प्रबन्धचिन्तामणि (गुजरात, मालवा व चालुक्य ऐतिहासिक प्रबन्ध)
Prabandha Chintamani with Hindi Translation
मेरुतुङ्गाचार्य (१३०४ ई.) / पं. हजारीप्रसाद द्विवेदी द्वारा
प्रकरण १३१-१३७ ] , कुमारपालादि प्रबन्ध । [ ९७
गायक सोलाककी कलाप्रवीणता । १३४) एक बार, सोलाक नामक गायकने अवसर पा कर अपनी गानकलासे राजाको संतुष्ट किया, तो उसने इनाममें मात्र ११६ द्रम्म उसे दिये। इससे [ वह असंतुष्ट हो कर उन द्रम्मोंसे ] सुखभक्षिका (गुड़ और आटेकी बनी हुई एक मीठाई ) ले कर उसे बालकोंको बाँट दिया। राजाने इस पर कुपित हो कर उसे निर्वासित कर दिया । उसने, वहाँसे फिर विदेशमें जा कर [ किसी एक ] राजाको अपनी अनुपम गीतकलासे प्रसन्न किया और उससे इनाममें दो हाथी पाये । उनको ला कर उसने चौलुक्य राज को भेंट किये । राजाने [ फिर ] उसका सन्मान किया । १३५) किसी समय, कोई विदेशी गवै या [ राजाकी सभामें आ कर ] यह कह कर जोरसे चिल्लाने लगा कि 'मैं लुट गया, लुट गया !' राजाने पूँछा- 'किसने लुट गया ?' तो उसने बताया कि मेरी अतुल गीतकलासे एक मृग समीप आ कर खड़ा रहा । मैने कौतुक वश उसके गलेमें अपनी सोनेकी कंठी पहना दी । फिर भयसे वह भाग गया । इस लिये मै उस हिरनसे लूटा गया हूँ । तब बादमें, राजाका आदेश पा कर उस सोला नामक गन्धर्वराजने वनमें जा कर अपनी मनोहर गीतविद्याके आकर्षण द्वारा सोनेकी कंठी- वाले उस मृगको आकर्षित करके ले आ कर राजाको दिखाया । १३६) उसके इस कलाकौशलसे मनमें चकित हो कर, प्रभु श्रीहेमाचार्यने उसकी गीतकलाकी कितनी शक्ति है सो पूछी । उसने सूखे काठको पल्लवित कर देने तक की [ अपनी कलाकी ] अवधि बताई । उसको इस कौतुकके दिखानेका आदेश दिया गया तो, उसने अर्बुद गिरि परसे तिरुहक नामक वृक्षको उखड़वा कर मंगवाया, और उसके शुष्क शाखाखण्डको राजमहलके आँगनमें, कुमारमृत्तिका (कुमारी मिट्टी = किसीने नहीं छुई हुई ऐसी कोरी मिट्टी) से भरे हुए, आलवाल (क्यारी) में रख कर अपनी नवप्रशं- सित गीतकलासे तत्काल उसे पल्लवोंसे सुशोभित करके दिखा दिया और इस प्रकार राजाके साथ भट्टारक श्री हेमचंद्रसूरिको उसने सन्तुष्ट किया । इस प्रकार वड़िकारं सोलाकका प्रबंध समाप्त हुआ। * कोंकणके राजा मल्लिकाजुनका मंत्री आवड द्वारा उच्छेद । १३७) इसके बाद, एक बार, जब चौलुक्य चक्रवर्ती (कुमारपाल) ने कौङ्कण देश के मल्लिका र्जुन नामक राजाके बंदीके मुँहसे (उसका) "राजपितामह" ऐसा विरुद सुना, तो उससे राजाको इर्ष्या हुई और उसने उस दृष्टिसे सभाकी ओर देखा। राजाके चित्तकी बातको समझ लेने वाले मंत्री आम्भड को हाथ जोड़ते देख कर राजा मनमें चकित हुआ। सभाबिसर्जनके अनन्तर हाथ जोड़नेका कारण पूछा । इस पर उसने कहा कि आपका यह आशय समझ कर कि- 'क्या कोई ऐसा सुभट इस सभामें है, जिसे भेज करके, शत- रंजके खेलके राजाके समान इस नृपाभास मल्लिका र्जुन को उखाड़ कर फेंक दिया जाय' । मैं आपके आदेशको पूरा कर सकता हूँ; इस लिये मैने हाथ जोड़े । उसकी इस बातको सुन कर राजाने उसे सेनानायक बना कर और पञ्चाङ्ग पुरस्कार दे कर समस्त सामन्तोंके साथ बिदा किया । वह बिना रुके चलता हुआ कौंकण देश में पहुँचा और अगाध जलसे भरी क लविणी नामक नदीको पार करके सामनेके किनारे पर जा ठहरा । उसे इस प्रकार संग्रामके लिये तैयार होता देख वह राजा मल्लिका र्जुन [ अकस्मात् ही ] प्रहार करता हुआ उसकी सेना- पर टूट पड़ा । इससे वह सेनापति (आम्बड) पराजित हो गया । तब फिर वह कृष्णवदन हो कर, काले वस्त्र १ वशानुक्रमसे जो गवैयाका कार्य करते ये उनको बड़कार कहते थे । २५-२६
धारण कर और काले ही तंबूमें निवास करता हुआ [ पत्तन आया ] वहाँ पर चौलुक्य भूपाल (कुमारपाल) ने उसे इस ढंगमें देखा तो पूछा कि 'यह किसका सैन्य पड़ा है ?' इस पर उसे कहा गया कि 'कौंकण से लौटे हुए पराजित सेनापति आम्बड के सैन्यका यह पड़ाव है।' उसकी ऐसी लज्जाशीलतासे चित्तमें चमत्कृत हो कर, प्रसन्नदृष्टिसे उसे आदरके साथ बुलाया और फिर अन्यान्य बलवान् सामन्तोंके साथ मल्लिकार्जुन को जीतनेके लिये उसीको राजाने फिर भेजा । [ वह इस बार कौंकण देशमें पहुँच कर ] उस नदीको उतर कर उस पर पुल बँधवाया और फिर उस परसे सारे सैन्यको पार करके बड़ी सावधानीके साथ युद्धकी व्यवस्था की । घमासान युद्ध शुरू होने पर उस सुभट आम्बड ने हाथीके कन्धे पर सवार मल्लिकार्जुन को ही लक्षित करके, बड़ी वीरवृत्ति के साथ उसके हाथीके दाँतरूपी मूसलकी सीढ़ीसे, उसके कुम्भस्थल पर चढ़ बैठा । उद्दाम रण- शौर्यसे मतवाला हो कर बोला कि- 'पहले प्रहार करो, या इष्ट देवताका स्मरण करो।' यह कह कर [उसके सम्भलते ही] अपनी धाराल तलवारके प्रहारसे मल्लिकार्जुन को पृथ्वी पर गिरा दिया। उधर सामन्त लोग नगर लूटनेमें सलग्न थे, इधर इसने खेलहीमें, जैसे सिंहशावक हाथीको [ मार डालता है ] वैसे ही [ मल्लिकार्जुनको ] मार डाला । फिर उसके मस्तकको सोने [के पतरे ] से लपेट कर, उस देशमें चौलुक्य चक्रवर्तीकी आज्ञाकी घोषणा करता हुआ, अणहिल्लपुर जा कर, बहत्तर सामन्तोंके साथ सभामें बैठे हुए अपने स्वामी कुमारपाल नृपतिके चरणोंकी, उसके सिररूपी कमलसे पूजा की, तथा ये ४ चीजें भेंट कीं- १ शृङ्गारकोड़ी नामक साड़ी; २ माणिक नामक पिछोडा, ३ पापक्षय नामक हार, और ४ संयोगसिद्धि नामक सिप्रा । इनके सिवा ३२ कुंभ सुवर्ण, ६ मूड़ा मोती, चार दाँतवाला श्वेत हाथी, १२० पात्र (वारांगना) और १४॥ कोडी सुवर्ण दण्डके रूपमें उपस्थित किया । इससे अति प्रसन्न हो कर राजाने श्री आम्बड नामक महामण्डलेश्वरको श्रीमुखसे [उस मल्लिकार्जुन का धारण किया हुआ वह ] 'राज-पितामह' विरुद समर्पण किया । इस प्रकार यह मंत्री आम्बडका प्रबंध समाप्त हुआ । * कुमारपालके साथ हेमचन्द्राचार्यके समागमका प्रसंग । १३८) एक बार, अणहिल्लपुर में भट्टारक श्री हेमचंद्र सूरि ने अपनी पाहिणि नामक माताको, कि जिसने दीक्षा ली हुई थी, परलोक प्राप्तिके समय कोटि नमस्कारके पुण्यका दान किया । मृत्युके बाद [स्वजन ] जब उसका सस्कार महोत्सव करने जा रहे थे, तब त्रिपुरुष धर्मस्थानके निकट [उसका शवनिमान पहुंचा तो] वहाँके तपस्वियोंने स्वाभाविक मत्सरतावश, उस विमानका भंग करके आचार्यका खूब अपमान किया । उसकी उत्तरक्रिया करवा कर, उस अपमानके आघातसे कुपित हो कर उन्होंने [उस समय ] मालवेमें स्थित कुमारपाल भूपतिके स्कन्धावार (सेनानिवेश) को अलंकृत किया । १७९. मनुष्यको [ अभीष्ट कार्यसिद्धि प्राप्त करनेके लिये ] या तो स्वय राजा बनना चाहिये या किसी राजाको हाथमें करना चाहिये । [इन दो रास्तोंके सिवा] कामके सिद्ध करनेका तीसरा रास्ता नहीं है । इस वचनके तत्त्वका विचार कर उन्होंने ऐसा किया । उनके इस तरह आनेका समाचार उदयनमंत्री ने राजाको सुनाया तो कृतज्ञोंके शिरोमणि उस राजाने परम अनुरोधके साथ उन्हें अपने महलमें बुलवाया । राज्य पानेके शकुन ज्ञानको स्मरण करते हुए राजाने अनुरोध करके कहा कि-'आप सर्वदा देवताअर्चनके अवसर पर यहा आया करें।' इस पर सूरिने कहा-
प्रकरण १३८-१३९ ] कुमारपालादि प्रबन्ध [ ९९ १८०. हम लोग भिक्षा माँग कर तो भोजन करते हैं, जूने-पुराने वस्त्र पहनते हैं और अकेली जमीन पर सो रहते हैं, तब फिर हम लोगोंको राजाओंसे क्या करना है । उनके ऐसा कहने पर राजाने कहा - १८१. मित्र एक ही [ होना चाहिये ], राजा या यति; भार्या एक ही [ होनी चाहिये ] सुन्दरी रमणी या दरी ( कंदरा ); शास्त्र एक ही [ होना चाहिये ], वेद या अध्यात्म; और देवता भी एक ही [ होना चाहिये ] केशव या जिन । महाकविके इस कथनके अनुसार मैं परलोककी साधनाके लिये आपकी मित्रता चाहता हूं । ' किसी बातका निषेध न करना उसे स्वीकार कर लेना है' - इस उक्तिके कथनानुसार, सूरिके कुछ न कहने पर उस महर्षिकी चित्तवृत्तिको पहचान लेने वाले उस राजाने, लोगोंके आने जानेमें बाधा देने वाले द्वारपालोंको, श्रीमुखसे आज्ञा दी कि इन महर्षिको किसी भी समय आनेमें बाधा न दी जाय । * हेमाचार्यके समागमसे कुमारपालके पुरोहितका विद्वेष । १३९) बादमें सूरिको यहाँ आते जाते देख और राजाको उनके गुणका गान करते देख, विरोध भावसे पुरोहित आदिने कहा - १८२. विश्वामित्र, पराशर आदि तथा अन्य ऋषिगण, जो केवल जल और पत्ता खा कर रहते थे, वे भी स्त्रीके सुंदर मुखकमलको देख कर मोहित हो गये, तो फिर जो मनुष्य घी, दूध और दहीका आहार करते रहते हैं उनका इन्द्रियनिग्रह कैसा हो सकता है ! अहो, यह इनका दम्भ तो देखिये । उसके ऐसा कहने पर हेमचन्द्रने