeepika of Mantreshwara Daivajna with Commentary
मन्त्रेश्वर दैवज्ञ (टीकाकार: पं. सूर्यनारायण व्यास) द्वारा
९६ फलदीपिका अब ऊपर की सारिणी (टेबिल) देखने से विदित हुआ कि ३-४६-४० पर १७वां भाग व्यतीत हो गया । १८वां भाग ४-०-० पर समाप्त होता है। इस कारण १७ भाग गत होने से १७वें भाग का चन्द्र क्रिया का फल हुआ जो वेदों को पढ़ता है। अर्थात् ऐसा व्यक्ति विद्वान् होता है । चन्द्र-अवस्था देखने के लिये एक नक्षत्र के १२ भाग किये १३ अंश, २० कला, एक नक्षत्र का मान होता है। एक भाग का मान १-६-४० हुआ । अं. क. वि. अं. क. वि. अं. क. वि. (१) १- ६-४० (५) ५-३३-२० (९) १०- ०- ० (२) २-१३-२० (६) ६-४०- ० (१०) ११- ६-४० (३) ३-२०- ० (७) ७-४६-४० (११) १२-१३-२० (४) ४-२६-४० (८) ८-५३-२० (१२) १३-२०- ० उदाहरण के लिये गत रेवती नक्षत्र ३°-५७'-२१" है (गत नक्षत्र का मान कैसे निकालना है यह चन्द्र क्रिया के उदाहरण में ऊपर बताया गया है) । (३) भाग ३°-२०"-०" पर समाप्त होता है। (४) भाग ४°२६'४०" पर समाप्त होगा । इस प्रकार गत भाग ३ हुए । इसका फल हुआ 'दासता से प्राण हानि, अर्थात् दूसरे की नौकरी में किसी कार्य को करने के प्रयत्न में मृत्यु । प्राण-शक्ति (स्वाभाविक प्राण-जीवनदायिनी शक्ति) का ह्रास या कमी इसका फल मान सकते हैं। चन्द्र वेला देखने के लिये एक नक्षत्र को ३६ भागों में विभाजित किया । एक नक्षत्र का मान १३°-२०' होता है। प्रत्येक भाग का मान ०-२२ कला, १३ विकला २० प्रतिविकला हुआ ।
चौथा अध्याय : ग्रह बल ९७ चन्द्र वेला सारिणी अ. क. वि. प्र.वि. अं. क. वि. प्र.वि. अं. क. वि. प्र.वि. ( १ ) ०-२२-१३-२० ( १३ ) ४-४८-५३-२० ( २५ ) ९-१५-३३-२० ( २ ) ०-४४-२६-४० ( १४ ) ५-११- ६-४० ( २६ ) ९-३७-४६-४० ( ३ ) १- ६-४०- ० ( १५ ) ५-३३-२०- ० ( २७ ) १०- ०- ०- ० ( ४ ) १-२८-५३-२० ( १६ ) ५-५५-३३-२० ( २८ ) १०-२२-१३-२० ( ५ ) १-५१- ६-४० ( १७ ) ६-१७-४६-४० ( २९ ) १०-४४-२६-४० ( ६ ) २-१३-२०- ० ( १८ ) ६-४०- ०- ० ( ३० ) ११- ६-४०- ० ( ७ ) २-३५-३३-२० ( १९ ) ७- २-१३-२० ( ३१ ) ११-२८-५३-२० ( ८ ) २-५७-४६-४० ( २० ) ७-२४-२६-४० ( ३२ ) ११-५१- ६-४० ( ९ ) ३-२०- ०- ० ( २१ ) ७-४६-४०- ० ( ३३ ) १२-१३-२०- ० ( १० ) ३-४२-१३-२० ( २२ ) ८- ८-५३-२० ( ३४ ) १२-३५-३३-२० ( ११ ) ४- ४-२६-४० ( २३ ) ८-३१- ६-४० ( ३५ ) १२-५७-४६-४० ( १२ ) ४-२६-४०- ० ( २४ ) ८-५३-२०- ० ( ३६ ) १३-२०- ०- ० उदाहरण के लिये गत रेवती नक्षत्र ३ अं. ५७ कं. २१ वि. है । (देखिये पृष्ठ ९५) । भाग (१०) ३-४२-१३-२० पर समाप्त होता है । भाग (११) ४-४-२६-४० पर समाप्त होता है। इस कारण गत भाग (१०) हुआ । इसका फल ‘आँसू बहाते हुए’ दिया गया है । अर्थात् ऐसा जातक दुःखी रहेगा । जातके च मुहूर्ते च प्रश्ने चन्द्रक्रियादयः । सम्यक् फलप्रदास्तस्माद्विशेषेण विचिन्तयेत् ॥ २० ॥ जन्म कुंडली, मुहूर्त तथा प्रश्न कुंडली में चन्द्रक्रिया आदि का फल बहुत मिलता है इसलिये इनका विशेष विचार करें ॥ २० ॥
९८ फलदीपिका पक्षोद्भवं हिमकरस्य विशेष्टामाहुः स्थानोद्भवं तु बलमप्यधिकं परेषाम् । तत्संप्रयुक्तमितरैरधिकाधिकं स्या- दन्यानि तेन सदृशानि बहूनि ते स्युः ॥ २१ ॥ चन्द्रमा के पक्षबल को विशिष्ट (विशेष महत्त्व का ) कहा है । अन्य ग्रहों के स्थान बल को विशेष महत्त्व देना चाहिये । वैसे कई प्रकार के बलों के योग से—षड् बल पिंड में ग्रहों के षड्बलों का योग—किसी का किसी से अधिक हो जाता है क्योंकि कई प्रकार के बलों में कोई किसी प्रकार के बल में अधिक होता है, कोई किसी अन्य प्रकार के बल में । बलपिंड सार्द्धानि षट्तीक्ष्णकरो बलीयान् चन्द्रस्तु षट्पञ्च वसुन्धराजः सप्तेन्दुसूनो रविवद्गुरोस्तु सार्द्धानि पञ्चाथ सितो बली स्यात्।