प्रबन्धचिन्तामणि (गुजरात, मालवा व चालुक्य ऐतिहासिक प्रबन्ध)
Prabandha Chintamani with Hindi Translation
मेरुतुङ्गाचार्य (१३०४ ई.) / पं. हजारीप्रसाद द्विवेदी द्वारा
पृष्ठ 128, कुल 181 में से
संदर्भ में पढ़ेंप्रकरण १४२ ] कुमारपालादि प्रबन्ध [ १०३ पा कर [मूल] प्रासादकी चौकट पर चढ़ गये। मनमें कुछ सोच कर प्रकाशमें बोले कि-'इस प्रासादमें साक्षात् कैलासवासी महादेव रहते हैं, इस लिये रोमाञ्चकण्टकित शरीरको धारण करते हुए, उपहारको दूना कर दिया जाय !' ऐसा आदेश करके शिवपुराणमें कहे हुए दीक्षा-विधिके अनुसार आह्वान-अङ्गुष्ठम-मुद्रा-मन्त्रन्यास- विसर्जन आदि स्वरूप, पञ्चोपचार विधिसे शिवकी पूजा की। अन्तमें इस प्रकार स्तुति की- १८७. जिस किसी धर्ममतमें, जिस किसी नामसे, तुम जो कोई भी हो, लेकिन दोष और कलुषतासे रहित ऐसे तुम एक ही भगवान् हो और इस लिये हे भगवन् ! तुम्हें नमस्कार है। १८८. पुनर्जन्मके अङ्कुरको पैदा करनेवाले राग आदि जिसके नष्ट हो गये हैं वह ब्रह्मा हो, विष्णु हो या शिव हो-उसे हमारा नमस्कार है। इत्यादि स्तुतियाँ करते हुए, सब राजपुरुषोंके साथ विस्मययुक्त हो कर राजाके देखते रहने पर, हेमाचार्य •दण्डवत् प्रणाम करके स्थित हुए। फिर बृहस्पति की बतलाई हुई पूजाविधिके अनुसार सामिलाप भारसे राजाने शिवका पूजन किया। इसके अनन्तर धर्मशिलामें बैठ कर तुलापुरुषदान, गजदान आदि महादान दे करके कर्पूरकी आरती उतारी। कुमारपालकी तत्त्वजिज्ञासा और हेमाचार्यका शिवको प्रत्यक्ष करना। फिर सभी राजपुरुषोंको हटा कर, शिवके गर्भगृहके अन्दर प्रवेश करके राजा बोला कि-'न महादेवके समान देव है, न मेरे समान राजा है और न आपके समान महर्षि। भाग्यवश इन तीनोंका सहज संयोग हुआ है। इस लिये, नाना दर्शनोंके भिन्न भिन्न प्रमाणोंके कारण जिस देवतत्त्वके बारेमें चित्त संदिग्ध हो रहा है, उस मुक्तिदायक सच्चे देवका वास्तविक स्वरूप, इस तीर्थभूमिमें आप सत्य सत्य रूपसे मुझे बताइये।' यह सुन कर श्री हेमचन्द्रने बुद्धिसे कुछ सोच कर राजासे कहा- 'इन दर्शनोंके पुराने कथनोंको छोड़ दीजिए। मैं श्री सोमेश्वर देवको ही आपके प्रत्यक्ष कर देता हूँ। उन्हींके मुखसे मुक्तिमार्ग क्या है सो जान लीजिये।' यह वाक्य सुन कर बोला- 'क्या यह भी संभव है?' इस तरह राजाके विस्मित होने पर [सूरिने कहा]- 'निश्चय ही यहाँ पर तिरोहित मानसे दैवत वर्तमान है। और हम दोनों गुरुके कथनके अनुसार इनके निश्छल आराधक हैं। तो फिर इस प्रकार, इस द्वन्द्वके सिद्ध होनेके कारण देवताका प्रादुर्भाव होना सरल है। मैं प्रणिधान (ध्यान) करता हूँ और आप कृष्ण अगुरुका उत्क्षेप (धूप) करें। और वह उत्क्षेप तब बन्द करियेगा, जब प्रत्यक्ष शिव आ कर निषेध करें।' इसके बाद दोनोंके इस प्रकार करने पर जब गर्भगृह धूपसे भर कर अन्धकारमय हो गया और नक्षत्रमालाके समान उज्ज्वल प्रदीप्त दीपक जब बुझ गये, तो फिर अकस्मात्, जैसे मानों बारहों सूर्यका तेज फैल रहा हो ऐसा प्रकाश दिखाई देने लगा। उसे देख कर सभ्रमवश राजा अपनी आँखें मलता हुआ देखने लगा तो, जलाधारके ऊपर श्रेष्ठ जाम्बूनद (सुवर्ण) के समान द्युतिवाले, चक्षुसे दुरालोक्य, अपरूप असम्भव स्वरूपवाले एक तपस्वी दिखाई दिये। उसको पैरके अँगूठेसे ले कर जटा-जूट तक स्पर्श करके देवताका अवतार निश्चित किया और पञ्चाङ्गसे पृथ्वीतल पर लुंठित हो कर प्रणाम करके भक्तिसे राजाने विज्ञप्ति की कि- 'जगदीश ! आपका दर्शन करके आँखें कृतार्थ हुईं, अब आदेशका प्रसाद कर कर्णयुगलको कृतार्थ करो।' ऐसा कह कर राजाके चुप हो जाने पर, मोहरात्रिके लिये सूर्य स्वरूप उनके मुखसे, यह दिव्य वाणी प्रकट हुई- 'राजन् ! यह महर्षि सब देवताके अवतार हैं। पूर्ण परब्रह्मके अवलोकनसे, करतलमें रहे हुए मुक्ताफलकी तरह इन्हें त्रिकालका स्वरूप विज्ञात है। इस लिये इनका बताया हुआ मुक्तिमार्ग ही असंदिग्ध मुक्तिमार्ग है।' ऐसा कह कर शिव जब अन्तर्धान हो गये तो, प्राणायाम पवनका रेचन कर और आसन बन्धको शिथिल करके ज्यों ही श्री हेमचन्द्रने 'राजन् !' यह शब्द कहा, तो तत्काल इष्ट