कहा- १८३. हाथी और सूअरका मास खाने वाला ऐसा जो बलवान् सिंह है वह, सुना जाता है कि वर्षमें केवल एक ही वक्त रति करता है; पर कर्कश शिलाखण्डको खाने वाला कबूतर रोज रोज कामी बना रहता है ! इसमें क्या कारण है, सो तो बताओ !' उसका मुँह बद कर देने वाले इस प्रत्युत्तरके बाद ही किसी [ और ] मासरीने कहा, कि ये श्वेताम्बर तो सूर्यको भी नहीं मानते । उसके ऐसा कहने पर - १८४. लोकको धारण करने वाले सूर्यको [ वास्तवमें ] हमी लोग हृदयमें धारण करते हैं । क्यों कि उसको अस्तगमन रूप सकट उपस्थित होने पर [ हम तो ] अन्न-जल भी छोड़ देते हैं । इस प्रमाणकी निपुणताके आधार पर, हमी लोग वस्तुतः सूर्यभक्त हैं, ये नहीं [ यह सिद्ध कर दिया ] । इससे उसका मुँह बद हो गया । फिर एक बार देवतावसर ( देवपूजाकी समाप्ति ) हो जाने पर, मोहान्धकारको नष्ट करनेमें चन्द्रमाके समान श्री हेमचन्द्र के आने पर यशश्चंद्रगणिने रजोहरणके द्वारा आसन पट्टको साफ कर वहाँ कम्बल बिछाया, तो राजाने [ उसका ] तत्त्व न समझते हुए पूछा कि 'क्या बात है ? ' उन्होने कहा - ' कदाचित् यहाँ कोई जन्तु हो, इस लिये उसको हटा देनेके लिये यह प्रयत्न होता है।' राजाने इस पर यह युक्ति-युक्त बात कही कि - ' यदि प्रत्यक्ष कोई जन्तु देखा जाय तो ऐसा करना उचित है; न कि यों ही वृथा प्रयास करना ठीक होता है।' इस पर उन सूरिने कहा - ' आप क्या [ अपनी ] हाथी घोड़ेकी सेनाको शत्रु राजाके चढ़ आने पर ही तैयार करते हैं, या पहले भी ?' जैसे वह राजव्यवहार है वैसे ही यह धर्म व्यवहार है । उनके इस प्रकारके गुणोंसे हृदयमें रंजित हो कर राजा, अपनी पहले की हुई प्रतिज्ञाके
१०० ] प्रबन्धचिन्तामणि [ चतुर्थ प्रकाश अनुसार, उन्हें अपना राज्य देने लगा, तो उन्होंने सर्व शास्त्रका विरोधहेतु बतलाते हुए उसका अस्वीकार किया। क्यों कि कहा है कि - १८४. हे युधिष्ठिर, जैसे जले हुए बीजका पुनः उद्गम नहीं होता वैसे राज-प्रतिग्रहसे (राजाके दिये हुए दानसे) दग्ध हुए ब्राह्मणोंका [फिर ब्राह्मण कुलमें] पुनर्जन्म नहीं होता। यह पुराणमें कहा गया है। उसी प्रकार जैन शास्त्र भी [कहते हैं]- 'गृहस्थके वहाँ भिक्षा मिलती हो तो फिर 'राजपिण्ड' (राजाके दान) की इच्छा क्यों करनी चाहिए' । इस प्रकार [प्रभु हेमचन्द्राचार्य का कहा हुआ सुन कर] उक्त विषयके ज्ञानसे चित्तमें चमत्कृत हुआ और वह पत्तन पहुँचा। * कुमारपालका सोमेश्वर तीर्थके जीर्णोद्धारका प्रारंभ करवाना। १४०) एक वार, राजाने मुनिसे पूछा- 'क्या किसी तरह मेरा भी यशका प्रसार कल्पान्त-स्थायी हो सकता है?' उसकी इस बातको सुन कर उन्होंने कहा-' [यह दो तरहसे हो सकता है-] या तो विक्रमादित्यके समान संसारको ऋण करनेसे, या सोमेश्वरका काष्ठमय मंदिर, जो समुद्रके पानीकी छाटोंसे शीर्णप्राय हो गया है, उसका उद्धार करनेसे कीर्ति युगान्त तक स्थायी हो सकती है।' इस प्रकार चन्द्रमाकी चाँदनीकी भाँति श्रीहेमचंद्रकी वाणी सुन कर उल्लसित आनंदके समुद्रसे उस राजाने उसी महर्षिको पिता, गुरु और देवता मानते हुए और विजातीय अन्य ब्राह्मणोंकी निंदा करते हुए, प्रासादके उद्धारके लिये, उसी समय ज्योतिषीसे शुभ लग्न ले कर, पञ्चकुलको वहाँ भेजा और प्रासादके उद्धारका आरंभ कराया। * कुमारपालका उदयनसे मंत्री हेमचन्द्राचार्यका जीवनवृत्तान्त पूछना। १४१) एक दूसरी बार, श्री हेमचंद्रके लोकोत्तर गुणोंसे हृत-हृदय हो कर राजाने मंत्री उदयन से 'पूछा कि-' इस प्रकारका यह पुरुष-रत्न, सकल वंशोंके भूषणरूप ऐसे किस वंशमें, समस्त पुण्यके प्रवेशवाले किस देशमें और सब गुणोंके आकर समान किस नगरमें पैदा हुआ है?' राजाके इस आदेश पर उस मंत्रीने जन्मसे आरंभ करके उनका पवित्र चरित्र इस प्रकार कह सुनाया- 'अर्धाष्टम नामक देशके धुन्धु का नामक नगरमें मोढ वंशके चाचिग नामक व्यवहारीकी, सतियोंमें श्रेष्ठ और जैनधर्मकी शासन देवता समान साक्षात् लक्ष्मी जैसी पाहिणि नामक सद्धर्मचारिणीके ये पुत्र हैं। चामुण्डा नामक गोत्र देवीके आद्याक्षरके नाम पर चांगदेव इनका नाम रखा गया था। इनकी अवस्था जब आठ वर्षकी थी, उस समय [इनके गुरु] श्री देवचन्द्राचार्य पत्तनसे तीर्थयात्राके लिये प्रस्थान कर धुन्धुकक गाममें गये। वहाँ मोढवस हिका में देवको नमस्कार करने जब गये तो यह लड़का समवयस्क बालकोंके साथ खेलता हुआ, अचानक सिंहासनके पास रखी हुई उन आचार्यकी गद्दी पर जा बैठा। इस बालकके अंग-प्रत्यंगमें संसारसे विलक्षण लक्षणोंको देख कर उन्होंने (देवचन्द्राचार्यने) कहा-'यह यदि क्षत्रिय कुलमें पैदा हुआ है तो सार्वभौम चक्रवर्ती होगा, यदि वणिक् या ब्राह्मण कुलमें पैदा हुआ होगा तो महामंत्री होगा और यदि दर्शन (संप्रदाय = धर्ममत) का स्वीकार करेगा तो युग-प्रधानकी नाई कलिकालमें भी सत्ययुग ले आयेगा'। आचार्यने यह सोच कर, उसको प्राप्त करनेकी इच्छासे उस नगरके रहने वाले व्यवहारियोंको साथ ले, वे चाचिगके घर गये। वह उस समय अन्य ग्राममें गया हुआ था। उसकी विवेकवती पत्नीने स्वागत-सत्कारसे उन्हें सन्तुष्ट किया। उनके यह कहने पर कि-श्रीसंघ (गाँवका मुख्य श्रावक समूह) तुम्हारे पुत्रको माँगने यहाँ आया है।' उसने हर्षके आँसू
चतुर्थ प्रकाश: मूलराज, सिद्धराज जयसिंह व कुमारपाल
प्रकरण १४०-१४२ ] कुमारपालादि प्रबन्ध [ १०१ बहा कर अपनेको रत्नगर्भा माना । तीर्थंकरोंको भी माननीय ऐसा संघ मेरे पुत्रको माँग रहा है, यह बडे हर्षकी बात है, फिर भी मुझे विषाद होता है । क्यों कि इसका पिता नितांत मिथ्या-दृष्टि (जैन धर्ममें अश्रद्धालु ) है और वैसा हो कर भी वह इस समय गाँवमें नहीं है । उन व्यवहारियोंने कहा कि [उसका कुछ विचार न कर इस पुत्रको ] तुम दे दो । उनके ऐसा कहने पर, माताने अपना दोष उतार देनेकी इच्छासे, दाक्षिण्यके वश हो कर अमात्य-गुणपात्र ऐसे अपने उस पुत्रको उन गुरुको दे दिया । तदनन्तर उस (माँ) ने जाना कि उन (आचार्य) का नाम देव चंद्र सूरि हैं। गुरुने उस बालकसे पूछा कि- 'तुम शिष्य बनोगे!' तो उसने 'हाँ' ऐसा कहा और वह लौटते हुए गुरुके साथ चल पड़ा । वहाँसे वे कर्णावती शहरमें आये। वहाँ पर उदयन मंत्रीके पुत्रोंके साथ वह बालक पालकों द्वारा पाला जाने लगा । इतनेमें बाहर गाँवसे आये हुए चाचिग ने यह सारा वृत्तान्त सुना तो, जब तक पुत्रका मुँह न देखने मिले तब तक, अन्नका त्याग कर उन गुरुका नाम पूछता हुआ कर्णावती पहुँचा । आचार्यके वसतिस्थानमें जा कर उस कुपित पिताने कुछ थोडासा प्रणाम किया । गुरुने पुत्रके अनुरोधसे उसे पहचान लिया, और फिर विचक्षणताके साथ विविध प्रकारके सत्कारोंसे उसे आवर्जित कर, उदयन मंत्रीको यहाँ बुलाया । धर्मबन्धु कह कर वह उसे अपने भवनमें ले गया और बडे भाईकी तरह भक्तिपूर्वक उसे भोजन कराया । फिर चागदेव नामक उस लडकेको उसकी गोदमें रख कर पञ्चाङ्ग पुरस्कारके साथ तीन दुकूल (बहुमूल्य वस्त्र) और तीन लाख रोकड द्रव्य भक्तिके साथ भेंट किया। उस (उदयन) से चाचिग ने कहा-'एक क्षत्रियके मूल्यमें १ हजार अस्सी, घोड़ेके मूल्यमें १७५०, और अत्यन्त मामूली भी बनियेके मूल्यमें ९९ हाथी, अर्थात् ९९ लाख होते हैं। तुम तो तीन लाख दे कर उदारताके बहाने कृपणता बता रहे हो। पर मेरा पुत्र तो अमूल्य है और उस पर तुम्हारी भक्ति अमूल्यतम है । सो इसके मूल्यमें यह भक्ति ही मुझे बस है । द्रव्यसंचय मेरे लिये शिवनिर्माल्यकी भाँति अस्पृश्य है।' चाचिग के इस प्रकार कहने पर अत्यन्त आनन्दित चित्तसे उत्कंठित हो कर उस मंत्रीने आलिंगन करके उसे धन्यवाद दिया, और फिर बोला कि -' अपने पुत्रको मुझे समर्पित करनेसे तो, यह बालक मदारीके बानरकी नाईं सब लोगोंको नमस्कार करता रहेगा और केवल अपमानका पात्र बनेगा । परंतु, गुरु महाराजको दे देने पर बालचंद्रमाकी भाँति त्रिलोकके नमस्कार योग्य होगा। अतः यथा-उचित विचार करके कहो।' ऐसा आदेश पा कर उसने कहा कि- 'आपका जो विचार हो वही मुझे मान्य है।' ऐसा कहने पर उसको वह मंत्री गुरुके पास ले गया और उसने पुत्रको गुरुको समर्पित कर दिया। फिर तो चाचिग ने स्वयं उसके प्रव्रजित होनेका उत्सव किया । बादमें [ वह बालक ] अप्रतिम प्रतिभायुक्त होनेके कारण, अगस्त्यकी नाईं समस्त भाष्य रूप समुद्रको चुलुकमें रख कर पी गया । समस्त विद्यास्थानोंका अभ्यास कर गुरुके दिये हुए 'हेमचंद्र' नामसे प्रसिद्ध हुआ । सकल सिद्धान्त और उपनिषद्का पारगामी और छत्तीस ही सूरिगुणोंसे अलंकृत समझ कर गुरुने उसे सूरि पद 'पर अभिषिक्त किया ।' इस प्रकार उदयन मंत्री की कही हुई हेमाचार्य के जन्मादिकी यह प्रवृत्ति सुन कर राजा बड़ा प्रसन्न हुआ । कुमारपालका सोमेश्वरके उद्धारकी समाप्तिके निमित्त नियम लेना । १४२) फिर श्री सोमनाथ देवके प्रासादके आरंभके लिये जब दृढ शिलाका आरोपण हो गया तो राजाने श्री हेमचंद्र गुरुको पंचकुलकी भेजी हुई वर्द्धापना (बधाई) की विज्ञप्ति दिखाते हुए कहा कि -'यह प्रासादारंभ किस प्रकार निर्विघ्नरूपसे समाप्त हो [ सो उपाय बताइए ]' । राजाके कहने पर श्री गुरुने कुछ विचार कर कहा कि- 'इस धर्मकार्यमें कोई विघ्न न उत्पन्न हो उसके लिये दो-मेंसे एक काम करना होगा -