२२॥ अब यह बात बताते हैं कि कितने 'रूप' बल प्राप्त होने पर ग्रह को बली कहना । सूर्य को यदि ६।। रूप बल प्राप्त हों तो वह बली कहलाता है । चन्द्रमा ६ रूप बल मिलने से बली और मंगल ५ रूप बल प्राप्त करने से ही बली समझा जाता है । इसी प्रकार बुध को ७ रूप, बृहस्पति को ६।। और शुक्र को ५।। रूप बल प्राप्त होने से वह बली कहलाता है ॥ २२ ॥ मन्दस्तु पञ्चैव हि षड्बलानां संयोग एवापरथान्यथा स्युः । एवं ग्रहाणां स्वबलाबलानि विचिन्त्य सम्यक्कथयेत्फलानि ॥२३॥ शनि को यदि ५ रूप बल भी प्राप्त हो तो वह बली कहलाता है । यदि किसी ग्रह का षड्बल पिंड ऊपर बतायी गई संख्या से कम हो तो वह निर्बल समझा जावेगा । इस प्रकार किस ग्रह का कितना बल है यह अच्छी तरह विचार कर फलादेश करना चाहिये ॥ २३ ॥
चौथा अध्याय : ग्रह बल ९९ ग्रहों को षड्बल पिंड में—प्रत्येक को कितने रूप प्राप्त होने से वह बली समझा जाना चाहिये यह बता चुके हैं। अब अन्य शास्त्रों के आधार पर यह बताया जाता है कि (१) स्थान, (२) दिक्, (३) चेष्टा, (४) काल और (५) और अयन--इन पांच प्रकार के बलों में प्रत्येक को कितना बल मिलने से वह बली समझा जावे। नैसर्गिक बल में कम-से-कम कितने रूप मिलने चाहिएं यह इसलिये नहीं कहा क्योंकि नैसर्गिक बल का परिमाण, प्रत्येक ग्रह का, प्रत्येक कुंडली में एक ही होता है। ग्रह स्थान दिक् चेष्टा काल अयन योग रू. ष. रू. ष. रू. ष. रू. ष. रू. ष. • रू. ष. सूर्य २-४५ ०-३५ ०-५० १-५२ ०-३० ६-३२ चन्द्र २-१३ ०-५० ०-३० १-४० ०-४० ५-५३ मंगल १-३६ ०-३० ०-४० १- ७ ०-२० ४-१३ बुध २-४५ ०-३५ ०-५० १-५२ ०-३० ६-३२ बृहस्पति २-४५ ०-३५ ०-५० १-५२ ०-३० ६-३२ शुक्र २-१३ ०-५० ०-३० १-४० ०-४० ५-५३ शनि १-३६ ०-३० ०-४० १- ७ ०-२० ४-१३ एक रूप में ६० षष्ट्यंश होते हैं। यहाँ यह शंका नहीं करनी चाहिये कि श्लोक २२ में तो यह कह दिया कि सूर्य के ६ प्रकार के बलों का योग ६।। (६ रूप ३० षष्ट्यंश) हो तो बली समझना और यहाँ केवल पांच प्रकार के बलों का योग ६ रूप ३२ षष्ट्यंश बता दिया। यह इसी प्रकार है जैसे परीक्षा में ६ पत्र हों तो टोटल में ३३ प्रतिशत में पास (सफल या उत्तीर्ण) समझा जाता है, परन्तु प्रति पत्र में ४० प्रतिशत से पास समझा जावे।
१०० फलदीपिका अब भाव बल बताते हैं :— लग्नादिकानामधिपस्य पिण्डे रूपान्विते तद्बलपिण्डमाहुः । गृहस्य यस्यां दिशादिग्बलं स्यात्तद्भाववीर्य सहितस्य दृष्ट्या ॥२४॥ लग्न आदि किसी भाव का बल निकालना हो तो—जिस भाव का बल निकालना है तो उस भावेश को जितना बल (जितने रूप) प्राप्त हों¹ उसमें भाव दिग्बल तथा भाव पर जो दृक्बल हो वह जोड़ने से भाव बल निकल आता है भाव यदि अपने स्वामी, बृहस्पति, शुक्र या बुध से युत हो या अपने स्वामी, बृहस्पति, बुध से दृष्ट हो तो वह बल भी जोड़ना चाहिये । देखिये श्लोक ६ की व्याख्या पृष्ठ ८८ ॥ २४ ॥ भाव बल निकालने का प्रयोजन यह है कि भाव बली है तो उस भाव सम्बन्धी शुभ फल होगा । भाव निर्बल है तो उस भाव सम्बन्धी शुभ फल अल्प होगा, अशुभ फल अधिक होगा । १. एक टीकाकार ने लिखा है कि भावेश बल में एक रूप और जोड़ दें ।
पाँचवाँ अध्याय कर्माजीव प्रकरण इस पाँचवें अध्याय का नाम है “कर्माजीवः” अर्थात् किस कर्म (कार्य के करने) से या किस उपाय से या स्थान से आजीविका (जीवन चलाने का साधन) धन की प्राप्ति होगी। प्रायः बहुत से मनुष्य अपनी जन्मकुण्डली दिखाते समय यह पूछते हैं कि किस साधन से विशेष धन प्राप्ति की आशा है अथवा किस रोज़गार या धन्धे से विशेष लाभ हो सकता है। उसी विषय को इस अध्याय में समझाया गया है। अर्थाप्ति कथयेद्विलग्नशशिनोः प्राबल्यतः खेचरैः कर्मस्थैः पितृमातृशात्रवसुहृद्भात्रादिभिः स्त्रीधनात् । भृत्याद्वा दिननाथलग्नशशिनां मध्ये बलीयांस्ततः कर्मेशस्थनवांशराशिपवशाद्वृत्ति जगुस्तद्विदः ॥ १ ॥ धन प्राप्ति कराने वाला कौनसा ग्रह है ? लग्न और चन्द्रमा इन दोनों में जो बलवान् हो उससे दशम में कौनसा ग्रह है ? सूर्य हो तो पिता द्वारा धनप्राप्ति, चन्द्रमा हो तो माता से, मंगल हो तो शत्रु से, बुध हो तो मित्रों से, बृहस्पति हो तो भाई आदि से, शुक्र हो तो स्त्री से, शनि हो तो नौकरों से । ऊपर रिश्तेदारों का निर्देश मात्र कर दिया गया है। जब ये ज्योतिष की पुस्तकें बनी थीं तब भारतवर्ष में आय के कार्य और साधन बहुत सीमित थे। किन्तु आजकल कारखाने, मशीनरी, इम्पोर्ट, एक्सपोर्ट आदि अनेक साधन नये हो गये हैं। इस कारण सूर्य से केवल
१०२ फलदीपिका पिता ही नहीं कहना किन्तु सूर्य से जिन-जिन बातों का विचार किया जाता है उन सब साधनों में से एक या अधिक से द्रव्य प्राप्ति हो सकती है। इसी प्रकार चन्द्रमा आदि से समझना चाहिये। यदि लग्न से दशम में बलवान् चन्द्रमा हो तो सफ़ेद वस्तुओं से, जल से उत्पन्न पदार्थों से, चांदी से, मोती से, जल (समुद्र) से पार देशों से, व्यापार से, जनता के उपयोग में आनेवाले पदार्थों से धन प्राप्ति हो सकती है। इसी प्रकार अन्य ग्रहों से विविध साधनों द्वारा धन प्राप्ति कहनी चाहिये। लग्न या चन्द्रमा से दशम में कौन सा ग्रह है। वह ग्रह अपने मार्ग से धन प्राप्ति करावेगा यह एक बात बतायी। अब दूसरी बात बताते हैं। यह देखिये कि लग्न, सूर्य और दशम इन तीनों में बलवान् कौन है। जो इन तीनों में अधिक बलवान् हो उससे दशम राशि कौनसी पड़ती है ? उस दशम राशि का स्वामी किस नवांश में है ? उस नवांश का स्वामी कौनसा ग्रह है ? जो ग्रह आवे उस ग्रह के गुण, स्वभाव, साधन से जातक को धन प्राप्ति होगी। उदाहरण के लिये एक कुण्डली दी जाती है। इसमें सिंह लग्न है, सूर्य वृश्चिक में है, और चन्द्रमा मीन में है। मान लीजिये लग्न सबसे बलवान् है तो लग्न से दशम वृष राशि हुई। इसका स्वामी शुक्र मान लीजिये तुला राशि में ५ अंश का है तो शुक्र वृश्चिक नवांश में हुआ क्योंकि तुला राशि के ३°-२०' से ६°-४०' तक वृश्चिक नवांश रहता है। वृश्चिक नवांश का स्वामी मंगल है। इस कारण मंगल के स्वभाव, गुण, साधन और वृत्ति द्वारा धन लाभ कहेंगे। यदि सूर्य बलवान् हो तो सूर्य वृश्चिक में है इससे दशम सिंह राशि
पाँचवाँ अध्याय : कर्माजीव प्रकरण १०३ हुई, इसका स्वामी सूर्य हुआ । यह मान लीजिये २६° का वृश्चिक में है। इस कारण कुम्भ नवांश में होने से (क्योंकि वृश्चिक राशि में २३°-२०' से २६°-४०' तक कुम्भ नवांश होता है) सूर्य का नवांशेश शनि हुआ (क्योंकि कुम्भ का स्वामी शनि होता है) । इस कारण शनि स्वभाव, शनि प्रकृति, शनि स्वरूप, शनि सम्बन्धित व्यापार, कार्य, पदार्थों से जातक को लाभ होगा। अब तीसरा उदाहरण लीजिये। मान लीजिये चन्द्रमा सबसे बलवान् है । तो चन्द्रमा से दशम धनु राशि हुई। धनु का स्वामी बृहस्पति हुआ। अब यदि बृहस्पति कन्या में १५° का है तो पञ्चम नवांश में होने के कारण वृष नवांश में हुआ (क्योंकि कन्या राशि में १३°-२०' से १६°-४०' तक वृष का नवांश रहता है) जिसका स्वामी शुक्र है। इस कारण शुक्र की आकृति, प्रकृति, स्वरूप, स्वभाव, गुण, धर्म वाले व्यक्तियों से तथा शुक्र से सम्बन्धित व्यापारों से लाभ होगा। ऊपर यह बताया गया है कि लग्न सूर्य और चन्द्रमा उनसे दशम राशि के स्वामी के नवांश के स्वामी के अनुसार धन लाभ होता है । क्या इनमें (लग्न, सूर्य, चन्द्र में) जो सबसे बली हों केवल उससे विचार किया जाय ? बहुत से ज्योतिषियों का मत है कि तीनों से विचार करना चाहिये क्योंकि किसी-किसी को तो एक ही प्रकार से धन लाभ होता है और किसी-किसी को अनेक उपायों और मार्गों द्वारा धन प्राप्ति होती रहती है । फलद्रुमैर्मन्त्रजपैश्च शाठ्याद्द्यूतानृतैः कंबलभेषजाद्यैः । धातुक्रियाद्वा क्षितिपालपूज्याज्जीवत्यसौ पङ्कजवल्लभांशे ॥२॥ जलोद्भवानां क्रयविक्रयेण कृषिक्रियागोमहिषीसमुत्थैः । तीर्थाटनाद्वा वनिताश्रयाद्वा निशाकरांशे वसनक्रयाद्वा ॥ ३ ॥
