प्रबन्धचिन्तामणि (गुजरात, मालवा व चालुक्य ऐतिहासिक प्रबन्ध)
Prabandha Chintamani with Hindi Translation
मेरुतुङ्गाचार्य (१३०४ ई.) / पं. हजारीप्रसाद द्विवेदी द्वारा
पृष्ठ 115, कुल 181 में से
संदर्भ में पढ़ें९० ] प्रबन्धचिन्तामणि [ तृतीय प्रकाश महान् राज्यका कारण भी प्राक्तन कर्म को बता कर [कर्म ही की] प्रशंसा की। राजाने इस वृत्तान्तको सुन कर कर्मकी प्रशंसाको विफल करनेके विचारसे, प्रशंसा करनेवाले चाकरको एक दिन, उसे कुछ भी रहस्य न जता कर, यह प्रसाद-लेख दे कर महामन्त्री सान्तूके पास भेजा कि-'इस चाकरको एक सौ घोड़ेका सामन्त बना दिया जाय'। वह चाकर इस लेखको ले कर जब चंद्रशालाकी सीढ़ियोंसे नीचे उतर रहा था, तब पैर फिसल जानेसे गिर गया और उसका अंग भंग हो गया । उसीके पीछे चले आने वाले दूसरे चाकरने पूछा कि-'यह क्या बात है?' तो उसने अपनी बात बताई । वह तो फिर खाटमें बैठ कर अपने घर गया और उस दूसरे [अपने साथी] को वह राजाका लेख दे कर मंत्रीके पास जानेको कहा। मंत्रीने उस लेखमें की गई आज्ञानुसार उस चाकरको सौ घुड़सवारों वाला सामंतपद प्रदान किया । यह सब बात सुन कर राजाने भी कर्मको ही बलवान माना । १७०. न तो आकृति, न कुल, न शील, न विद्या और न मनुष्योंकी की हुई सेवा कुछ फल देती है। पूर्व जन्ममें तपस्यासे संचित किये हुए पुण्य कर्म ही मनुष्यको समय पा कर वृक्षोंकी तरह फल देते हैं। इस तरह यह षष्ठकर्म प्राधान्य-प्रबंध समाप्त हुआ। * सिद्धराजकी स्तुतिके कुछ फुटकर पद्य । १७१. तीन भुवनके बीचमें यह जेसल (जयसिंह-सिद्धराज) राजा [एक बड़ा] कूट बुरुड * है जिसने अनेक राजवंशोंका छेदन कर [अपना] एक छत्र [राज्य] बनाया है। इसकी जय हो । १७२. महालय, महा-यात्रा महास्थान और महासरोवर,$ जैसे सिद्धराजने किये वैसे किसीने नहीं किये। १७३. जिगीषु जन (एक अर्थ-गानेकी इच्छा रखने वाले; दूसरा अर्थ-विजयकी इच्छा रखने वाले) एक मात्राका भी अधिक होना सह नहीं सकते, मानों इसी लिये हे धरानाथ (पृथ्वीनाथ)! तुमने धारानाथ (धारानगरी के नाथ) को नष्ट किया है। [क्यों कि 'धरानाथ' की अपेक्षा 'धारानाथ' में एक मात्रा अधिक है] १७४. हे सरस्वती, मान छोड़ दो; हे गंगा, तुम भी अपने सोहागकी भंगीको छोड़ो; अरी यमुने, अब तेरी कुटिलता वृथा है; रे रेवा, तूं वेगको छोड़ दे; क्यों कि अब समुद्र, श्री सिद्धराजके कृपाणसे कटे हुए शत्रुस्कंधोंमेंसे उछलने वाली रक्तकी धारासे बनी हुई नदीरूपी नवीन स्त्रीसे रक्त (१ लाल वर्ण, २ अनुरक्त- प्रेमी) हो गया है। १७५. हे विजयी राजाओंमें सिंह (जयसिंह) महाराज, सचमुच ही तुम्हारे जय-यात्राके समय, हाथियोंके कारण जलाशयोंके सूख जानेकी चिंतासे; वीरोंके घावकी आकांक्षासे; तथा, अपने पतियोंके विनाशकी आशंकासे; क्रमशः मछली रोती है, मक्खी हँसती है, और स्त्रियाँ अशुभका ध्यान करती हैं।
- बुरुड या बरुड उस जातिका नाम है जो बाँसको चीर-छोल कर उससे टोकरी, करंडक और छाता आदि बनाये करते हैं। कहीं कहीं 'गछ' भी इनको कहा है। इस पद्यमें, राजवंश और छत्र ये शब्द श्लेषात्मक हैं। $ इस पद्यमें सिद्धराजके ४ महाकार्य बतलाये गये हैं-जिनमें महालयसे तो सिद्धपुरके रुद्रमहालयका सूचन होता है। महायात्रासे बहुत करके सोमेश्वर तीर्थकी की हुई बड़ी यात्राका सूचन होता है। किसीके ख्यालसे सिद्धराजने जो मालवे पर विजय प्राप्त किया था उस विजययात्राका इसमें सूचन किया गया है। महासरोवरसे पाटनके सहस्रलिंग सरोवरका निर्देश किया गया है। ४ थे महास्थानसे किस वस्तुका सूचन होता है यह ठीक साव नहीं होता। कहते हैं कि सिद्धराजने कई बड़े बड़े किले भी बनाये थे और कई बड़े स्थान भी बसाये थे। संभव है उन्हींमेंसे किसीकी कोई सूचन इसमें किया गया हो।