१०२ ] प्रवन्धचिन्तामणि [ चतुर्थ प्रकाश या तो ध्वजारोप हो तब तक शुद्ध भावसे ब्रह्मचर्य पालन करना या मद्य-मांसका नियम लेना (त्याग करना)' ऐसा कहने पर, उनकी बात सुन कर मद्य-मांसके नियमकी अभिलाषा करते हुए, उसने शिवके ऊपर जल छोड़ कर उक्त शपथको ग्रहण किया। दो वर्षके बाद, जब कि, उस मंदिरमें कलश और ध्वजका आरोपण कार्य पूरा हुआ, उसने नियमसे मुक्त होनेकी अनुज्ञा पानेके लिये गुरुसे कहा। उन्होंने कहा 'कि--' अपने इस समुद्भूत कीर्तन (मन्दिर) के साथ यदि चंद्रचूड़ (शिव) के दर्शन करनेकी इच्छा हो तो यात्रा करनेके बाद ही नियम छोड़ना उचित होगा।' ऐसा कह कर मुनिवर हेमचंद्र वहांसे चले गये। उनके गुणोंसे नीलीके रंगकी भाँति दृढरूपसे हृदयमें अनुरक्त हो कर वह राजा सभामें केवल उन्हींकी प्रशंसा करने लगा। * हेमचन्द्राचार्यका सोमेश्वरकी यात्रा निमित्त कुमारपालके साथ जाना ! तब, निष्कारण वैरी ऐसा कोई परिजन उनके तेजःपुञ्जको न सहकर, इस मसलेके अनुसार कि- , १८४. उज्ज्वल गुणवालेको अभ्युदित होता देख कर क्षुद्र मनुष्य किसी तरह उसे नहीं सहन कर सकता। जैसे पतिंगा अपने शरीरको जला कर भी दीप्त दीपशिखाको बुझा देना चाहता है। पीठका मांस भक्षण करनेके दोषको अंगीकार करके (पीठ पीछे चुगली खा करके) भी उनका अपवाद करने लगा कि-'यह बड़ा चालाक, हा जी हा करने वाला और सेवाधर्म कुशल है, जो केवल महाराजकी मर्जीकी ही बात कहता रहता, है। यदि ऐसा नहीं है, तो प्रातःकाल आप सोमेश्वरकी यात्रामें साथ चलनेको उससे कहें। आपके ऐसा कहने पर वह परधर्मके तीर्थका परिहार करके किसी कारण यहाँ नहीं आवेगा। और हम लोगोंका मत ही प्रमाणभूत मालूम देगा।' राजाने उसकी बातका स्वीकार करके प्रातःकाल जब, श्री हेम चंद्राचार्य आये तो, सोमेश्वर की यात्रामें साथ चलनेके लिये उनसे अभ्यर्थना की। इस पर श्री सूरि बोले कि 'बुभुक्षित (भूखे) के लिये निमंत्रणकी क्या [जरूरत हे] और उत्कंठितके लिये केकारवके श्रवणके फहनेकी क्या आवश्यकता है-इस कहावतके अनुसार उन तपस्वियोंके लिये, जिनका तीर्थयात्रा करना तो एक अधिकारसा धर्म है, उन्हें राजाके आग्रहका क्या प्रयोजन ?' इस तरह जब गुरुने अंगीकार किया, तो राजाने कहा कि- 'आपके लिये पालकी आदि क्या सवारी दी जाय?' गुरुने कहा कि-'हम लोग पायौँसे चल कर ही पुण्य प्राप्त करते हैं। किन्तु हम थोड़े थोड़े चल कर श्री शत्रुंजय, उज्ज्रयत (गिरनार) आदि तीर्थोंको नमस्कार करते हुए आपसे [सोमनाथ] पत्तन में प्रवेश करनेके समय आ मिलेंगे।' ऐसा कह कर उन्होंने वैसा ही किया। राजा अपनी सारी राज्यऋद्धिके साथ प्रस्थान कर कुछ पड़ावोंके बाद पत्तन को पहुँचा। वहाँ श्री हेमचन्द्र मुनीन्द्र भी आ मिले जिससे वह अत्यन्त प्रसन्न हुआ। गण्ड० श्री बृहस्पति ने सम्मुख आ कर अगवानी की और महोत्सवके साथ उनको नगरमें प्रवेश कराया। श्री सोमनाथ के प्रासादकी सीढ़ियों पर चढ़ कर, जमीन पर लेट कर उसे प्रणाम करनेके बाद, चिरकालसे दर्शनकी उत्कट आकांक्षाके कारण सोमेश्वर के लिंगका गाढ़ आलिंगन किया। * हेमाचार्यका शिवकी पूजा-स्तुति करना। जैनधर्मसे द्वेष रखने वालोंके मुँहसे यह कथन सुन कर कि 'ये जिन देवके अतिरिक्त अन्य देवताओंको नमस्कार नहीं करते' शान्त चित्त वाले राजाने हेमचन्द्रसे यह बात कही कि-'यदि योग्य मालूम दे तो इन मनोहर उपहारोंसे आप श्री सोमेश्वर देवकी पूजा करें।' 'अच्छी बात है' ऐसा कह करके उन्होंने शीघ्र ही राजाके कोशसे आये कमनीय अलंकारोंसे अलंकृत होकर, राजाकी आज्ञासे श्री बृहस्पति द्वारा हाथका सहारा
प्रकरण १४२ ] कुमारपालादि प्रबन्ध [ १०३ पा कर [मूल] प्रासादकी चौकट पर चढ़ गये। मनमें कुछ सोच कर प्रकाशमें बोले कि-'इस प्रासादमें साक्षात् कैलासवासी महादेव रहते हैं, इस लिये रोमाञ्चकण्टकित शरीरको धारण करते हुए, उपहारको दूना कर दिया जाय !' ऐसा आदेश करके शिवपुराणमें कहे हुए दीक्षा-विधिके अनुसार आह्वान-अङ्गुष्ठम-मुद्रा-मन्त्रन्यास- विसर्जन आदि स्वरूप, पञ्चोपचार विधिसे शिवकी पूजा की। अन्तमें इस प्रकार स्तुति की- १८७. जिस किसी धर्ममतमें, जिस किसी नामसे, तुम जो कोई भी हो, लेकिन दोष और कलुषतासे रहित ऐसे तुम एक ही भगवान् हो और इस लिये हे भगवन् ! तुम्हें नमस्कार है। १८८. पुनर्जन्मके अङ्कुरको पैदा करनेवाले राग आदि जिसके नष्ट हो गये हैं वह ब्रह्मा हो, विष्णु हो या शिव हो-उसे हमारा नमस्कार है। इत्यादि स्तुतियाँ करते हुए, सब राजपुरुषोंके साथ विस्मययुक्त हो कर राजाके देखते रहने पर, हेमाचार्य •दण्डवत् प्रणाम करके स्थित हुए। फिर बृहस्पति की बतलाई हुई पूजाविधिके अनुसार सामिलाप भारसे राजाने शिवका पूजन किया। इसके अनन्तर धर्मशिलामें बैठ कर तुलापुरुषदान, गजदान आदि महादान दे करके कर्पूरकी आरती उतारी। कुमारपालकी तत्त्वजिज्ञासा और हेमाचार्यका शिवको प्रत्यक्ष करना। फिर सभी राजपुरुषोंको हटा कर, शिवके गर्भगृहके अन्दर प्रवेश करके राजा बोला कि-'न महादेवके समान देव है, न मेरे समान राजा है और न आपके समान महर्षि। भाग्यवश इन तीनोंका सहज संयोग हुआ है। इस लिये, नाना दर्शनोंके भिन्न भिन्न प्रमाणोंके कारण जिस देवतत्त्वके बारेमें चित्त संदिग्ध हो रहा है, उस मुक्तिदायक सच्चे देवका वास्तविक स्वरूप, इस तीर्थभूमिमें आप सत्य सत्य रूपसे मुझे बताइये।' यह सुन कर श्री हेमचन्द्रने बुद्धिसे कुछ सोच कर राजासे कहा- 'इन दर्शनोंके पुराने कथनोंको छोड़ दीजिए। मैं श्री सोमेश्वर देवको ही आपके प्रत्यक्ष कर देता हूँ। उन्हींके मुखसे मुक्तिमार्ग क्या है सो जान लीजिये।' यह वाक्य सुन कर बोला- 'क्या यह भी संभव है?' इस तरह राजाके विस्मित होने पर [सूरिने कहा]- 'निश्चय ही यहाँ पर तिरोहित मानसे दैवत वर्तमान है। और हम दोनों गुरुके कथनके अनुसार इनके निश्छल आराधक हैं। तो फिर इस प्रकार, इस द्वन्द्वके सिद्ध होनेके कारण देवताका प्रादुर्भाव होना सरल है। मैं प्रणिधान (ध्यान) करता हूँ और आप कृष्ण अगुरुका उत्क्षेप (धूप) करें। और वह उत्क्षेप तब बन्द करियेगा, जब प्रत्यक्ष शिव आ कर निषेध करें।' इसके बाद दोनोंके इस प्रकार करने पर जब गर्भगृह धूपसे भर कर अन्धकारमय हो गया और नक्षत्रमालाके समान उज्ज्वल प्रदीप्त दीपक जब बुझ गये, तो फिर अकस्मात्, जैसे मानों बारहों सूर्यका तेज फैल रहा हो ऐसा प्रकाश दिखाई देने लगा। उसे देख कर सभ्रमवश राजा अपनी आँखें मलता हुआ देखने लगा तो, जलाधारके ऊपर श्रेष्ठ जाम्बूनद (सुवर्ण) के समान द्युतिवाले, चक्षुसे दुरालोक्य, अपरूप असम्भव स्वरूपवाले एक तपस्वी दिखाई दिये। उसको पैरके अँगूठेसे ले कर जटा-जूट तक स्पर्श करके देवताका अवतार निश्चित किया और पञ्चाङ्गसे पृथ्वीतल पर लुंठित हो कर प्रणाम करके भक्तिसे राजाने विज्ञप्ति की कि- 'जगदीश ! आपका दर्शन करके आँखें कृतार्थ हुईं, अब आदेशका प्रसाद कर कर्णयुगलको कृतार्थ करो।' ऐसा कह कर राजाके चुप हो जाने पर, मोहरात्रिके लिये सूर्य स्वरूप उनके मुखसे, यह दिव्य वाणी प्रकट हुई- 'राजन् ! यह महर्षि सब देवताके अवतार हैं। पूर्ण परब्रह्मके अवलोकनसे, करतलमें रहे हुए मुक्ताफलकी तरह इन्हें त्रिकालका स्वरूप विज्ञात है। इस लिये इनका बताया हुआ मुक्तिमार्ग ही असंदिग्ध मुक्तिमार्ग है।' ऐसा कह कर शिव जब अन्तर्धान हो गये तो, प्राणायाम पवनका रेचन कर और आसन बन्धको शिथिल करके ज्यों ही श्री हेमचन्द्रने 'राजन् !' यह शब्द कहा, तो तत्काल इष्ट
