भारतकोश
प्रबन्धचिन्तामणि (गुजरात, मालवा व चालुक्य ऐतिहासिक प्रबन्ध)

प्रबन्धचिन्तामणि (गुजरात, मालवा व चालुक्य ऐतिहासिक प्रबन्ध)

Prabandha Chintamani with Hindi Translation

मेरुतुङ्गाचार्य (१३०४ ई.) / पं. हजारीप्रसाद द्विवेदी द्वारा

DevanagariHindipublished181 पृष्ठ

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९४ ] प्रबन्धचिन्तामणि [ तृतीय प्रकाश राजाके आदमी पैरोंके चिह्नके अनुसार वहाँ पहुँचे, परंतु उसका वहाँ पाना असम्भव जान कर और भालेकी नोकको उसमें खोंच कर देखने पर भी कुछ न मालूम कर, वे वहाँसे वापस लौट गये । दूसरे दिन खेतवालोंने उस स्थानसे उसे बाहर निकाला । वह सबेरे ही यहाँसे आगे चलता हुआ एक वृक्षकी छायामें बैठ कर विश्राम लेने लगा, तो क्या देखता है कि, एक चूहा निभृतभावसे बिलमेंसे चाँदीका सिक्का बाहर ला कर रख रहा है । जब वह इस प्रकार इक्कीस सिक्के निकाल चुका, तो उनमेंसे फिर एक वापस उठा कर यह बिलमें ले गया। उसके बिलमें घुसने पर बाकीके सब सिक्के उठा कर कुमारपालने ले लिये और यह ज्यों ही एकान्तमें जा कर देखता है तो वह चूहा बाहर आ कर उन सिक्कोंको न पा कर वहीं छटपटा कर मर गया। कुमारपाल उसके शोकसे मनमें बड़ा व्याकुल हो कर चिरकाल तक परिताप करता रहा। फिर आगे चलते हुए रास्तेमें किसी [ धनी पुरुष ] की बहूने, जो ससुरालसे पीहर जा रही थी, देखा कि राहखर्चके अभावमें तीन दिनसे भूखे मरते उसका पेट फक पड़ गया है । उसने भाईकी तरह स्नेहसे कर्पूरकीसी सुगन्धिवाले चावलके करंबेसे उसको तृप्त किया । १२८) बादमें, विविध देशान्तरोंका भ्रमण करता हुआ, वह स्तम्भतीर्थ में मह० श्रीउदयन के पास कुछ मार्गखर्च माँगनेके लिये आया । यह सुन कर कि वह पौषधशालामें है, तो वह यहाँ आया । उसे देख कर उदयनने हेमचन्द्राचार्य से [ उसके बारेमें ] पूछा । उन्होंने कहा कि - इसके अगके लक्षण लोकोत्तर हैं । यह भविष्यमें चक्रवर्ती राजा होगा। आजन्म दरिद्रतासे सताये हुए उस क्षत्रियने जब इस बातको असम्भव कहा, तो उन्होंने यह लिख कर एक पत्रक मंत्रीको और एक उसको दिया कि - 'यदि सं० ११९९ कार्तिक वदि ( B P सुदि) २ रविवार हस्त नक्षत्रमें, आपका पट्टाभिषेक न हों तो, इसके बाद, १मैं शकुन देखना ही त्याग दूँगा।' फिर वह क्षत्रिय उनकी इस कला-कौशल वाली चातुरीसे मनमें चकित हो कर बोला कि- 'यदि यह बात सच हुई तो, आप ही राजा रहेंगे और मैं आपका चरणरेणु हो कर रहूँगा'- और इसकी प्रतिज्ञा की । श्री हेमाचार्य ने कहा कि-' नरकरूप अन्तिम फल देनेवाली राज्यलिप्सासे हमें कोई मतलब नहीं है । आप कृतज्ञ हो कर यह बात न भूलियेगा और जैन शासनका भक्त हो कर सदा रहियेगा।' इस अनुशासनको सिर माथे रख कर और आज्ञा ले कर फिर मंत्रीके साथ उसके घर गया । यहा स्नान, पान, भोजन आदिसे सत्कृत हो कर और राहखर्च पा कर, बिदा ले मालव देशमें आया । यहाँ कुण्डेश्वर प्रासादमें पट्टिका पर १७७. सम्वत् ११९९ का वर्ष पूर्ण होने पर, हे विक्रमादित्य, तुम्हारे ही समान एक कुमारपाल नामक राजा [जैन धर्मका पालन करने वाला ] होगा । इस प्रकारकी गाथा लिखी हुई देख कर मनमें बड़ा विस्मित हुआ। [इस समय] गूर्जराधिपति सिद्ध- राजका स्वर्गवास सुन कर वहाँसे लौटा । उसका सब खर्च समाप्त हो चुका था । उसी नगरमें, किसी बनियेकी दूकान पर [बिना कुछ दिये ] भोजन करनेके बाद उसको बदी किया गया । वह व्याकुल हो कर रोने लगा तो, फिर नगरके लोगोंके इकट्ठा होने पर दोनोंका मरण होगा यह जान कर उस बनियेने कहा कि-'मेरी बनावटी मूर्च्छा है इसे तुम दूर करनेका प्रयत्न करने लगो' उसके इस प्रकारके बुद्धिवैभवसे अपनेको प्रत्युज्जीवित मान- कर, कुमारपालने वैसा किया और उस उपायसे अपना कष्ट छुटा कर वह अणहिल्लपुर में रातके समय पहुँचा। पासमें कुछ न होनेके कारण कंदोईकी दूकान पर जा कर, उसका दिया हुआ कुछ खाया। बादमें अपने बहनोई राजकुल श्रा कान्हदेव के घर गया । जब कान्हदेव राजमंदिरसे आया तो उसे आगे आगे करके घरके भीतर ले गया। फिर अच्छा खाना आदि खा कर स्वस्थ हो कर सो गया । १ यहा पर यह क्या बात कही गई है सो ठीक समझमें नहीं आती । ग्रन्थकारका लेख बहुत अस्पष्ट और खंडित है ।