भारतकोश
फलदीपिका (मन्त्रेश्वर दैवज्ञ - सम्पूर्ण २८ अध्याय, भाव-विचार, दशा-फल एवं गोचर सटीक)

फलदीपिका (मन्त्रेश्वर दैवज्ञ - सम्पूर्ण २८ अध्याय, भाव-विचार, दशा-फल एवं गोचर सटीक)

Phaladeepika of Mantreshwara Daivajna with Commentary

मन्त्रेश्वर दैवज्ञ (टीकाकार: पं. सूर्यनारायण व्यास) द्वारा

DevanagariHindipublished684 पृष्ठ

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पृष्ठ 106

पाँचवां अध्याय : कर्माजीव प्रकरण १०५ मंगलः—यदि नवांश का स्वामी मंगल हो तो आय के निम्नलिखित साधन हैं :—धातु (लोहा, तांबा, आदि विविध धातुओं का कार्य, बिजली, रेडियो आदि) लड़ाई-झगड़ा, युद्ध, डाकाजनी, फौज की नौकरी, सोना (सोने की खरीद-फरोख़्त या सुनार या सर्राफ का काम), भोजन बनाने का (क्योंकि यह अग्नि से सम्बन्धित कार्य है) रेस्टोरेन्ट, होटल, आदि का कार्य, दूसरे को कष्ट या पीड़ा पहुंचा कर शस्त्र या हथियार द्वारा, साहस के कार्यों से, म्लेच्छों के आश्रय से, खुफिया विभाग में काम करने से, पुलिस का कार्य या मुखबिर की हैसियत से, या चोरी से धन की प्राप्ति होती है। बुधः—यदि नवांशेश बुध हो तो काव्य से, धार्मिक ग्रन्थों द्वारा, लेखक वृत्ति से (जिसमें लिखने-पढ़ने का काम अधिक पड़ता हो) किसी उपाय से (चतुरता, दलाली, कमीशन आदि) ज्योतिष से, पांडित्य से, दूसरे के लिये वेद आदि के अध्ययन से, पुरोहिती के कार्य से या बहानेबाजी से द्रव्य उपार्जन होता है। हमारे विचार से आजकल की परिस्थिति को देखते हुए समाचार पत्रों में कार्य करने से, संवाददाता होने से, रेल, डाक, तार आदि विभागों में कार्य करने से या विदेशी दूतावासों में नौकरी करने से भी “बुध” द्रव्योपार्जन करवा सकता है। पुस्तक लेखन, आढ़त का कार्य यह सभी बुध के अन्तर्गत आ जाते हैं। बृहस्पति :—यदि नवांशेश बृहस्पति हो तो ब्राह्मणों का आश्रय लेने से, देवालयों में रहने से, या मन्दिरों या मठों के आश्रय में रहने से, या राजा की कृपा द्वारा, पुराण, शास्त्र, वेदादि, के पठन- पाठन से, नीति के मार्ग में रहने से (अर्थात् सद्वृत्ति से, सुनीति से, अनीति और अन्याय द्वारा नहीं) धर्म के उपदेश द्वारा धन का लाभ होता है। बृहस्पति एक और प्रकार से भी धन लाभ कराता है वह है ब्याज (सूद) द्वारा। जिन व्यक्तियों को सूद की काफी आमदनी होती