प्रबन्धचिन्तामणि (गुजरात, मालवा व चालुक्य ऐतिहासिक प्रबन्ध)
Prabandha Chintamani with Hindi Translation
मेरुतुङ्गाचार्य (१३०४ ई.) / पं. हजारीप्रसाद द्विवेदी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंप्रकरण १३१-१३७ ] , कुमारपालादि प्रबन्ध । [ ९७
गायक सोलाककी कलाप्रवीणता । १३४) एक बार, सोलाक नामक गायकने अवसर पा कर अपनी गानकलासे राजाको संतुष्ट किया, तो उसने इनाममें मात्र ११६ द्रम्म उसे दिये। इससे [ वह असंतुष्ट हो कर उन द्रम्मोंसे ] सुखभक्षिका (गुड़ और आटेकी बनी हुई एक मीठाई ) ले कर उसे बालकोंको बाँट दिया। राजाने इस पर कुपित हो कर उसे निर्वासित कर दिया । उसने, वहाँसे फिर विदेशमें जा कर [ किसी एक ] राजाको अपनी अनुपम गीतकलासे प्रसन्न किया और उससे इनाममें दो हाथी पाये । उनको ला कर उसने चौलुक्य राज को भेंट किये । राजाने [ फिर ] उसका सन्मान किया । १३५) किसी समय, कोई विदेशी गवै या [ राजाकी सभामें आ कर ] यह कह कर जोरसे चिल्लाने लगा कि 'मैं लुट गया, लुट गया !' राजाने पूँछा- 'किसने लुट गया ?' तो उसने बताया कि मेरी अतुल गीतकलासे एक मृग समीप आ कर खड़ा रहा । मैने कौतुक वश उसके गलेमें अपनी सोनेकी कंठी पहना दी । फिर भयसे वह भाग गया । इस लिये मै उस हिरनसे लूटा गया हूँ । तब बादमें, राजाका आदेश पा कर उस सोला नामक गन्धर्वराजने वनमें जा कर अपनी मनोहर गीतविद्याके आकर्षण द्वारा सोनेकी कंठी- वाले उस मृगको आकर्षित करके ले आ कर राजाको दिखाया । १३६) उसके इस कलाकौशलसे मनमें चकित हो कर, प्रभु श्रीहेमाचार्यने उसकी गीतकलाकी कितनी शक्ति है सो पूछी । उसने सूखे काठको पल्लवित कर देने तक की [ अपनी कलाकी ] अवधि बताई । उसको इस कौतुकके दिखानेका आदेश दिया गया तो, उसने अर्बुद गिरि परसे तिरुहक नामक वृक्षको उखड़वा कर मंगवाया, और उसके शुष्क शाखाखण्डको राजमहलके आँगनमें, कुमारमृत्तिका (कुमारी मिट्टी = किसीने नहीं छुई हुई ऐसी कोरी मिट्टी) से भरे हुए, आलवाल (क्यारी) में रख कर अपनी नवप्रशं- सित गीतकलासे तत्काल उसे पल्लवोंसे सुशोभित करके दिखा दिया और इस प्रकार राजाके साथ भट्टारक श्री हेमचंद्रसूरिको उसने सन्तुष्ट किया । इस प्रकार वड़िकारं सोलाकका प्रबंध समाप्त हुआ। * कोंकणके राजा मल्लिकाजुनका मंत्री आवड द्वारा उच्छेद । १३७) इसके बाद, एक बार, जब चौलुक्य चक्रवर्ती (कुमारपाल) ने कौङ्कण देश के मल्लिका र्जुन नामक राजाके बंदीके मुँहसे (उसका) "राजपितामह" ऐसा विरुद सुना, तो उससे राजाको इर्ष्या हुई और उसने उस दृष्टिसे सभाकी ओर देखा। राजाके चित्तकी बातको समझ लेने वाले मंत्री आम्भड को हाथ जोड़ते देख कर राजा मनमें चकित हुआ। सभाबिसर्जनके अनन्तर हाथ जोड़नेका कारण पूछा । इस पर उसने कहा कि आपका यह आशय समझ कर कि- 'क्या कोई ऐसा सुभट इस सभामें है, जिसे भेज करके, शत- रंजके खेलके राजाके समान इस नृपाभास मल्लिका र्जुन को उखाड़ कर फेंक दिया जाय' । मैं आपके आदेशको पूरा कर सकता हूँ; इस लिये मैने हाथ जोड़े । उसकी इस बातको सुन कर राजाने उसे सेनानायक बना कर और पञ्चाङ्ग पुरस्कार दे कर समस्त सामन्तोंके साथ बिदा किया । वह बिना रुके चलता हुआ कौंकण देश में पहुँचा और अगाध जलसे भरी क लविणी नामक नदीको पार करके सामनेके किनारे पर जा ठहरा । उसे इस प्रकार संग्रामके लिये तैयार होता देख वह राजा मल्लिका र्जुन [ अकस्मात् ही ] प्रहार करता हुआ उसकी सेना- पर टूट पड़ा । इससे वह सेनापति (आम्बड) पराजित हो गया । तब फिर वह कृष्णवदन हो कर, काले वस्त्र १ वशानुक्रमसे जो गवैयाका कार्य करते ये उनको बड़कार कहते थे । २५-२६