१०६ ] प्रबन्धचिन्तामणि [ चतुर्थ मंत्री आम्रभटका शकुनिका विहारका उद्धार करवाना । १४६) इसके बाद, समस्त विश्वके एक अद्वितीय ऐसे सुभट आम्रभटने पिताके कल्याणार्थ भृगुपुर (भरूच) में शकुनिका विहार प्रासादके उद्धारका कार्य प्रारंभ किया । उसके लिये गहरी नींव खोदते समय, नर्मदा नदीके निकट होनेके कारण अकस्मात् वह नींव धस पड़ी और काम करने वाले मजदूर उसमें दब गये । उसने यह देख, कृपा-परवश हो कर, अपनी अत्यन्त निन्दा करते हुए, उसीमें अपने आपको भी गिरा दिया । इस अनुपम साहसके प्रभावसे वह विघ्न शान्त हो गया ( सब लोग बच गये ) । इसके बाद, शिलान्यासपूर्वक सारा प्रासाद तीन वर्षमें पूरा हुआ । कलश-दण्डकी प्रतिष्ठाका अवसर आने पर समस्त नगरोंके संघोंको निमत्रण दे कर बुलाया गया और उन सबको यथोचित वस्त्र और आभरण आदि दे कर सत्कृत किया गया और फिर सबको यथास्थान वापस पहुँचाया गया । लग्न समयके निकट आने पर भट्टारक श्री हेम- चन्द्रसूरिके नेतृत्वमें राजाके साथ अणहिल्लपुरके संघको निमंत्रित कर उसे अतुलित वात्सल्यादि तथा भूषण आदि दानों द्वारा सन्तुष्ट करके, ध्वजाधिरोपणके लिये घरसे चला । इस समय अपने सारे घरको मानों याचक- जनोंसे लुटवा दिया । श्री सुव्रतदेवके प्रासादमें महाध्वजके साथ ध्वजारोपण करके, अत्यधिक हर्षके कारण, वह अनालस्य भावसे नाच करता रहा । अन्तमें राजाकी अभ्यर्थना पर, उसने आरती उतारी । अपना घोड़ा द्वारपालको दान कर दिया । राजाने स्वयं उसको तिलक किया । बहत्तर सामन्त चामर और पुष्प वर्षा आदिसे उत्साह बढ़ा रहे थे । उस समय आये हुए बंदीको अपना कंकण दे दिया । अन्तमें राजाने हाथ पकड़ कर जबर्दस्ती उसे बैठाया और आरती और मंगल प्रदीप उतरवाये । श्री सुव्रतदेवके तथा गुरूके चरणमें प्रणाम करके, बन्धुओंको वन्दना आदि करके, राजासे शीघ्र आरती उतरवानेका कारण पूछा। राजाने कहा-‘कि जैसे जुआडी अत्यधिक द्यूत-रसके आवेशमें अपने सिरको भी दाँव पर रख देता है, वैसे ही तुम भी इसके बाद कहीं अर्थियोंके माँगनेसे त्यागके आवेशमें आ कर अपना सिर भी उन्हें न दे डालो’। राजाके इस प्रकार कह चुकने पर, उसके लोकोत्तर चरित्रसे हत-हृदय हो कर श्रीहेमाचार्यने भी, जिन्होंने जन्मकालसे ही किसी मनुष्यकी स्तुति नहीं की थी, कहा- १९२. उस कृतयुगसे [हमें] क्या [मतलब] है जिसमें तुम नहीं थे। और जिसमें तुम [विद्यमान] हो वह कलि कैसा। और यदि कलिहीमें तुम्हारा जन्म होता है तो वह कलि ही सदा रहो- वृतसे क्या मतलब है। इस प्रकार आम्रभटकी अनुमोदना करके दोनों क्षमापति, जैसे आये थे वैसे ही वापस गये । * आम्रभटका शाकिनीग्रस्त होना । १४७) इसके बाद, जब हेमचन्द्र अपने स्थान पर पहुँचे तो उन्हें यह विज्ञप्ति मिली कि आकस्मिक रीतिसे देवी (शाकिनी) के दोषसे ग्रस्त हो कर आम्रभटकी अन्तिम दशा उपस्थित हो गई है और आपको शीघ्र बुलाया गया है । उन्होंने तत्काल ही समझ लिया कि ‘यह महामना जब प्रासादके शिखर पर नृत्य कर रहा था उसी समय मिथ्यादृष्टि देवियोंका कुछ दोष उसे हुआ है ।' यह सोच कर, साथफाठ ही को संबोधन यशश्चन्द्रको साथ ले, आकाशगामिनी शक्तिमे उड़ कर निमेषमात्रमें, भृगुपुरकी प्राप्तभूमिको अलंकृत किया और सैन्धयादेवीका अनुनय करनेके लिये कायोत्सर्ग किया। उस देवीने जीभ निकाल कर उनका अपमान किया। तब उत्कटमें शाडि-चावल डाल कर यशश्चन्द्र गणिने मूसलसे प्रहार करना शुरू किया । पहली बारके प्रहारमें प्रासाद काँपने लगा, दूसरी बार प्रहार देने पर वह देवी ही अपने स्थानसे उखड़ कर - ‘इन बाल-
प्रकरण १४३-१४५ ] कुमारपालादि प्रबन्ध [ १०५ और इस प्रकार उस काष्ठमय देवप्रासादका कभी विध्वंस होना सोच कर उसने उस मंदिरका जीर्णोद्धार करवाना चाहा । इस इच्छासे देवके सामने ही एकभक्त (एकाशन करने) आदिके नियम ग्रहण किये । फिर वहाँसे प्रयाण करके अपने पड़ाव पर आया । उस प्रत्यर्थी (शत्रु) के साथ युद्ध शुरू होने पर शत्रुद्वारा राजाकी सेनाका पराजित होना देख कर उदयन स्वयं युद्धके लिये उठा । वह प्रहारोंसे जर्जरशरीर हो गया तो फिर निवासमें ले आया गया । [जीवनान्त समीप जान कर यह] सकरुण स्वरसे रोने लगा । स्वजनोंने इसका कारण पूछा, तो उसने कहा कि, मृत्यु निकट आ गया है और शत्रुञ्जय और शकुनिका विहारके जीर्णो- द्वारकी इच्छाका देयऋण पीठ पर लगा रह गया । इस पर उन्होंने कहा - 'आपके वाग्भट और आम्रभट नामक दोनों पुत्र अभिग्रह ले कर तीर्थोद्धार करेंगे । हम लोग इसके लिये प्रतिभू (जामीन) बनते हैं।' उनके इस प्रकार अंगीकार करनेसे अपनेको धन्य समझता हुआ वह मंत्री अन्त्याराधनाके लिये किसी चारित्रि- धारीको खोजने लगा । वहाँ पर कोई चारित्री न मिलनेसे किसी एक नौकरको साधुवेषमें ले आ कर उसको निवेदित करने पर, मंत्री उसके चरणोंको ललाटसे स्पर्श करता हुआ, उसीके सामने दस प्रकारकी आराधना करके वह श्रीमान् उदयन परलोक प्राप्त हुआ । पीछेसे, चंदन वृक्षके परिमलसे वासित क्षुद्र वृक्षकी नाई उस वंठ (नौकर) ने अनशन व्रत ले कर रैवतक पर्वत पर अपने जीवनका अन्त कर दिया । मंत्री बाहडका शत्रुञ्जयतीर्थोद्धार कराना । १४५) तत्पश्चात्, अनहिल्लपुर पहुँच कर उन स्वजनोंने यह बात वाग्भट और आम्रभट को सुनाई । उन्होंने वैसा ही नियम ग्रहण करके जीर्णोद्धारका कार्य आरंभ किया । दो वर्षमें श्री शत्रुञ्जय का वह प्रासाद बन कर तैयार हुआ और उसकी खबर देनेके लिये आये हुए मनुष्यके बधाई देने बाद ही दूसरा मनुष्य आया जिसने कहा कि 'प्रासाद तो फट गया है !' तपे हुए सीसेके जैसी उसकी वाणीको कानोंमें सुन कर श्री कुमार पाल भूपालसे आज्ञा ले कर मंत्री स्वयं वहां जानेको उद्यत हुआ । श्रीकरणकी जो अपनी मुद्रा (मंत्रीके पदकी मुहर) थी वह महं कपर्दीको समर्पित की और स्वयं ४ सहस्र घोड़े ले कर शत्रुंजयकी उप- त्यकामें पहुँचा । वहाँ अपने नामसे बाहडपुर नामका नया नगर बसाया । शिल्पियोंने प्रासादके फट जानेका ' कारण बताते हुए कहा कि सभ्रम प्रासादमें पवन घुस कर निकलता नहीं, इस लिये मन्दिर फट जाता है; और जो प्रासाद भ्रमहीन बनाया जाय तो बनाने वाला निर्वंश हो जाता है [ऐसा शास्त्रका विधान है ] । मंत्रीने यह सुन कर ऐसा विचार किया कि निर्वंश होना अच्छा है। इससे धर्म कार्य ही हमारा वंश होगा और पूर्व कालमें जीर्णोद्धार कराने वाले भरत आदिकी पंक्तिमें हमारा भी नाम उल्लिखित होगा । इस प्रकार अपनी दीर्घदर्शिनी बुद्धिसे सोच कर उस मंत्रीने भ्रम और दीवालके बीचमें पत्थर भरवा दिये और प्रासादको निर्भ्रम बनवाया । तीन वर्षमें प्रासाद पूरा हुआ । उसके कलश दण्ड आदिकी प्रतिष्ठाके समय पत्तन के संघको निमंत्रित किया और महामहोत्सवके साथ सं० १२११ में मंत्रीने ध्वजारोपण कराया । पाषाणमय बिंब (मूर्ति) का परिकर मम्भाणी की खानमेंके कीमती पत्थरका बनवा कर स्थापित किया । श्री बाहडपुर में राजाके पिताके नामसे श्री त्रिभुवनपाल विहार बनवा कर उसमें पार्श्वनाथकी स्थापना कराई । तीर्थपूजाके लिये नगरके चारों ओर २४ बगीचे बनवाये, नगरका पक्का कोट बनवाया और देवके पूजारियोंके ग्रास और वास आदिकी व्यवस्था कर, वह सब कार्य पूरा किया । इस तीर्थोद्धारके व्ययमें [ यह बात प्रसिद्ध है कि ] - १९१. जिसके, मंदिर बनानेमें १ करोड़ ६० लाख व्यय हुआ है, विद्वान् लोग उस श्री वाग्भटदेव की [पूरी] वर्णना कैसे करें । इस प्रकार शत्रुञ्जयके उद्धारका यह प्रबंध समाप्त हुआ । * २७-२८
१०४ ] प्रबन्धचिन्तामणि [ चतुर्थ प्रकाश देवताके संकेतसे राज्याभिमानको छोड़ कर उसने कहा-‘जीव ! पधारिये !’ इस प्रकार विनयसे सिर नवाता हुआ हाथ जोड़ कर बोला कि ‘जो आज्ञा हो सो कहिये ।’ इसके बाद वहीं पर उसे यावज्जीवन मद्य-मांसके त्यागका नियम दिया और वहाँसे लौट कर वे दोनों क्षमापति (मुनि तो क्षमा=क्षान्तिके पति, राजा क्षमा= पृथ्वीके पति) अणहिल्लपुर आये । * कुमारपालका परमार्हत श्रावक बनना । १४३) श्री जिनमुखसे निस्स्रुत पवित्र वचनोंके श्रवण द्वारा प्रतिबुद्ध हो कर राजाने ‘परमार्हत’ विरुदको धारण किया । उससे अभ्यर्थित हो कर प्रभु (हेमचन्द्र)ने ‘त्रिषष्टिशलाकापुरुषचरित’ तथा बीस ‘वीतराग-स्तुतियों’ से युक्त पवित्र ‘योगशास्त्र’ की रचना की । उनका आदेश पा कर अपने आज्ञानुवर्ती अठारह देशोंमें, चौदह वर्ष तक, सर्व प्रकारकी जीव-हत्याका निवारण किया । [१२३] सतत आकाशमें विचरण करने वाले सप्तर्षिगण एक मृगीको भी व्याधोंके पाशसे मुक्त नहीं कर सके । परन्तु प्रभु श्री हेमसूरि अकेलेने ही चिरकाल तक पृथ्वी पर जीववध होनेका निषेध कर दिया । [१२४] [आकाश स्थित] कलाकलाप पूर्ण ऐसे चन्द्रमासे [पृथ्वी स्थित] हेमचन्द्र सूरि अधिक उज्ज्वलकीर्ति हैं । क्यों कि, चन्द्रमाने तो केवल एक ही मृगका [अपनी गोदमें ले कर] रक्षण किया है जब हेमचन्द्रने तो सब ही मृगोंका (सारे पशुगणका) रक्षण किया है । राजाने उन उन देशोंमें १४४० नये विहार (जैन मन्दिर) बनवाये । सम्यक्त्व मूलक १२ व्रतोंको अंगीकार किया । अदत्तादान-विरमण-स्वरूप तीसरे व्रतकी व्याख्या सुन कर रुदती (रोती हुई विधवा नारियोंके) धनका ग्रहण पापोंका कारण है ऐसा समझ कर, उस कामके अधिकारी पञ्चकुलों (कर्मचारी गण) को बुला कर उसके आयपत्रको, जिसका [वार्षिक] प्रमाण ७२ लाख था, फाड़ कर, उस करको बन्द कर दिया । उस करको छोड़ देने पर विद्वानोंने इस प्रकार स्तुति की— १८९. जिस रुदतीवित्तको, कृतयुगमें पैदा होनेवाले रघु-नहुष-नाभाग-भरत आदि जैसे राजा लोग भी छोड़ नहीं सके, उसे करुणावश हो कर मुक्त करने वाले कुमारपाल ! तुम महापुरुषोंके मुकुट-मणि हो । प्रभु हेमसूरिने भी इस तरह राजाका अनुमोदन किया कि— १९०. अपुत्र पुरुषोंका धन ग्रहण करके [अन्य] राजा तो पुत्र होता है । किन्तु सन्तोषपूर्वक उसका त्याग करने वाले तुम तो सचमुच राज-पितामह हो । * मंत्री उदयनका सौराष्ट्रके युद्धमें मारा जाना । १४५) फिर, सुराष्ट्र देशके सउसर [रात्तुर] से युद्ध करनेके लिये उदयन मन्त्री को दलका नायक बना कर सारी सेनाके साथ भेजा गया । वह वर्द्धमानपुर (आधुनिक वढवाण) में पहुँच कर [नजदीकहीमें रहे हुए शत्रुञ्जय पहाड़ पर] श्री युगादिदेवको नमस्कार करनेकी इच्छासे, समस्त मण्डले- श्वरोंको आगे चलनेकी अभ्यर्थना कर, खुद विमलगिरि (शत्रुञ्जय) आया । विशुद्ध श्रद्धाके साथ देव- चरणोंकी पूजा करके ज्यों ही विधिपूर्वक चैत्यवन्दना करने लगा, त्यों ही एक मूषक (चूहा) नक्षत्रमालासी प्रदीप्त दीपमालामेंसे एक दीपवर्तिका (दियेकी जलती हुई बाट) को ले कर काठके बने उस प्रासादके किसी बिलमें प्रवेश करने लगा, तो देवके अंगरक्षकोंने उसे छुड़ाया । इसे देख कर उस मंत्रीका समाधिभंग हो गया
प्रकरण १४३-१४५] कुमारपालादि प्रबन्ध [१०५ और इस प्रकार उस काष्ठमय देवप्रासादका कभी विध्वंस होना सोच कर उसने उस मंदिरका जीर्णोद्धार करवाना चाहा। इस इच्छासे देवके सामने ही एकभक्त (एकाशन करने) आदिके नियम ग्रहण किये। फिर वहाँसे प्रयाण करके अपने पड़ाव पर आया। उस प्रत्यर्थी (शत्रु) के साथ युद्ध शुरू होने पर शत्रुद्वारा राजाकी सेनाका पराजित होना देख कर उदयन स्वयं युद्धके लिये उठा। वह प्रहारोंसे जर्जरशरीर हो गया तो फिर निवासमें ले आया गया। [जीवनान्त समीप जान कर वह] सकरुण स्वरसे रोने लगा। स्वजनोंने इसका कारण पूछा, तो उसने कहा कि, मृत्यु निकट आ गया है और शत्रुञ्जय और शकुनिका विहारके जीर्णो- द्धारकी इच्छाका देवऋण पीठ पर लगा रह गया। इस पर उन्होंने कहा - 'आपके वाग्भट और आभ्रभट नामक दोनों पुत्र अभिग्रह ले कर तीर्थोद्धार करेंगे। हम लोग इसके लिये प्रतिभू (जामीन) बनते हैं।' उनके इस प्रकार अंगीकार करनेसे अपनेको धन्य समझता हुआ वह मंत्री अन्त्याराधनाके लिये किसी चारित्र- धारीको खोजने लगा। वहाँ पर कोई चारित्री न मिलनेसे किसी एक नौकरको साधुवेषमें ले आ कर उसको निवेदित करने पर, मंत्री उसके चरणोंको ललाटसे स्पर्श करता हुआ, उसीके सामने दस प्रकारकी आराधना करके यह श्रीमान् उदयन परलोक प्राप्त हुआ। पीछेसे, चंदन वृक्षके परिमलसे वासित क्षुद्र वृक्षकी नाई उस वंठ (नौकर)ने अनशन व्रत ले कर रैवतक पर्वत पर अपने जीवनका अन्त कर दिया। मंत्री चाहडका शत्रुञ्जयतीर्थोद्धार कराना। १४५) तत्पश्चात्, अणहिल्लपुर पहुँच कर उन स्वजनोंने यह बात वाग्भट और आभ्रभट को सुनाई। उन्होंने वैसा ही नियम ग्रहण करके जीर्णोद्धारका कार्य आरंभ किया। दो वर्षमें श्री शत्रुंजय का वह प्रासाद बन कर तैयार हुआ और उसकी खबर देनेके लिये आये हुए मनुष्यके बधाई देने बाद ही दूसरा मनुष्य आया जिसने कहा कि 'प्रासाद तो फट गया है!' तपे हुए सीसेके जैसी उसकी वाणीको कानोंमें सुन कर श्री कुमार पाल भूपालसे आज्ञा ले कर मंत्री स्वयं वहां जानेको उद्यत हुआ। श्रीकरणकी जो अपनी मुद्रा (मंत्रीके पदकी मुहर) थी वह महं कपर्दी को समर्पित की और स्वयं ४ सहस्र घोड़े ले कर शत्रुंजय की उप- त्यकामें पहुँचा। वहाँ अपने नामसे बाहड़पुर नामका नया नगर बसाया। शिल्पियोंने प्रासादके फट जानेका कारण बताते हुए कहा कि सभ्रम प्रासादमें पवन घुस कर निकलता नहीं, इस लिये मन्दिर फट जाता है; और जो प्रासाद भ्रमहीन बनाया जाय तो बनाने वाला निर्वश हो जाता है [ऐसा शास्त्रका विधान है]। मंत्रीने यह सुन कर ऐसा विचार किया कि निर्वंश होना अच्छा है। इससे धर्म कार्य ही हमारा वंश होगा और पूर्व कालमें जीर्णोद्धार कराने वाले भरत आदिकी पंक्तिमें हमारा भी नाम उल्लिखित होगा। इस प्रकार अपनी दीर्घदर्शिनी बुद्धिसे सोच कर उस मंत्रीने भ्रम और दीवालके बीचमें पत्थर भरवा दिये और प्रासादको निर्भ्रम बनवाया। तीन वर्षमें प्रासाद पूरा हुआ। उसके कलश दण्ड आदिकी प्रतिष्ठाके समय पत्तन के संघको निमंत्रित किया और महामहोत्सवके साथ सं० १२११ में मंत्रीने ध्वजारोपण कराया। पाषाणमय बिंब (मूर्ति) का परिकर मग्माणी की खानमेंके किमती पत्थरका बनवा कर स्थापित किया। श्री वाहडपुर में राजाके पिताके नामसे श्री त्रिभुवनपाल विहार बनवा कर उसमें पार्श्वनाथकी स्थापना कराई। तीर्थपूजाके लिये नगरके चारों ओर २४ बागीचे बनवाये, नगरका पक्का कोट बनवाया और देवके पूजारियोंके मास और घास आदिकी व्यवस्था कर, वह सब कार्य पूरा किया। इस तीर्थोद्धारके व्ययमें [यह बात प्रसिद्ध है कि] - १९१. जिसके, मंदिर बनानेमें १ करोड़ ६० लाख व्यय हुआ है, विद्वान् लोग उस श्री वाग्भटदेव की [पूरी] वर्णना कैसे करें ! इस प्रकार शत्रुञ्जयके उद्धारका यह प्रबंध समाप्त हुआ। * २७-२८
१०६ ] प्रबंधचिन्तामणि [ चतुर्थ प्रकाश मंत्री आम्रभटका शकुनिका विहारका उद्धार करवाना । १४६) इसके बाद, समस्त विश्वके एक अद्वितीय ऐसे सुभट आम्रभटने पिताके कल्याणार्थ भृगुपुर ( भरूच ) में शकुनिका विहार प्रासादके उद्धारका कार्य प्रारंभ किया । उसके लिये गहरी नींव खोदते समय, नर्मदा नदीके निकट होनेके कारण अकस्मात् वह नींव धस पड़ी और काम करने वाले मजदूर उसमें दब गये । उसने यह देख, कृपा-परवश हो कर, अपनी अत्यन्त निन्दा करते हुए, उसीमें अपने आपको भी गिरा दिया । इस अनुपम साहसके प्रभावसे वह विघ्न शान्त हो गया ( सब लोग बच गये ) । इसके बाद, शिलान्यासपूर्वक सारा प्रासाद तीन वर्षमें पूरा हुआ । कलश-दण्डकी प्रतिष्ठाका अवसर आने पर समस्त नगरोंके संघोंको निमन्त्रण दे कर बुलाया गया और उन सबको यथोचित वस्त्र और आभरण आदि दे कर सत्कृत किया गया और फिर सबको यथास्थान वापस पहुँचाया गया । लग्न समयके निकट आने पर भट्टारक श्री हेम- चन्द्रसूरिके नेतृत्वमें राजाके साथ अणहिल्लपुरके संघको निमंत्रित कर उसे अतुलित वस्त्रस्रगादि तथा भूषण आदि दानों द्वारा सन्तुष्ट करके, ध्वजारोहणके लिये घरसे चला । इस समय अपने सारे घरको मानों याचक- जनोंसे लुटना दिया । श्री सुव्रतदेवके प्रासादमे महाध्वजके साथ ध्वजारोपण करके, अत्यधिक हर्षके कारण, यह अनालस्य भावसे नाच करता रहा । अन्तमें राजाकी अभ्यर्थना पर, उसने आरती उतारी । अपना घोड़ा द्वारपालको दान कर दिया । राजाने स्वयं उसको तिलक किया । बहत्तर सामन्त चामर और पुष्प वर्षा आदिसे उत्साह बढ़ा रहे थे । उस समय आये हुए बंदीको अपना कंकण दे दिया । अन्तमें राजाने हाथ पकड़ कर जबर्दस्ती उसे बैठाया और आरती और मंगल प्रदीप उतरवाये । श्री सुव्रतदेवके तथा गुरुके चरणमें प्रणाम करके, बन्धुओंको वन्दना आदि करके, राजासे शीघ्र आरती उतरवानेका कारण पूछा। राजाने कहा - 'कि जैसे जुआडी अत्यधिक द्यूत-रसके आवेशमें अपने सिरको भी दाँव पर रख देता है, वैसे ही तुम भी इसके बाद कहीं अर्थियोंके माँगनेसे त्यागके आवेशमें आ कर अपना सिर भी उन्हें न दे डालो' । राजाके इस प्रकार कह चुकने पर, उसके लोकोत्तर चरित्रसे हृत-हृदय हो कर श्रीहेमाचार्यने भी, जिन्होंने जन्मकालसे ही किसी मनुष्यकी स्तुति नही की थी, कहा - १९२. उस कृतयुगसे [ हमें ] क्या [ मतलब ] है जिसमें तुम नहीं थे । और जिसमें तुम [ विद्यमान ] हो वह कलि कैसा । और यदि कलिहीमें तुम्हारा जन्म होता है तो वह कलि ही सदा रहो - कृतसे क्या मतलब है । इस प्रकार आम्रभटकी अनुमोदना करके दोनों क्षमापति, जैसे आये थे वैसे ही वापस गये । * आम्रभटका शाकिनीग्रस्त होना । १४७) इसके बाद, जब हेमचंद्र अपने स्थान पर पहुँचे तो उन्हें यह विज्ञप्ति मिली कि आकस्मिक रीतिसे देवी ( शाकिनी ) के दोषसे ग्रस्त हो कर आम्रभटकी अन्तिम दशा उपस्थित हो गई है और आपको शीघ्र बुलाया गया है । उन्होंने तत्काल ही समझ लिया कि 'यह महामना जब प्रासादके शिखर पर नृत्य कर रहा था उसी समय मिथ्यादृष्टि देवियोग कुछ दोष उसे हुआ है।' यह सोच कर, सायंकाल ही को तपोधन यशश्चन्द्रको साथ ले, आकाशगामिनी शक्तिसे उड़ कर निमेषमात्रमें, भृगुपुरकी प्रान्तभूमिको अलंकृत किया और सैन्धवा देवीका अनुनय करनेके लिये कायोत्सर्ग किया । उस देवीने जीभ निकाल कर उनका अपमान किया । तब उत्तरमें शाण्डि-धारक डाउ कर यशश्चन्द्र गणिने मुखाग्रसे प्रहार करना शुरू किया । पहली बारके प्रहारमें प्रासाद काँपने लगा, दूसरी बार प्रहार देने पर वह देवी ही अपने स्थानसे उखड़ कर - 'इम यश-