१०४ फलदीपिका भौमांशके धातुरणप्रहारैर्महानसाद्भूमिवशात्सुवर्णात् । परोपतापाद्युधसाहसैर्वा म्लेच्छाश्रयात्सूचकचोरवृत्त्या ॥४॥ काव्यागमैर्लेखकलिप्युपायैर्ज्योतिर्गणज्ञानवशाद्बुधांशे । परार्थवेदाध्ययनाज्जपाच्च पुरोहितव्याजवशात्प्रवृत्तिः ॥ ५ ॥ जीवांशके भूसुरदेवतानां समाश्रयाद्भूमिपतिप्रसादात् । पुराणशास्त्रागमनीतिमार्गाद्धर्मोपदेशेन कुसीदवृत्त्या ॥ ६ ॥ स्त्रीसंश्रयाद्गोमहिषीगजार्थैस्तौर्यत्रिकैर्वा रजतैश्च गन्धैः । क्षीराद्यलङ्कारपटोपटाद्यैः शुक्रांशकेऽमात्यगुणैः कवित्वात् ॥७॥ शन्यंशके मूलफलैः श्रमेण प्रेष्यैः खलैर्नीचधनैः कुधान्यैः । भारोद्वहात्कुत्सितमार्गवृत्त्या शिल्पादिभिर्दारुमयैर्वधाद्यैः ॥ ८ ॥ ऊपर यह बताया गया है कि सूर्य, चन्द्र, लग्न से दशमेश के नवांश राशि स्वामी के पदार्थ और कार्यों से लाभ होता है। किस ग्रह के क्या-क्या पदार्थ और कार्य समझें यह नीचे बताया जाता है। सूर्य :—फल, फल वृक्ष, मन्त्र, जप, शठता (चालाकी, धोखा, शैतानी), जुआ, झूठ बोलना, कम्बल, ऊन, ऊनी वस्त्र, दवा, दवा के पदार्थ, धातु क्रिया, (विविध धातुओं का कार्य) किसी सम्मानित व्यक्ति की या राजा की (या सरकार की) नौकरी द्वारा । चन्द्रमाः—जल से उत्पन्न पदार्थ, (मोती, मूंगा, सिंघाड़ा) अथवा जल-पार देशों से आने-जाने वाले माल से) खेती से, गाय, भैंस, दूध, दही, घी आदि से, तीर्थाटन से, किसी स्त्री के आश्रय से, या कपड़े की खरीद-फरोख्त से ।
पाँचवां अध्याय : कर्माजीव प्रकरण १०५ मंगलः—यदि नवांश का स्वामी मंगल हो तो आय के निम्नलिखित साधन हैं :—धातु (लोहा, तांबा, आदि विविध धातुओं का कार्य, बिजली, रेडियो आदि) लड़ाई-झगड़ा, युद्ध, डाकाजनी, फौज की नौकरी, सोना (सोने की खरीद-फरोख़्त या सुनार या सर्राफ का काम), भोजन बनाने का (क्योंकि यह अग्नि से सम्बन्धित कार्य है) रेस्टोरेन्ट, होटल, आदि का कार्य, दूसरे को कष्ट या पीड़ा पहुंचा कर शस्त्र या हथियार द्वारा, साहस के कार्यों से, म्लेच्छों के आश्रय से, खुफिया विभाग में काम करने से, पुलिस का कार्य या मुखबिर की हैसियत से, या चोरी से धन की प्राप्ति होती है। बुधः—यदि नवांशेश बुध हो तो काव्य से, धार्मिक ग्रन्थों द्वारा, लेखक वृत्ति से (जिसमें लिखने-पढ़ने का काम अधिक पड़ता हो) किसी उपाय से (चतुरता, दलाली, कमीशन आदि) ज्योतिष से, पांडित्य से, दूसरे के लिये वेद आदि के अध्ययन से, पुरोहिती के कार्य से या बहानेबाजी से द्रव्य उपार्जन होता है। हमारे विचार से आजकल की परिस्थिति को देखते हुए समाचार पत्रों में कार्य करने से, संवाददाता होने से, रेल, डाक, तार आदि विभागों में कार्य करने से या विदेशी दूतावासों में नौकरी करने से भी “बुध” द्रव्योपार्जन करवा सकता है। पुस्तक लेखन, आढ़त का कार्य यह सभी बुध के अन्तर्गत आ जाते हैं। बृहस्पति :—यदि नवांशेश बृहस्पति हो तो ब्राह्मणों का आश्रय लेने से, देवालयों में रहने से, या मन्दिरों या मठों के आश्रय में रहने से, या राजा की कृपा द्वारा, पुराण, शास्त्र, वेदादि, के पठन- पाठन से, नीति के मार्ग में रहने से (अर्थात् सद्वृत्ति से, सुनीति से, अनीति और अन्याय द्वारा नहीं) धर्म के उपदेश द्वारा धन का लाभ होता है। बृहस्पति एक और प्रकार से भी धन लाभ कराता है वह है ब्याज (सूद) द्वारा। जिन व्यक्तियों को सूद की काफी आमदनी होती
