भारतकोश
प्रबन्धचिन्तामणि (गुजरात, मालवा व चालुक्य ऐतिहासिक प्रबन्ध)

प्रबन्धचिन्तामणि (गुजरात, मालवा व चालुक्य ऐतिहासिक प्रबन्ध)

Prabandha Chintamani with Hindi Translation

मेरुतुङ्गाचार्य (१३०४ ई.) / पं. हजारीप्रसाद द्विवेदी द्वारा

DevanagariHindipublished181 पृष्ठ

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पृष्ठ 116

प्रकरण १२५ ] सिद्धराजकी स्तुतिके कुछ फुटकर पद्य । [ ९१ १७६. हे सिद्धराज, नत हो जाने पर तो तुमने आनाक भूपको अनेक लाखोंके साथ सपादलक्ष [ जैसा देश ] भी दे दिया और दृप्त ऐसे यशोवर्माके पास मालव ( मालवा देश; श्लेषार्थ मा=लक्ष्मीका ल्व= लेशमात्र ) का होना भी तुमने सहन नहीं किया । इत्यादि बहुतसी स्तुतियां और प्रबंध उसके बारेमें हैं जो [ ग्रन्थान्तरोंसे ] जानने योग्य हैं । सं० ११५० से ले कर [११९९ तक] ४९ वर्ष तक श्री सिद्धराज जयसिंह देव ने राज्य किया। * इस प्रकार श्री मेरुतुङ्गाचार्यके बनाये हुए प्रबंध चिन्तामणिमें श्री कर्ण और श्री सिद्धराजका चरित्र वर्णन नामक यह तीसरा प्रकाश समाप्त हुआ । यहाँ पर P प्रतिमें निम्नलिखित श्लोक अधिक पाये जाते हैं। ये श्लोक सोमेश्वरदेव रचित कीर्ति- कौमुदीके हैं और इनमें संक्षेपमें सिद्धराज के जीवनके महत्त्वके सभी वीर कार्योंका सूचन किया गया है- [ १०६ ] जिसने, बालक होते हुए भी, इंद्रकी वीरवृत्तिको भी लांघ जाने वाले अपने कोपके प्रभावसे दुष्ट राजाओंको आज्ञाधीन बनाया । [ १०७ ] अपार पौरुषके उद्गारवाले सौराष्ट्रिय खंगारको भी, जिस गुरुमत्सरने युद्धमें इस प्रकार पीस डाला, जैसे सिंह हाथीको पीसता है। [ १०८ ] जिसने रामचंद्रकी तरह असंख्य घोड़ोंकी सेना ले कर और अनेक राजाओंको नष्ट करके ( रामके पक्षमें-पर्वतोंको उखाड कर ) सिन्धुपतिको (सिद्धराजके पक्षमें - सिन्धुराज नामका राजा, रामके पक्षमें सिन्धु=समुद्र ) बाँध लिया । [ १०९ ] मनमें अमर्ष करके विपक्षी य उर्वीभृत् (एक अर्थ-पर्वत, दूसरा - राजा) के उन्नत होने पर, जिसने अगस्त्य मुनिकी भाँति, शीघ्र ही अर्णोराज (एक अर्थ-समुद्र; दूसरा- शाकंभरी का चाहमान राजा ) को शुष्क कर डाला । [ ११० ] विष्णुने तो अर्णोराज ( समुद्र ) की पुत्री ले ली थी, किन्तु इसने तो अर्णोराजको अपनी पुत्री दे दी* । विष्णु और इस सिद्धराज में एक यही अंतर है। [ १११ ] शत्रुओंके कटे हुए सिर देख कर शाकंभरी के ईशने भी शंकित हो कर इसके चरणोंमें अपना सिर झुका दिया । [ ११२] स्वयं अत्यंत लक्ष्मीवान् और अपरमार (दूसरोंको न मारनेवाला) हो कर भी युद्धमें जिसने मालवस्वामी (एक अर्थ - मालव देशका राजा, दूसरा श्लेषार्थ - लक्ष्मीका किंचित् भोक्ता ) परमारको मार डाला। [ ११३] जिसने धारा-नरेश को राज-शुककी तरह काष्ठ-पञ्जर (काठके पिंजड़े) में रख कर अपनी कीर्तिरूपा राजहंसीको काष्ठा-पञ्जर (दिक्पंकवालं) में छोड़ दिया। [ ११४] जिसने नरवर्मा राजाकी तो केवल एक ही नगरी जो धारा थी वह ले ली, पर उसकी वधुओंको [बदलेमें] हजारों अश्रु-धारायें दे दीं ।

  • शाकंभरी (अजमेर) के चाहमान राजा अर्णोराजको, जिसका देस्य नाम आनाक या आना था, सिद्धराजने युद्ध करके पहले तो अपना आज्ञाधीन राजा बनाया और फिर पीछेसे उसको अपनी पुत्री ब्याह दी थी। इसीका सूचन इस पद्यमें है।