प्रकरण १४६-१४९ ] कुमारपालादि प्रबन्ध [ १०७ पाणिके वज्रप्रहारसे बचाओ - बचाओ' कहती हुई प्रभुके चरणों पर आ कर गिर गई। इस तरह अपनी अनिन्द्य विद्याके बल पर उस दोषके मूलभूत मिथ्यादृष्टिवाले व्यन्तरों (भूत पिशाचों) का निग्रह करके श्री सुव्रतदेवके प्रासादमें आये। वहाँ पर - १९३. संसाररूप समुद्रके लिये सेतु, कल्याण-पथकी यात्राके लिये दीप-शिखा, विश्वके आधारके लिये आलंबन यष्टि, परमतके व्यामोहके लिये केतुका उदय, अथवा हमारे मनरूपी हाथियोंके बन्धनके लिये दृढ़ आलान रूप डीलाको धारण करने वाले ऐसे श्री सुव्रतस्वामीके चरणोंकी नख-रश्मियाँ [सबकी] रक्षा करें। इस प्रकारकी स्तुतियोंसे श्री मुनिसुव्रतकी उपासना करके, श्री आम्रभटको उद्वाघ स्नानसे सुस्थ करके, जैसे गये थे वैसे ही [ अपने स्थान पर ] लौट आये। श्री उदयन चैत्य शकुनिका विहारके घटी गृहमें राजाने कोङ्कण नृपतिके [ छीने हुए ] तीन कलश तीन जगह स्थापित किये। इस प्रकार यह राज-पितामह श्री आम्रभटका प्रबंध समाप्त हुआ। * कुमारपालका विद्याध्ययन करना। १४८) इसके बाद, एक दूसरी बार, कपर्दी मंत्री का अनुमत कोई विद्वान्, राजा कुमारपाल के भोजन कर लेनेके बाद कामन्दकीय नीतिशास्त्र के इस श्लोकको पढ़ रहा था - १९४. राजा मेघकी नाईं समस्त भूत-मात्रका आगार है। मेघके विफल होने पर भी जीवन धारण किया जा सकता है पर राजाके विफल होने पर नहीं। तब, इस वाक्यको सुन कर राजाने कहा कि-' अहो राजाको मेघकी ' ऊपम्या !' इस पर सभी सामाजिक लोग राजाका न्युञ्छन करने लगे। पर उस समय कपर्दी मंत्रीने अपना सिर नीचा कर लिया। यह देख कर राजाने एकान्तमें उससे [कारण] पूछा। उसने कहा - 'महाराजने जो ' ऊपम्या' शब्दका उच्चारण किया वह सर्व व्याकरणोंकी दृष्टिसे अपशब्द (अशुद्ध) है; और इस पर भी इन खुशामती अनुवर्त्तियोंने न्युंञ्छन किया। उनके ऐसा करने पर मेरा तो दोनों प्रकार सिर नीचा करना ही समुचित है। शत्रु राजाओंमें इस प्रकारकी अपकीर्ति फैलती है कि 'अराजक जगत्का होना अच्छा है किन्तु मूर्ख राजाका होना अच्छा नहीं।' जिस अर्थमें आपने यह शब्द कहा है उस अर्थमें उपमान, उपमेय, औपम्य, उपमा इत्यादि शब्द कहे जाते हैं। उसकी इस बातको [आदरके साथ] हृदयमें ग्रहण करके, अनन्तर, ५० वर्षकी उम्रमें, उस राजाने शब्द व्युत्पत्तिका ज्ञान करनेके लिये किसी उपाध्यायके निकट मातृका- पाठसे आरंभ कर (अआसे लेकर) शास्त्र पढ़ना आरंभ किया और एक वर्षके भीतर [व्याकरणकी] तीनों वृत्ति और तीनों काव्य पढ़ डाले। और फिर पण्डितोंसे 'विचार-चतुर्मुख' यह विरुद प्राप्त किया। इस प्रकार विचारचतुर्मुख कुमारपालके अध्ययनका प्रबंध समाप्त हुआ। * बनारसके विश्वेश्वर कविका पत्तनमें आना। १४९) किसी अवसर पर, विश्वेश्वर नामक कवि वाराणसी से पत्तन में आकर प्रभु श्री हेम सूरिकी सभा में पहुँचा। वहाँ कुमारपाल राजाको विद्यमान देख कर उसने-
३०८ ] प्रबन्धचिन्तामणि [ चतुर्थ प्रकाश १९५. कंबल और दंड वाला यह हेम तुम्हारी रक्षा करे । इस प्रकार कह कर वह ठहर गया। राजाने उसे क्रोधकी दृष्टिसे देखा । तब फिर- जो षड्दर्शन रूप पशुओंको जैन-गोचर ( चरागाह ) में चरा रहे हैं । यह उत्तरार्द्ध पढ़ा जिसे सुन कर सारी सभा प्रसन्न हुई । फिर कविने रामचन्द्रादि [ कवियों ] को समस्यायें पूर्ण करनेको दीं । 'व्यापिद्धा नयने०' इस चरणवाली एक समस्याकी पूर्ति महामात्य कपर्दीने इस प्रकार की १९६. 'इसकी ये सरळ ( बड़ी बड़ी ) आंखें दोनों हथेलियोंसे ढकीं नहीं जा सकतीं, और अपने मुखरूपी चन्द्रमाकी चांदनीके प्रकाशसे यह सब कहीं दिखाई दिया करती है- इस लिये आँख मिचौनीके खेलमें अपनी चारों ओर रही हुई सखियोंके बीचमें बैठी हुई यह बाला [ खेलनेसे ] रोक दी गई है और इस लिये वह अपने मुख और आँखोंको रो रही है।' { इस समस्यापूर्तिकी प्रतिभासे प्रसन्न हो कर ] उस कविने पचास हजारकी कीमतका अपने गलेका हार निकाल कर कपर्दीके कण्ठमें यह कहते हुए डाल दिया कि ' यह तो श्रीभारतीका पद ( स्थान ) है।' उसकी सहृदयतासे चमत्कृत हो कर राजा उसे अपने पास रखने लगा, तो वह यह कह कर, राजा द्वारा सत्कृत हो कर, यथास्थान चला गया कि- १९७. कर्णकी कथा तो अब शेष मात्र रह गई है। काशी नगरी मनुष्योंकी कमीके कारण क्षीणप्राय हो गई है। पूर्व ( या उत्तर ) दिशामें हम्मीर ( म्लेच्छ ) के घोड़े सहर्ष हिनहिना रहे हैं। इससे यह मेरा हृदय तो अब, सरस्वतीके आलिङ्गनमें प्रवृत्त क्षारसमुद्रके साथ स्नेहवाले प्रभासक्षेत्रके लिये उत्कण्ठित हो रहा है । * हेमचन्द्रसूरिका समस्या पूरण करना । १५०) किसी समय कुमारविहार देवमन्दिरमें राजा द्वारा आमंत्रित हो कर प्रभु श्रीहेमचन्द्र, कपर्दी मंत्री द्वारा हाथका सहारा पा कर, जब सोपान पर चढ़ रहे थे [ वहा पर नृत्योद्यत ] नर्तकीके कञ्चुककी कसनीको तनती हुई देख कर कपर्दीने यह कहा- १९८. हे सखि तेरा यह कञ्चुक सौभाग्यशाली है इस लिये इसका यह तनना युक्त ही है। यह कह कर उसे जब आगे बोलनेमें विलंब करते देखा तो प्रभुने उत्तरार्ध इस प्रकार कह दिया- जिसके गुणका ग्रहण पीठपीछे तरुणीजन करता है। * आचार्य और मंत्रीके बीचमें 'हरडइ'का वाग्विलास । १५१) एक बार, सबेरे कपर्दी मंत्रीने श्री सूरिको प्रणाम करनेके बाद [ उसके हाथमें कोई चीज देख कर ] उन्होंने पूछा-' यह क्या चीज है ?' उसने प्राकृत ( देशी) भाषामें कहा- 'हरडइ' - अर्थात् 'हर्रे' । प्रभुने कहा-' क्या अब भी ?'। तब वह अपनी अनाहत प्रतिभा (प्रखर बुद्धि) के कारण उनके व- चनच्छल (व्यंग्य) को समझ कर बोला- 'अब तो नहीं' । क्यों कि अन्तिम होने पर भी वह आदिम हो गया और एक मात्रा अधिक भी हो गया। हर्षाश्रु पूर्ण आँखोंसे प्रभुने रामचंद्र आदिके सामने उसकी चतुराईकी प्रशंसा की। उन्होंने (रामचंद्रादिने) तत्त्व न समझ कर पूछा कि 'बात क्या है?' प्रभुने कहा कि 'हरडइ' इसमें शब्दच्छलसे यह अर्थ लक्ष्य करके निकाला गया कि 'ह रडइ' अर्थात् हकार रोता ( गुजराती रडता )
है । हमने इस पर कहा कि 'क्या अब भी ?' यह कहते ही शब्दतत्त्वको जानने वाले इसने कहा कि 'अब तो नहीं।' क्यों कि पहले मातृका-शास्त्र (वर्णमाला) में हकार सबके अंतमें पढ़ा जाता था, अतएव यह रडता=रोता था; 'किन्तु अब तो मेरे नाम (हेमचंद्र) में यह पहले आ गया है और एक मात्रा अधिक भी हो गया है। इस प्रकार यह हरदइ प्रबंध समाप्त हुआ। * उर्वशी शब्दकी व्युत्पत्ति। १५२) एक बार, किसी पंडितने पूछा कि 'उर्वशी' शब्दका शकार तालव्य है या दन्त्य। इस पर प्रभु (हेमचंद्र) कुछ सोच कर कहने जा रहे थे कि कपर्दीने पत्र पर यह लिख कर उनके अंकमें फेंक दिया कि 'उरौ शेते उर्वशी' अर्थात् जो उरुमें शयन करे वह उर्वशी। इसीको प्रामाण्य समझ कर प्रभुने उस पंडितके आगे तालव्य शकार होनेका निर्णय कह सुनाया। इस प्रकार यह उर्वशी-शब्द-प्रबंध समाप्त हुआ। * सपादलक्षके राजाके नामका अर्थखण्डन। १५३) अन्य किसी समय, सपादलक्षके राजाका कोई सान्धिविग्रहिक कुमारपाल राजाकी सभामें आया। राजाने पूछा कि 'आपके स्वामी कुशल तो हैं?' अपनेको महापंडित समझने वाला वह मिथ्याभिमानी बोला- 'विश्वको जो ले ले वह 'विग्लछ' कहलाता है (-यह सपादलक्षके राजाका नाम था)। इस लिए उसकी विजयमें क्या सन्देह है?' राजाका इशारा पा कर श्रीमान् कपर्दी मंत्रीने कहा कि- 'श्ल-श्लछ धातु सो शीघ्र गत्यर्थक है। इसी श्लछ धातुसे यह शब्द बना है, अतः इसका अर्थ तो यह हुआ कि-वि अर्थात् पक्षीकी भाँति जो श्लठन करता है - भाग जाता है वह 'विग्लछ' है।' इसके बाद, उस प्रधानके द्वारा इस नाममें दोष समझ कर उस राजाने पंडितोंके पास निर्णय कराके 'विग्रहराज' ऐसा दूसरा नाम धारण किया। दूसरे वर्ष उसी प्रधानने कुमारपाल नृपतिके सामने 'विग्रहराज' यह नाम बताया। मंत्री कपर्दीने [ यह अर्थ किया]-विग्र=विगतनासिक-नासिकाहीन; ह-राज अर्थात् रुद्र और नारायण। रुद्र और नारायणको जिसने नासिका हीन किया है यह इस 'विग्रहराज' का अर्थ है। तदनन्तर कपर्दी के नामखण्डनके भयसे उस राजाने 'कवि-बान्धव' ऐसा नाम धारण किया। * १५४) एक दूसरी बार, कुमारपाल राजाके आगे योग शास्त्र का व्याख्यान हो रहा था उसमें जब पञ्चदश कर्मादानका पाठ पढा जाने लगा तब "दन्तकेशनखास्थित्वग्रोम्णां ग्रहणमाकरे" प्रभुके रचे हुए इस मूल पाठमें पडित उदयचन्द्र बार बार 'रोम्णा ग्रहणम् रोम्णा ग्रहणम्' यह पाठ बोलने लगा। तो प्रभुने पूछा कि - 'क्या लिपि-भेद (अशुद्ध पाठ) हो गया है?'। उसने कहा- 'प्राणितूर्याङ्गानाम्' इस व्याकरण सूत्रसे तो एकत्व सिद्ध होता है, [सो यहाँ पर वैसा होना चाहिए]' ऐसे लक्षणविशेषको बता कर, प्रभु द्वारा प्रशंसित हुआ और राजाने न्युंछन करके उसकी संभवाना की। इस प्रकार पं० उदयचंद्रका यह प्रबंध समाप्त हुआ। *