१०६ फलदीपिका है उनकी जन्मकुण्डली में अवश्य बृहस्पति बलवान् होता है ऐसा हमारा मत है। बैंक भी बृहस्पति के अन्तर्गत आते हैं। शुक्र :—यदि नवांशेश शुक्र हो तो किसी स्त्री के आश्रय द्वारा (चाहे वह अपनी पत्नी हो या अन्य स्त्री या वेश्या या महारानी या फिल्म एक्ट्रैस या अन्य कोई महिला), गाय, भैंस, हाथी, घोड़े, आदि द्वारा, गाने-बजाने के उपायों द्वारा, या वाद्य यन्त्रों से, नाच-गान से चाँदी से, सुगन्धित वस्तुओं से, दूध, दही, घी आदि से अलंकारों से, रेशमी और बढ़िया वस्त्रों से, काव्य द्वारा या किसी राजा के या किसी उच्चाधिकारिणी महिला के मन्त्री के सहायक होने से, धन प्राप्ति होती है। हमारे विचार से सिनेमा, चलचित्र या अन्य जितने भी सौन्दर्य विलास और भोग के साधन हैं वह सब शुक्र के वर्ग में हैं। इस कारण इन उपायों द्वारा भी शुक्र धन दिलाता है। शनि :—यदि नवांशेश शनि हो तो मूल (जो वनस्पति पृथ्वी के अन्दर रहती है) फल, शारीरिक परिश्रम द्वारा, नौकरी द्वारा (स्वयं दूसरे की नौकरी करे या स्वयं अन्य व्यक्तियों को नौकर रखे), दुष्टों द्वारा या नीच जनों के धन से धनी हो। जिस व्यक्ति को नीच आद- मियों से थोड़ा-थोड़ा धन प्राप्त होता हो और इस थोड़े-थोड़े द्रव्य के सग्रह द्वारा वह धनी हो जाये तो उसे नीच जनों से धनी होना कहेंगे। उदाहरण के लिये यदि कोई मजिस्ट्रेट मुलज़िमों से रिश्वत लेकर धनी हुआ हो या कोई सुपरिटेण्डेण्ट जेल कैदियों से रिश्वत लेकर धनी हुआ हो तो इन दोनों को ही नीच जनों के धन से धनी कहेंगे। शनि जब नवांशेश होता है तो कुधान्यों से (गेहूं, चावल आदि उत्तम धान्य समझे जाते हैं और मोटे धान्यों को कुधान्य कहते हैं). कुत्सित (अन्याय, अधर्म, अनीति) अर्थात् निन्दित मार्गों से धन दिलाता है। क़त्ल करने से जो धन प्राप्त हो या रिश्वत से या वेश्या के यहां दलाली करने से यह सब निन्दित मार्ग समझे जाते हैं। शनि परिश्रम द्वारा धन दिलाता है, अनपढ़ आदमी हो तो ज़मीन खोदेगा, बोझा
पाँचवां अध्याय : कर्माजीव प्रकरण १०७ ढोयेगा, शिक्षित हो तो दिन भर कुर्सी पर परिश्रम करावेगा। शनि लकड़ी का काम (लकड़ी की खरीद-फ़रोख्त, फर्नीचर आदि) द्वारा भी धन दिलाता है। अंशेशे बलवत्ययत्नधनसंप्राप्तिं बलोनेऽशपे स्वल्पं प्रोक्तफलं भवेदुदयतः कर्मांशदेशे फलम् । अंशस्योक्तदिशं वदेत्पतियुते दृष्टे स्वदेशे फलं सत्यन्यैः परदेशजं तदधिपस्यांशे स्वदेशे स्थिरे ॥९॥ यह नवांश का स्वामी जो कि पहले श्लोक की व्याख्या में बताया गया है यदि बलवान् हो तो आसानी से धन प्राप्ति हो जाती है किन्तु यदि यह नवांशेश स्वयं दुर्बल हो तो बहुत थोड़े धन की प्राप्ति होती है। अब यहां यह विचार करते हैं कि किस देश में या किस दिशा में धन प्राप्ति होगी। (i) दशम स्थान में जो राशि है उसको व्यक्त करने वाले देश और उस राशि की दिशा में धन प्राप्ति होगी या (ii) दशम का स्वामी जिस नवांश में होगा उस नवांश राशि से सम्बन्धित देश और उस नवांश राशि की दिशा में धन प्राप्ति होगी। मान लीजिये प्रथम श्लोक की व्याख्या में जो उदाहरण कुण्डली दी गई है उसका विचार करना है और लग्न बलवान् है तो वृष राशि सम्बन्धित देश और दिशा में तथा वृष का स्वामी शुक्र वृश्चिक नवांश में है इस कारण वृश्चिक राशि से सम्बन्धित देश और दिशा में धन प्राप्ति होगी। किन्तु एक बात ध्यान में रखनी चाहिये। यदि यह राशि या नवांश राशि अपने स्वामी से युत या वीक्षित हो तो मनुष्य स्वयं अपने देश में रहकर धनोपार्जन करेगा। यदि दशमेश स्थिर नवांश में हो तो भी जातक अपने ही देश में धनोपार्जन करेगा। किन्तु यदि— ऊपर जो दशम राशि या दशमराशीश स्थित नवांश राशि यह जो दो राशियां बताई गई हैं इनमें उनके स्वामी के अतिरिक्त अन्य ग्रह बैठे
