प्रबन्धचिन्तामणि (गुजरात, मालवा व चालुक्य ऐतिहासिक प्रबन्ध)
Prabandha Chintamani with Hindi Translation
मेरुतुङ्गाचार्य (१३०४ ई.) / पं. हजारीप्रसाद द्विवेदी द्वारा
पृष्ठ 123, कुल 181 में से
संदर्भ में पढ़ेंधारण कर और काले ही तंबूमें निवास करता हुआ [ पत्तन आया ] वहाँ पर चौलुक्य भूपाल (कुमारपाल) ने उसे इस ढंगमें देखा तो पूछा कि 'यह किसका सैन्य पड़ा है ?' इस पर उसे कहा गया कि 'कौंकण से लौटे हुए पराजित सेनापति आम्बड के सैन्यका यह पड़ाव है।' उसकी ऐसी लज्जाशीलतासे चित्तमें चमत्कृत हो कर, प्रसन्नदृष्टिसे उसे आदरके साथ बुलाया और फिर अन्यान्य बलवान् सामन्तोंके साथ मल्लिकार्जुन को जीतनेके लिये उसीको राजाने फिर भेजा । [ वह इस बार कौंकण देशमें पहुँच कर ] उस नदीको उतर कर उस पर पुल बँधवाया और फिर उस परसे सारे सैन्यको पार करके बड़ी सावधानीके साथ युद्धकी व्यवस्था की । घमासान युद्ध शुरू होने पर उस सुभट आम्बड ने हाथीके कन्धे पर सवार मल्लिकार्जुन को ही लक्षित करके, बड़ी वीरवृत्ति के साथ उसके हाथीके दाँतरूपी मूसलकी सीढ़ीसे, उसके कुम्भस्थल पर चढ़ बैठा । उद्दाम रण- शौर्यसे मतवाला हो कर बोला कि- 'पहले प्रहार करो, या इष्ट देवताका स्मरण करो।' यह कह कर [उसके सम्भलते ही] अपनी धाराल तलवारके प्रहारसे मल्लिकार्जुन को पृथ्वी पर गिरा दिया। उधर सामन्त लोग नगर लूटनेमें सलग्न थे, इधर इसने खेलहीमें, जैसे सिंहशावक हाथीको [ मार डालता है ] वैसे ही [ मल्लिकार्जुनको ] मार डाला । फिर उसके मस्तकको सोने [के पतरे ] से लपेट कर, उस देशमें चौलुक्य चक्रवर्तीकी आज्ञाकी घोषणा करता हुआ, अणहिल्लपुर जा कर, बहत्तर सामन्तोंके साथ सभामें बैठे हुए अपने स्वामी कुमारपाल नृपतिके चरणोंकी, उसके सिररूपी कमलसे पूजा की, तथा ये ४ चीजें भेंट कीं- १ शृङ्गारकोड़ी नामक साड़ी; २ माणिक नामक पिछोडा, ३ पापक्षय नामक हार, और ४ संयोगसिद्धि नामक सिप्रा । इनके सिवा ३२ कुंभ सुवर्ण, ६ मूड़ा मोती, चार दाँतवाला श्वेत हाथी, १२० पात्र (वारांगना) और १४॥ कोडी सुवर्ण दण्डके रूपमें उपस्थित किया । इससे अति प्रसन्न हो कर राजाने श्री आम्बड नामक महामण्डलेश्वरको श्रीमुखसे [उस मल्लिकार्जुन का धारण किया हुआ वह ] 'राज-पितामह' विरुद समर्पण किया । इस प्रकार यह मंत्री आम्बडका प्रबंध समाप्त हुआ । * कुमारपालके साथ हेमचन्द्राचार्यके समागमका प्रसंग । १३८) एक बार, अणहिल्लपुर में भट्टारक श्री हेमचंद्र सूरि ने अपनी पाहिणि नामक माताको, कि जिसने दीक्षा ली हुई थी, परलोक प्राप्तिके समय कोटि नमस्कारके पुण्यका दान किया । मृत्युके बाद [स्वजन ] जब उसका सस्कार महोत्सव करने जा रहे थे, तब त्रिपुरुष धर्मस्थानके निकट [उसका शवनिमान पहुंचा तो] वहाँके तपस्वियोंने स्वाभाविक मत्सरतावश, उस विमानका भंग करके आचार्यका खूब अपमान किया । उसकी उत्तरक्रिया करवा कर, उस अपमानके आघातसे कुपित हो कर उन्होंने [उस समय ] मालवेमें स्थित कुमारपाल भूपतिके स्कन्धावार (सेनानिवेश) को अलंकृत किया । १७९. मनुष्यको [ अभीष्ट कार्यसिद्धि प्राप्त करनेके लिये ] या तो स्वय राजा बनना चाहिये या किसी राजाको हाथमें करना चाहिये । [इन दो रास्तोंके सिवा] कामके सिद्ध करनेका तीसरा रास्ता नहीं है । इस वचनके तत्त्वका विचार कर उन्होंने ऐसा किया । उनके इस तरह आनेका समाचार उदयनमंत्री ने राजाको सुनाया तो कृतज्ञोंके शिरोमणि उस राजाने परम अनुरोधके साथ उन्हें अपने महलमें बुलवाया । राज्य पानेके शकुन ज्ञानको स्मरण करते हुए राजाने अनुरोध करके कहा कि-'आप सर्वदा देवताअर्चनके अवसर पर यहा आया करें।' इस पर सूरिने कहा-