११२ ] प्रबन्धचिन्तामणि [ चतुर्थ प्रकाश सेवड़ ( श्वेताम्बर साधु ) आ रहा है। इस प्रकारका अत्यधिक निंदास्पद कथन सुन कर, अन्तःकुटिल पर बाहरसे सरल दिखाई देनेवाले तिरस्कार पूर्ण वचनसे प्रभुने कहा कि- 'अरे पंडित ! तुमने क्या यह भी नहीं पढ़ा कि विशेषणका प्रयोग पहले किया जाना चाहिए। अब से 'सेवड़-हेमड' ऐसा कहना ( हेमड-सेवड ) नहीं। सेवकों ने [ यह सुन कर ] उसे भालेकी नोकसे घोदा कर छोड़ दिया । राजा कुमार पालके राज्यमें शस्त्रवध नहीं किया जाता था, इस लिये उसकी वृत्तिका छेद कर दिया गया । इसके बाद, कण-कणकी भीख माँग कर अपना प्राण धारण करता हुआ वह प्रभुकी पौषधशालाके सामने आ कर बैठा । उस समय वहाँ पर अनादि भूपति नामक मठके तपस्वियों द्वारा अधीयमान योगशास्त्रका श्रवण करके, उसने फिर सच्चे हृदयसे यह काव्य कहा कि- २०९. जिन अकारण दारुण मनुष्योंके मुँहसे आतंकका कारण ऐसा गाली-रूपी गरल ( विष ) निकला है उन जटा धारण करने वाले फणाधरों ( सर्पों ) के मंडलका, यह योगशास्त्र का वचनामृत अब उद्धार कर रहा है। ऐसे अमृतके समान मीठे उसके वचनसे, प्रभुका वह उपताप शान्त हुआ और उसकी वृत्ति फिर दुगुनी कर उसे प्रसादित किया । इस प्रकार यह वामराशि-प्रबंध समाप्त हुआ । * सोरठके दो चारणोंकी कविताविषयक स्पर्धा । १६३) फिर कभी, एक बार, सुराष्ट्र मंडलके रहने वाले दो चारण, परस्पर दूहा-विद्यामें (दोहा छन्दकी रचना करनेमें ) स्पर्धा करते हुए यह प्रतिज्ञा करके अणहिल्लपुर में पहुँचे कि- 'हेमचंद्राचार्य जिसके दोहाकी सराहना करेंगे, उसे दूसरा हर्जाना देगा।' फिर उनमेंसे एकने, प्रभुकी सभा में आ कर यह दोहा कहा - २०२. हे हेम सूरि ! मैं तुम्हारे मुँह पर वारी जाऊं । लक्ष्मी और वाणी ( सरस्वती ) का जो सापत्न्य ( बैर ) भाव था वह, इसने नष्ट कर दिया । क्यों कि हेमचंद्रसूरिकी सभा में तो जो पण्डित है वे ही लक्ष्मीवान् है । ऐसा कह कर, उसके चुप हो जाने पर, फिर श्रीकुमार विहार में आरतीके अवसर पर राजा जब प्रणाम कर रहा था और प्रभुने उसकी पीठ पर हाथ रखा हुआ था, उसी समय वहाँ प्रवेश करके दूसरे चारणने यह कहा- २०३. हे हेम सूरि ! मैं तुम्हारे इस हाथ पर वारी जाऊं- जिसमें अद्भुत ऋद्धि रही हुई है । नीचे नमे हुए जिस मुख ऊपर यह पडता है उसके ऊपर सिद्धि आ बैठती है । इस प्रकारके अनुल्लिट ( मौलिक ) भाववाले उसके वचनसे मनमें चमत्कृत हो कर राजा इसी दोहेको बार बार बुढाने लगा । तीन बार बोलने बाद उसने कहा कि- क्या एक एक बार बोलने पर एक एक लाख दोगे ?' - इस पर राजाने उसे ३ लाख दिलाया ! इस प्रकार यह दो चारणोंका प्रबंध समाप्त हुआ । *
'प्रकरण १६३-१६५] कुमारपालादि प्रबन्ध । [ ११३ कुमारपालका तीर्थयात्रा करना । १६४) एक बार, राजा श्री कुमारपालने संङ्घाधिपति हो कर तीर्थयात्राके लिये महोत्सवपूर्वक संघ निकालना निश्चित किया और उसके देवालयका प्रस्थान-मुहूर्त साधित किया । इतनेमें देशान्तरसे आये हुए चर युगलने कहा कि- 'डाहल देशका राजा कर्ण आप पर चढ़ाई करके आ रहा है ।' [ इसको सुन कर ] राजाके ललाट देश पर [ पसीनेके ] स्वेद बिंदु झलकने लगे । संघाधिपत्यके पदकी प्राप्तिका मनोरथ नष्ट हो जानेके भयसे वाग्भट मंत्रीके साथ आ कर प्रभुके चरणों पर गिर पड़ा और अपनी निंदा करने लगा । राजाके आगे इस प्रकार महाभयका उपस्थित होना जान कर, प्रभुने कुछ सोच कर कहा कि- 'बारह पहरमें ही इस भयकी निवृत्ति हो जायगी [ इस लिये कुछ चिन्ता न करो ] । राजा विह्वल हो कर, किं- कर्तव्यविमूढ़सा बना हुआ ज्यो ही बैठा था त्यों ही निर्णीत समय पर आये हुए दूसरे चरयुगलने समाचार दिया कि-' श्री कर्ण राज का [ अकस्मात् ] स्वर्गवास हो गया ।' राजाने मुँहसे पानका त्याग करते हुए पूछा- 'सो कैसे ?' उन्होंने कहा- 'हाथीके होदे पर बैठ कर राजा कर्ण रातको प्रवास कर रहा था तब उसकी नींदसे आँखें बन्द हो गईं । गलेमें लटकता हुआ सोनेका हार एक बरगदके दरख्तकी डालीमें उलझ गया और उससे खींचा जा कर राजा मर गया । हम दोनों उसके अग्निसंस्कारके अनन्तर वहाँसे चले हैं । उनके ऐसा कहने पर, राजा तत्काल पौषधशालामें आया और सूरिकी अत्यन्त ही प्रशंसा करने लगा जिसको किसी तरह उन्होंने रोका । फिर, ७२ सामंत और संपूर्ण संघके साथ, प्रभुके बताये हुए [ धर्म और प्रवासके ] दोनों प्रकारके मार्गसे धुन्धुकनगरमें आया । वहाँ पर प्रभुके जन्मस्थानमें स्वयं बनाये हुए १७ हाथ ऊँचे झोलिका विहारमें उत्सवादिका विधान करने पर जातिपिशुन ब्राह्मणोंने विघ्न किया तो, उन्हें देश निकाला दिया गया और फिर शत्रुंजय की उपासना की । वहाँ 'दुक्खखओ कम्मक्खओ' (दुःखक्षयः, कर्मक्षयः) इस प्रकारके प्रणिधान दण्डक ( सूत्रपाठ ) का उच्चारण करता हुआ देवके पास विविध प्रार्थना करनेके अवसर पर किसी चारणके मुँहसे यह कथन सुना - २०४. अहो यह जिनदेवका कितना भोलापन है। जो एक फलके बदलेमें मुक्तिका सुख दे देता है। इसके साथ किस बातका सौदा किया जाय । उसके नौ बार इस दोहेके पढ़ने पर, राजाने उसे नौ हजारका दान किया । इसके बाद जब यह उज्जयन्त ( गिरनार ) के पास आया तो अकस्मात् पर्वतमें कंप हुआ देखा । तब श्री हेमाचार्यने राजासे कहा-' वृद्धोंकी यह परंपरागत बात है कि, एक ही साथ दो पुण्यवन्त पुरुष इस पर चढ़ते हैं तो यह छत्रशिला गिर पडती है। यदि यह बात कहीं सत्य हो तो लोकापवाद होगा, क्यों कि हम दोनों ही [ एकसे ] पुण्यवान् हैं। इस लिये आप ही [ पर्वत पर ] नमस्कार करने जाँय, हम नहीं ।' पर राजाने आग्रह करके प्रभुको ही संघके सहित ऊपर भेजा । स्वयं नहीं गया । श्री वाग्भटदेव को छत्रशिलाके उस रास्तेको छोड़ कर जीर्ण प्राकार ( जूना गढ़ ) के रास्तेसे नई पथा ( पत्थरकी सीढ़ी ) बनवानेके लिये आदेश दिया । पथाके बनानेमें ६३ लाख दाम लगे । इस प्रकार तीर्थयात्रामबंध समाप्त हुआ । * कुमारपालका स्वर्णसिद्धिकी प्राप्तिकी इच्छा करना । १६५) एक बार, पृथ्वीको अऋण करनेकी इच्छासे, राजाने स्वर्णसिद्धिकी प्राप्तिके लिये श्री हेमचंद्राचार्य के उपदेशसे उनके गुरु श्री देवचन्द्राचार्यको, श्री संघ और राजाकी विज्ञप्ति भिजवा कर यहां बुलवाये । वे २९-३०
११४ ] प्रबन्धचिन्तामणि [ चतुर्थ प्रकाश उस समय तीव्र व्रतमें लगे हुए ये तो भी यह समझ कर कि सघका कोई बड़ा कार्य होगा, विधिपूर्वके विहार करते हुए और रास्तेमें किसीसे ज्ञात न हो कर अपनी ही [ पुरानी ] पौषधशालामें आ कर ठहर गये । राजा तो उनकी अगवानी करनेके लिये सजावट करा रहा था इतनेमें सूरिने उसे सूचित किया तो वह वहाँ पर आया । तब राजा प्रभृति समस्त श्रावकोंके साथ प्रभुने द्वादशावर्त्त पूर्वक उन गुरुको प्रणाम किया । उन्होंने जो उपदेश-वचन कहे वे उन दोनोंने ( राजा और सूरिने ) सुने । फिर गुरुने सघका कार्य पूछा । इस पर सभा विसर्जन करके पर्देकी ओटमें श्रीहेमाचार्य और राजाने उनके चरणों पर गिर कर सुवर्ण-सिद्धिके बतानेकी याचना की । श्रीहेमाचार्यने कहा कि-जब मै बालक था तब आपने किसी काठ ढोने वालेके पाससे एक वल्ली (लता) ली थी और आपके आदेशसे, अग्निमें जलाए हुए तांबेके टुकड़ेको उसके रसमें भिगोने पर, वह सोना हो गया था । उस लताका नाम और सकेत आदि बतानेकी कृपा कीजिये ।' उनके ऐसा कहने पर गुरुने श्रीहेमचन्द्रको क्रोधसे दूर ठेल दिया और बोले कि 'तू इस योग्य नहीं । पहले मूँगके जूस (मूँगकी दालके पानीके) समान जो [हलकी] विद्या तुझे दी थी उसीसे तुझे [इतना] अजीर्ण हो गया है, तो फिर तुझसे मंदाग्नि रोगीको यह मोदक जैसी [भारी] विद्या कैसे दू?' इस प्रकार