१०८ फलदीपिका हों या स्वामी के अतिरिक्त अन्य ग्रह देखते हों तो अन्य देश में भाग्योदय होता है अर्थात् अपनी जन्म भूमि में भाग्योदय नहीं होता। विदेश में जीविका उपार्जन करता है। कुछ अन्य ज्योतिष ग्रन्थों में यह भी लिखा है कि भाग्येश चर राशि में हो तो विदेश में भाग्योदय यदि स्थिर राशि में हो तो स्वदेश में भाग्योदय और यदि द्विस्वभाव राशि में हो तो कभी स्वदेश में कभी परदेश में कार्य करने से धन प्राप्ति या भाग्योदय हो।
छठा अध्याय योगाध्याय रुचकभद्रकहंसकमालवाः सशशका इति पञ्च च कीर्तिताः । स्वभवनोच्चगतेषु चतुष्टये क्षितिसुतादिषु तान् क्रमशः वदेत् ॥ १ ॥ इस अध्याय में अनेक योग बताये गये हैं। सर्वप्रथम पञ्च महापुरुष योग दिये हैं। यदि मंगल मेष, वृश्चिक या मकर राशि का होकर जन्म- कुण्डली में केन्द्र में बैठे तो 'रुचक' योग होता है। यदि मिथुन या कन्या राशि में स्थित बुध केन्द्र में हो तो 'भद्र' योग होता है। यदि कर्क, धनु या मीन राशि में स्थित होकर बृहस्पति केन्द्र में हो तो 'हंस' योग होता है। यदि वृष, तुला या मीन राशि में स्थित शुक्र हो और केन्द्र में हो तो मालव्य योग होता है। यदि तुला, मकर या कुम्भ राशि में शनि बैठा हो और जन्म लग्न चतुर्थ, सप्तम, या दशम इन चारों स्थानों में से किसी एक में हो, तो 'शश' योग होता है। अब ऊपर पांचों में से किसी एक में उत्पन्न व्यक्ति का स्वरूप या भाग्योदय कैसा होगा यह बताते हैं । ॥ १ ॥ दीर्घास्यो बहुसाहसाप्तविभवः शूरोऽरिहन्ता बली गर्विष्ठो रुचके प्रतीतगुणवान् सेनापतिर्जित्त्वरः । आयुष्मान् सकुशाग्रबुद्धिरमलो विद्वज्जनश्लाघितो भूपो भद्रकयोगजोऽतिविभवश्चास्थानकोलाहलः ॥ २ ॥
२१० फलदीपिका हंसे सद्गूरभिष्टुतः क्षितिपतिः शङ्खाब्जमत्स्याङ्कुशै- श्चिह्नैः पादकराङ्कितः शुभवपुर्मृष्टान्नभुग्धार्मिकः । पुष्टाङ्गो धृतिमान्धनी सुतवधूभाग्यान्वितो वर्धनो मालव्ये सुखभुक्सुवाहनयशा विद्वान्प्रसन्नेन्द्रियः ॥ ३ ॥ शस्तः सर्वजनैः सुभृत्यबलवान् ग्रामाधिपो वा नृपो दुर्वृत्तः शशयोगजोऽन्यवनितावित्तान्वितः सौख्यवान् । लग्नेन्द्वोरपि योगपञ्चकमिदं साम्राज्यसिद्धिप्रदं तेष्वेकादिषु भाग्यवान् नृपसमो राजा नृपेन्द्रोऽधिकः ॥४॥ जो व्यक्ति रुचक योग में पैदा होता है उसका दीर्घ चेहरा हो, बहुत साहस से धन प्राप्त करे । शूर और बली हो, शत्रुओं को मारने* वाला और अभिमानी हो । ऐसा व्यक्ति अभिमानी प्रकृति का होता है और सेनापति हो (सेनापति से तात्पर्य समझना चाहिये उच्च पदाधिकारी) अपने गुणों
छठा अध्याय : योग १११ (सुन्दर, सौम्य) हो। ऐसा व्यक्ति उत्तम भोजन करने वाला हो और सज्जन लोग उसकी प्रशंसा करें। जो व्यक्ति मालव्य योग में पैदा होता है वह धैर्यवान् और पुष्ट अंग वाला होता है। उत्तम भोजन करने वाला, विद्वान्, प्रसन्नमुख, शान्तचित्त, पुत्र और स्त्रियों के सुख से युक्त, सदैव वृद्धि को प्राप्त, यशस्वी और अच्छी सवारियों का (मोटर आदि) का भोक्ता हो। जो व्यक्ति शश योग में उत्पन्न होते हैं वे अत्यन्त प्रभावशाली होते हैं। किसी ग्राम के मालिक हों या नृप (बहुत से मनुष्यों का स्वामी) अर्थात् उच्च पदाधिकारी हो। ऐसा व्यक्ति स्वयं बलवान् होता है और उसकी मातहती में अच्छे-अच्छे लोग काम करते हैं। ऐसे लोगों की अन्य लोग तारीफ़ जरूर करेंगे। किन्तु वास्तव में शश योग में उत्पन्न लोगों का आचरण उत्तम नहीं होता। ऐसे-व्यक्ति अन्य पुरुषों की स्त्रियों में आसक्त रहते हैं। ऐसे लोग धनी और सुखी होते हैं। ऊपर पांच योग बताये गये हैं। मंगल, बुध, बृहस्पति, शुक्र, शनि- इनमें से कोई ग्रह