प्रबन्धचिन्तामणि (गुजरात, मालवा व चालुक्य ऐतिहासिक प्रबन्ध)
Prabandha Chintamani with Hindi Translation
मेरुतुङ्गाचार्य (१३०४ ई.) / पं. हजारीप्रसाद द्विवेदी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंप्रकरण १२८-१३१ ] कुमारपालादि प्रबन्ध [ ९५ कुमारपालका राजगद्दीपर बैठना । १२९ ) प्रातःकाल वह बहनोई अपना सैन्य तैयार करके, उसके साथ, उसको राजाके महलमें ले आया। अभिषेककी परीक्षाके लिये पहले एक कुमारको पट्टे पर बैठाया । उसको चादरके आँचलोंको भी ठीक सम्भालते न देख फिर एक दूसरेको बैठाया । उसको हाथ जोड़ कर बैठा हुआ देख कर उसे भी अप्रमाणित किया। फिर कान्हड़देव की अनुज्ञासे कुमारपाल, वस्त्र संवरण करके ऊँचेसे श्वास लेता हुआ और हाथमें तलवार कँपाता हुआ, सिंहासन पर जा बैठा । पुरोहितने मंगलाचार किया, नगाड़े बजे । श्रीमान् कान्हड़देव ने पंचांगोंसे पृथ्वी चूम कर प्रणाम किया । उस समय उसकी अवस्था पचास वर्षकी हुई थी । * कुमारपालने राजद्रोहियोंका उच्छेद किया । १३० ) कुमारपाल स्वयं प्रौढ होनेके कारण, तथा देशान्तर भ्रमणसे विशेष निपुणता प्राप्त करनेके कारण, सब राज्यशासन स्वयं करने लगा। राज-वृद्धोंको यह अच्छा नहीं लगा। उन्होंने मिल कर उसे मारना चाहा और अन्धकार वाले दरवाजेमें घातकोंको रख दिया। पूर्वजन्मके शुभ कर्मोंसे प्रेरित किसी आप्तने उस वृत्तान्तको बता कर उसे अन्य द्वारसे मकानमें प्रवेश कराया । बादमें उन प्रधानोंको उसने शीघ्र यमपुरीको भेज दिया । वह भावुक मण्डलेश्वर ( कान्हडदेव ), राजा अपना साला होनेके कारण, तथा अपने आपको राज- प्रतिष्ठाचार्य समझ कर, राजाकी दुरवस्थाके [ उन पिछले ] मर्मोंको कहा करता । इस पर किसी समय राजाने कहा- ' हे भावुक, तुम्हें इस प्रकार राज-दरबारमें सर्वदा पुरानी दुर्ववस्थाके मर्मोंका मजाक नहीं करना चाहिये । अग्रेसे ऐसी बातें सभामें न कहना, विजनमें चाहे यथेच्छ कहते रहना ।' राजाके इस प्रकार उपरोध करने पर भी, उत्कट अवज्ञावश हो कर वह बोला कि- ' रे अनात्मज्ञ ! अभी इतनेहीमें अपने पैर उखाड रहा है?' इस प्रकार बकता हुआ, मानों मोतहीकी इच्छासे, औषधकी भाँति उसके पथ्य वचनको भी उसने ग्रहण नहीं किया । [ उस क्षण तो ] राजाने अपने भावका संवरण करके अपनी मनोवृत्ति छिपा ली। दूसरे दिन राजाके संकेत प्राप्त मल्लोने उसका अंग तोड़ मरोड़ कर, दोनों आँखें निकाल लीं और उसे उसके मकान पर भिजवा दिया । १७८. इस विचारसे कि पहले मैने ही इसे जलाया है अतः तिरस्कार करने पर भी यह मुझे नहीं जलायेगा, इस भ्रमके वश हो कर दीपककी तरह, राजाको कोई अंगुलिके पोरसे भी न छुए। यह विचार कर, सामन्त लोग, उस दिनसे अत्यधिक भयचकित चित्त हो कर, प्रतिपद पर उसकी सेवा करने लगे । * १३१) राजाने पूर्वमें उपकार करने वाले उदयन के पुत्र वाग्भटदेव को अपना महामात्य बनाया और आलिंग को तथा महं० उदयन देव को बड़े (वृद्ध) प्रधान बनाये । * कुमारपालका चाहमान राजा आनाकके साथ युद्ध । १३२) चाहड़ नामक एक कुमार सिद्धराज का प्रतिपन्न (माना हुआ) पुत्र था। वह कुमारपालदेव की आज्ञा न मान कर सपादलक्ष के राजाके पास सैनिक हो कर चला गया । वह श्री कुमारपाल के साथ विग्रह करनेकी इच्छासे, वहाँके सभी सामन्त लोगोंको डाँच (रिश्वत) आदिके द्वारा अपने वशमें करके, प्रबल सेनाके साथ सपादलक्ष के राजाको ले कर [गूर्जर] देशकी सीमा पर चढ़ आया। अब, चौलुक्य चक्रवर्ती (कुमारपाल) ने भी, प्रतिशत्रु बन कर, उस सैन्यके सामने अपना सैन्यसमूह जमा किया। जब लड़ाईका दिन तै हुआ और सीमायें निष्कंटक की गई तथा चतुरङ्ग सेना सजित की गई, तो उसी समय पह