उन्हें निषेध करके, राजासे कहा- 'तुम्हारा ऐसा भाग्य नहीं है कि ससारको अनृण करने वाली विद्या सिद्ध हो जाय । और फिर, जीव- हिंसाका निवारना और पृथ्वीको जिनमन्दिरोंसे मंडित करना आदि पुण्यकार्योसे तुम्हारे दोनों लोक सफल बन गये हैं, अब इससे अधिक और क्या चाहते हो ?' यह कह करके, उसी समय वे वहाँसे विहार कर गये । इस प्रकार सुवर्णसिद्धिके निबंधका यह प्रबंध समाप्त हुआ । * एक बार राजाके पूछनेपर प्रभुने उसके पूर्व जन्मका सारा वृत्तान्त कहा* । * मंत्री चाहड़का दानी पना । १६६) इसके बाद, किसी समय, राजाने सपादलक्षके राजा पर चढ़ाई ले जानेके लिए सेना सज्जित की। श्रीवाग्भट मत्रीके छोटे भाई चाहडमत्रीको, अत्यधिक दान करते रहनेके कारण दोष-युक्त होने पर भी उसे खूब सिखामन दे कर, सेनापति बनाया। वह प्रयाण करके दो-तीन पड़ाव दूर गया ही था कि बहुतसे याचक इकट्ठे हो कर उसके पास आये तो उसने कोषाध्यक्ष (खजाची) से १ लाख मुद्रायें माँगीं । पर राजाकी आज्ञा न होनेसे जब वह नहीं देने लगा, तो सेनापतिने उसे चाबुकके प्रहारोंसे मार कर सेनासे निर्वासित कर दिया और फिर स्वयं यथेच्छ दान दे करके याचकोंको प्रसन्न किया । चौदह सौ साठनियों पर चढे हुए २८०० सुभटोंको साथ ले कर रास्तेमें कुछ ही पडाव करके वंभेरा नगरके किलेको जा घेरा । वहाँ पर नागरिकोंसे यह सुन कर, कि उसी रातको सात सौ कन्याओंके विवाह होने वाले हैं, उस रातको वैसा ही पड़ा रहा । दूसरे दिन किले पर दखल कर लिया । वहाँ पर सात करोडका सोना तथा ग्यारह हज़ार घोडियोंकी प्राप्ति हुई जिसकी सूचना शीघ्रगामी आदमियों द्वारा राजाके पास भिजवा दी । स्वयं उस देशमें कुमारपाल राजाकी आज्ञा फिरा कर और अपने अधिकारी नियुक्त करके लौट आया । पत्तनमें प्रवेश करके राजमहलमें आ कर राजाको प्रणाम किया। राजाने समुचित आलापके साथ, उसके गुणसे रञ्जित हो कर भी, इस तरह कहा कि-
- पूर्व जन्मके वृत्तान्तवाला यह प्रबन्ध इस ग्रन्थमें नहीं दिया गया । यह पंक्ति एक ही पुरानी प्रतिमें लिखी हुई मिली है जिसका सूचन शास्त्री दीनानाथने अपनी उस पुरानी आवृत्तिमें किया है । पुरातन प्रबन्धसग्रह, प्रबन्धकोष, कुमारपालचरित्र सग्रह आदि ग्रन्थोंमें यह प्रबन्ध मिलता है ।
' तुममें जो यह स्थूल-लक्ष्यता वाला बडा भारी दोष है वही एक प्रकारसे तुम्हारा रक्षामंत्र है। नहीं तो लोगोंकी नजर लग कर तुम खड़े ही खड़े फट पडो। तुम जो व्यय करते हो वह तो मैं भी कर सकनेमें समर्थ नहीं हूँ।' राजाकी यह बात सुन कर उसने कहा कि- ' महाराजने जो कहा वह यथार्थ ही है। ऐसा व्यय महाराज सचमुच नहीं कर सकते। क्यों कि महाराज पितृपरंपरासे तो राजाके पुत्र हैं नहीं। और मैं तो खुद महाराजका पुत्र हूँ। अतः मैं इतना अधिक अर्थव्यय कर सकता हूँ।' उसकी इस बातसे चाहे राजा खुश हुआ हो या नाराज, - वह तो कसौटी पर कसे हुए सुवर्णकी कान्तिको धारण करता हुआ, अनमोल हो कर, राजासे विदा ले कर अपने स्थान पर पहुँच गया। इस प्रकार यह राजघरट्ट चाहडका प्रबंध समाप्त हुआ। * १६७) उसी प्रकार उसका छोटा भाई, जिसका नाम सोढाक था, उसने ' मण्डलीक सत्रागार ' ऐसा विरुद धारण किया था। कुमारपाल द्वारा राणा लवणप्रसादका भविष्य कथन। १६८) इसके बाद, एक बार, आनाक नामक अपने मौसेरे भाईके सेवागुणसे सन्तुष्ट हो कर राजाने उसे सामन्त-पद प्रदान किया। तो भी वह तो उसी तरह सेवा करता रहा। एक बार, दो पहरके समय, राजा जब चन्द्रशालामें पलँग पर बैठा हुआ था तब वह भी उसके सामने बैठा था। उस समय सहसा किसी नौकरको वहाँ आते देख राजाने पूछा कि- ' यह कौन है?'। आनाक ने देखा तो वह उसीका नौकर मालूम दिया। उस नौकरका इशारा पा कर वह वहाँसे बाहर निकल कर कुशल समाचार पूछने लगा, तो नौकरने उससे पुत्रजन्मकी बधाई माँगी। इस समाचारसे उसका चेहरा सूर्य जैसा चमक उठा और फिर उसे विदा करके अपने स्थान पर आ बैठा। राजाके यह पूछने पर कि क्या बात है? तो उसने कहा कि-'महाराजके [सेवकके] घर पुत्र हुआ है'। यह सुन, राजा अपने मनमें कुछ सोच कर, प्रकाश भानसे बोला- ' पुत्रजन्म निवेदन करनेके लिये यह चाकर जो वेत्रधारियोंकी बिना बाधाके ही यहाँ तक आ पहुँचा सो इससे जाना जाता है कि अपने पुण्यके प्रभावसे यह गूर्जर देश का राजा होगा, पर इस नगरमें और इस धवलगृहमें ( राजमहलमें ) नहीं। क्यों कि तुम्हें इस स्थानसे उठा कर इसने पुत्रोत्पत्तिकी बधाई दी है इस लिये इस नगरका राजा नहीं होगा।' इस प्रकार विचार चतुर्मुख श्री कुमारपाल देवद्वारा निर्णीत लवणप्रसाद राणाका प्रबंध समाप्त हुआ। * २०५. अपने आज्ञावर्ती ऐसे अठारह बड़े देशोंमें, संपूर्ण चौदह वर्ष तक जीवहत्याका निवारण करके, और अपनी कीर्तिके स्तंभके समान १४ सौ जैन विहारोंका निर्माण करके जैन राजा कुमारपाल ने अपने सब पापोंको क्षय कर दिया। [ १२५-७] कर्नाटक, गूर्जर, लाट, सौराष्ट्र, कच्छ, सिन्धु, उच्च, मंभेरी, मरुदेश, मालव, कोंकण, कोर, जागलक, सपादलक्ष, मेवाड़, ढीली (दिल्ली) और जालंधर इतने देशोंमें कुमारपाल राजाने प्राणियोंको अभयदान दिया और सातों व्यसनोंका निषेध किया। रुदतीधन (अपुत्र कुटुम्बके धन) का ग्रहण मना किया और न्यायघण्टा बजा कर प्रजाको संतुष्ट किया।
११६ ] प्रबन्धचिन्तामणि [ चतुर्थ प्रकाश हेमचन्द्र सूरिको लूता रोग लगना । १६९) अब एक बार, कच्छप राज लक्षराज की महासती माताने जो मूलराज को शाप दिया था कि उसके वंशजोंको लूता रोग हो जाया करेगा, तदनुसार, कुमार पालने जब गृहस्थ धर्म ( श्रावकपन ) के व्रत ग्रहण किये तब उसने अपना राज्य गुरु श्री हेम चन्द्र को समर्पण कर दिया था, इसलिये उसी छिद्रमे (इस राज्यसम्बन्धके छलसे) सूरिको भी वह लूता रोग संक्रमित हुआ। इसे देख सभी राजलोकके साथ राजा दु खित हुआ, तब प्रभुने प्रणिधानसे अपनी आयु प्रवल समझ कर अष्टाङ्ग योगाभ्यासके द्वारा, लीला ( क्रीडा ) के साथ उस रोगको नष्ट कर दिया । १७०) किसी समय, कदली पत्र पर आरूढ किसी योगीको देख कर विस्मित बने हुए राजाको प्रभुने भूमिसे चार अगुल ऊपर अधर रह कर ब्रह्मरन्ध्रमे निकलता हुआ तेज पुञ्ज दिखाया । * हेमचन्द्रसूरि और कुमारपालका स्वर्गवास । १७१) चौरासी वर्षकी अवस्थाके अन्तमें प्रभुने अपना अतिम दिन समीप आया समझ कर, अनशन पूर्वक अन्ताराधन क्रिया प्रारंभ की । उसे देख कर दु खित हुए राजाको प्रभुने कहा कि — ‘ तुम्हारी आयु भी अब ६ महीना ही बाकी है । सन्तानाभावके कारण अपने वर्त्तमान रहते ही अपनी सब उत्तर क्रिया कर-करा लेना ।’ यह आदेश दे कर दशम द्वारसे उन्होंने अपना प्राणत्याग कर दिया। फिर इसके बाद प्रभुके सस्कार स्थान पर, यह समझ कर कि, उनके देहकी भस्म भी पवित्र है, राजाने तिलक करके नमस्कार किया। इसके बाद सभी सामन्त और नागरिक लोगोने वहाँ की मिट्टी ले ले कर तिलक करना शुरू किया जिससे वहा पर गड्ढा हो गया । वह गड्डा आज भी ‘हेम खड्ड’ नामसे प्रसिद्ध है । १७२) अब फिर, राजा प्रभुके शोकमें विकल हो कर आँखोंमें आँसू भर भर रोने लगा जिस पर मन्त्रियोंने उसे वैसा न करनेकी विज्ञप्ति की, तो वह बोला — ‘मैं उन प्रभुके लिये शोक नहीं कर रहा हूँ जिन्होंने अपने पुण्यसे उत्तमसे उत्तम लोक अर्जित किया है, मैं तो अपने इस सर्वथा त्याज्य ऐसे सप्ताङ्ग राज्यके लिये शोक कर रहा हूँ, कि राज्यपिण्ड दोषसे दूषित होनेके कारण मेरा पानी भी इन जगद्गुरुके अगमें नही लगा — ’ इस प्रकार प्रभुके गुणोंको स्मरण करता हुआ चिरकाल तक विलाप करते रहा और अन्तमें प्रभुके कहे हुए दिन पर उन्हींकी उपदिष्ट विधिसे समाधि पूर्वक मर कर उस राजाने स्वर्गलोक अलंकृत किया । * यहाँ पर P प्रतिमें निम्नोद्धृत श्लोक अधिक प्राप्त होते हैं–जो सोमेश्वरकी कीर्तिकौमुदीके हैं– [ १२८ ] पृथु आदि पूर्व राजाओने स्वर्ग जाते समय जिस राजाके पास अपने गुणरूपी रत्नोंको मानों न्यासके रूपमें रख दिया था । [ १२९ ] इस राजाने न केवल युद्धक्षेत्रमें अपने बाणोंसे मात्र शत्रुओंको ही जीत लिया था, किंतु अपने लोकप्रीतिकर गुणोंसे इसने पूर्वजोको भी जीत लिया । [ १३० ] राग और रतिसे रहित, ऐसे ( अथवा वीतरागमें प्रीतिवाले ) इस नृदेवकी, मृतकोंके धनको छोड़ देनेके कारण, देवताकी नाईं अमृतार्थता सिद्ध हुई । ( क्यो कि देवता अमृतके अर्थी होते हैं, और यह मृतका अर्थ नहीं लेता था । ) [ १३१ ] इस राजाने तलवारकी धारमें नहाई हुई वीरोंकी श्री ( लक्ष्मी ) ही ग्रहण की, किंतु आँसूकी धारासे धुली हुई कायरोंकी ( और निरपत्य जनोंकी ) श्री नहीं ली ।