स्वराशि या उच्च राशि का होकर केन्द्र में हो तो क्रमशः यह पांचों योग बनते हैं। यहां यह बात ध्यान में रखनी चाहिये कि मन्त्रेश्वर महाराज का कथन है कि यदि चन्द्र लग्न से केन्द्र में भी उपर्युक्त पांचों ग्रहों में कोई स्वराशि या उच्च राशि का होकर चन्द्र केन्द्र में हो तो साम्राज्य और सिद्धि प्रदान करने वाला होता है। कहने का तात्पर्य है कि जैसे जन्म लग्न से केन्द्र का विचार करना वैसे ही चन्द्र लग्न से भी विचार करना चाहिये। यदि कोई एक ग्रह उपर्युक्त प्रकार से योग कारक हो तो मनुष्य भाग्यवान् होता है। यदि दो ग्रह योग बनावें तो राजा के समान हो। तीन ग्रह योग बनावें तो राजा हो; चार ग्रह योग बनावें तो महाराजा हो और जिसकी कुण्डली में रुचक, भद्र, हंस, मालव्य और शश ये पाँचों योग हों वह इससे भी उच्च पदवी प्राप्त करता है।
११२ फलदीपिका इस कुण्डली में रुचक, मालव तथा शश योग हैं। जन्मलग्न से केन्द्र में स्वराशि का मंगल है इसलिये रुचक योग हुआ। जन्मलग्न से चतुर्थ (केन्द्र में) स्वराशि का शुक्र हुआ अतः मालव योग हुआ। और जन्म लग्न से सप्तम (केन्द्र) में स्वराशि का शनि होने से शश योग हुआ। यदि कन्या में बुध हो तो मिथुन में चन्द्रमा है, उससे केन्द्र में उच्च बुध होने के कारण भद्र योग हो जावेगा। यदि मीन में बृहस्पति हो तो चन्द्रमा से दशम में स्वराशि का बृहस्पति हो जाने से चन्द्र लग्न से हंस योग भी बन जावेगा। प्रायः ज्योतिष के प्रसिद्ध ग्रंथों में यह पंच महापुरुष योग बताये गये हैं। परन्तु मानसागरी नामक पुस्तक में इस महापुरुष योग का भंग कैसे हो जाता है यह भी लिखा है। मानसागरी कर्त्ता लिखते हैं कि यद्यपि मंगल, बुध, वृहस्पति, शुक्र या शनि के केन्द्र में, अपनी उच्च या राशि में स्थित होने से महापुरुष योग बताया गया है किन्तु यदि जो ग्रह महापुरुष योग बना रहा है वह सूर्य या चन्द्रमा के साथ हो तो-ऐसे महापुरुष योग के प्रभाव से जातक 'राजा' (या राजतुल्य) नहीं होता है परन्तु उसकी दशा में (या अन्तर्दशा में) केवल सत्फल (शुभ फल) होता है। विधोस्तु सुनफानफाधुरुधुराः स्वरैः फोभय- स्थितैर्विरविभिर्ग्रहैरितरथा तु केमद्रुमः। हिमत्विषि चतुष्टये ग्रहयुतेऽथ केमद्रुमो न हीति कथितोऽथवा हिमकराद्ग्रहैः केन्द्रगैः ॥५॥ स्वयमधिगतवित्तः पार्थिवस्तत्समो वा भवति हि सुनफायां धीधनख्यातिमांश्च।
छठा अध्याय : योग ११३ प्रभुरगदशरीरः शीलवान् ख्यातकीर्ति- र्विषयसुखसुवेशो निर्वृतश्चानफायाम् ॥ ६ ॥ उत्पन्नभोगसुखभाग्धनवाहनाढ्य- स्त्यागान्वितो धुरुधुराप्रभवः सभृत्यः । केमद्रुमे मलिनदुःखितनोचनिःस्वाः प्रेष्याः खलाश्च नृपतेरपि वंशजाताः ॥ ७ ॥ अब चार योग बताते हैं । इन चारों योगों का विचार चन्द्र राशि से किया जाता है । इन चारों योगों में जहां ग्रह का उल्लेख किया जावे वहां मंगल, बुध, बृहस्पति, शुक्र और शनि केवल इन पांच ग्रहों को समझना चाहिये । सूर्य की गणना इनमें नहीं करनी चाहिये :—यदि चन्द्रमा से द्वादश में कोई ग्रह हो और द्वितीय में कोई ग्रह नहीं हो तो अनफा योग होता है । यदि चन्द्रमा से द्वादश में कोई ग्रह न हो और केवल द्वितीय में हो तो सुनफा योग होता है । यदि चन्द्रमा से द्वितीय और द्वादश दोनों स्थानों में ग्रह हों तो दुरुधरा योग होता है। यदि चन्द्रमा से द्वितीय और द्वादश में—दोनों स्थानों से किसी में भी कोई ग्रह न हो तो केमद्रुम योग होता है । कुछ लोगों का मत है कि निम्नलिखित योगों में से कोई हो तो केमद्रुम योग नहीं होता । (१) यदि चन्द्रमा के साथ कोई ग्रह हो । (२) यदि लग्न से केन्द्र में कोई ग्रह हो । (३) यदि चन्द्रमा से केन्द्र में कोई ग्रह हो । मन्त्रेश्वर महाराज ने यह लिखकर कि कुछ अन्य लोगों का मत
