फलदीपिका (मन्त्रेश्वर दैवज्ञ - सम्पूर्ण २८ अध्याय, भाव-विचार, दशा-फल एवं गोचर सटीक)
Phaladeepika of Mantreshwara Daivajna with Commentary
मन्त्रेश्वर दैवज्ञ (टीकाकार: पं. सूर्यनारायण व्यास) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंपाँचवां अध्याय : कर्माजीव प्रकरण १०७ ढोयेगा, शिक्षित हो तो दिन भर कुर्सी पर परिश्रम करावेगा। शनि लकड़ी का काम (लकड़ी की खरीद-फ़रोख्त, फर्नीचर आदि) द्वारा भी धन दिलाता है। अंशेशे बलवत्ययत्नधनसंप्राप्तिं बलोनेऽशपे स्वल्पं प्रोक्तफलं भवेदुदयतः कर्मांशदेशे फलम् । अंशस्योक्तदिशं वदेत्पतियुते दृष्टे स्वदेशे फलं सत्यन्यैः परदेशजं तदधिपस्यांशे स्वदेशे स्थिरे ॥९॥ यह नवांश का स्वामी जो कि पहले श्लोक की व्याख्या में बताया गया है यदि बलवान् हो तो आसानी से धन प्राप्ति हो जाती है किन्तु यदि यह नवांशेश स्वयं दुर्बल हो तो बहुत थोड़े धन की प्राप्ति होती है। अब यहां यह विचार करते हैं कि किस देश में या किस दिशा में धन प्राप्ति होगी। (i) दशम स्थान में जो राशि है उसको व्यक्त करने वाले देश और उस राशि की दिशा में धन प्राप्ति होगी या (ii) दशम का स्वामी जिस नवांश में होगा उस नवांश राशि से सम्बन्धित देश और उस नवांश राशि की दिशा में धन प्राप्ति होगी। मान लीजिये प्रथम श्लोक की व्याख्या में जो उदाहरण कुण्डली दी गई है उसका विचार करना है और लग्न बलवान् है तो वृष राशि सम्बन्धित देश और दिशा में तथा वृष का स्वामी शुक्र वृश्चिक नवांश में है इस कारण वृश्चिक राशि से सम्बन्धित देश और दिशा में धन प्राप्ति होगी। किन्तु एक बात ध्यान में रखनी चाहिये। यदि यह राशि या नवांश राशि अपने स्वामी से युत या वीक्षित हो तो मनुष्य स्वयं अपने देश में रहकर धनोपार्जन करेगा। यदि दशमेश स्थिर नवांश में हो तो भी जातक अपने ही देश में धनोपार्जन करेगा। किन्तु यदि— ऊपर जो दशम राशि या दशमराशीश स्थित नवांश राशि यह जो दो राशियां बताई गई हैं इनमें उनके स्वामी के अतिरिक्त अन्य ग्रह बैठे