- जन्म कुंडली में जिस राशि में चन्द्रमा हो उसे चन्द्र राशि या चन्द्र लग्न कहते हैं ।
११४ फलदीपिका ऐसा है, यही पुष्ट किया कि उनके विचार से तो चन्द्रमा से द्वितीय और द्वादश में कोई ग्रह न हो तो केमद्रुम* योग होता है। केमद्रुम योग का फल अच्छा नहीं। केमद्रुम योग होने से मनुष्य मलिन, दुःखित, निर्धन, दूसरे की मातहती में काम करने वाला, नगण्य होता है। केमद्रुम योग की इतनी निन्दा की गई है कि यदि राजवंश में पैदा हो तो भी उपर्युक्त बातें उसमें लागू हों। किन्तु पाठकों का विशेष ध्यान इस ओर दिलाया जाता है कि केवल किसी एक योग से नतीजे पर नहीं पहुंचना चाहिये। अब ऊपर जो अनफा, सुनफा और दुरुधरा यह जो तीन योग पृथक्-पृथक् बताये गये हैं, उनका फल बताते हैं। जो सुनफा योग में पैदा होता है वह पार्थिव (राजा) हो या उसके समान हो। सुनफा योग वाला बुद्धिमान्, धनवान् होता है और उसको ख्याति प्राप्त होती है। जो अनफा योग में पैदा होता है वह देखने में उत्तम होगा, शीलवान् हो, उसको सांसारिक भोग के साधन उपलब्ध हों, सन्तोषी और प्रसन्न हो, उत्तम वस्त्र धारण करें और उसका शरीर स्वस्थ रहे। अनफा योग वाला शीलवान् होता है और समाज में प्रतिष्ठित होता है। जो व्यक्ति दुरुधरा योग में उत्पन्न हो वह त्यागशील हो, सुखी हो; धनी हो, उसको सवारियों की कमी न रहे और सांसारिक सुखों के अनेक साधन जैसे-जैसे उसे उपलब्ध हों वैसे वैसे उनका भोग करता रहे। हित्वेन्दुं शुभसिवैवास्युभयचर्याख्याः स्वरिःफोभय- स्थानस्थैः सवितुः शुभैः स्युरशुभैस्ते पापसंज्ञाः स्मृताः । सत्पार्श्वे शुभकर्तरीत्युदयभे पापैस्तु पापाह्वयो लग्नाद्वित्तगतैः शुभैस्तु सुशुभो योगो न पापेक्षितैः ॥ ८ ॥
- इस सम्बन्ध में देखिये बृहज्जातक के अध्याय तेरह श्लोक २ की टीका।
छठा अध्याय : योग ११५ ऊपर के श्लोकों में सूर्य के अतिरिक्त कोई ग्रह चन्द्रमा से द्वितीय, द्वादश या दोनों घरों में हो या न हो ऐसे योग बताये हैं। अब सूर्य से द्वितीय, द्वादश या इन दोनों घरों में कोई ग्रह (चन्द्रमा के अतिरिक्त) हो तो क्या योग होते हैं यह बताते हैं। (१) सूर्य से द्वितीय, मंगल, बुध, बृहस्पति, शुक्र, शनि, इनमें से एक या अधिक ग्रह हों तो शुभवेसि योग होता हैं। (२) यदि सूर्य से द्वादश मंगल, बुध, बृहस्पति शुक्र, शनि कोई ग्रह हो तो शुभवासि योग होता है। (३) यदि इन पांचों ग्रहों में से एक या अधिक सूर्य से द्वादश में हो और एक या अधिक सूर्य से द्वितीय में हो तो उभयचरी योग होता है। उभयचरी का अर्थ है दोनों ओर। किसके ? सूर्य जिस राशि में में है उस राशि के दोनों ओर चन्द्रमा के अतिरिक्त अन्य ग्रह होने से यह शुभ योग बनता है। ऊपर जो तीन योग दिये गये हैं वे प्रायः सब ज्योतिष की पुस्तकों में उपलब्ध होते हैं परन्तु इस सम्बन्ध में मन्त्रेश्वर महाराज कुछ विशेष निर्देश करते हैं। यदि शुभ ग्रह सूर्य के एक या दोनों ओर योग बनावें तो उनके मत से शुभवेसि, शुभवासि तथा शुभ उभयचरी योग हुआ। किन्तु यदि शुभ ग्रह के बजाय पाप ग्रह योग बनावें तो क्रमशः पापवेसि पापवासि तथा पाप उभयचरी योग हुए। जैसे सूर्य के एक ओर या दोनों ओर ग्रह होने से योग बताये हैं वैसे ही लग्न से भी विचार करना चाहिये। यदि लग्न के दोनों ओर (द्वितीय और द्वादश में) पाप ग्रह हों तो पाप कर्त्री योग हुआ। किन्तु यदि लग्न के दोनों ओर अर्थात् द्वितीय स्थान तथा द्वादश स्थान में शुभ ग्रह बैठे हों तो शुभ कर्त्री हुआ। यदि द्वितीय में (लग्न से दूसरे) शुभ ग्रह बैठा हो और इस शुभ ग्रह को कोई पाप ग्रह नहीं देखता हो तो सुशुभ नामक योग होता है। स्मरण रहे कि लग्न से द्वितीय में अच्छा योग बताया गया है। लग्न