प्रबन्धचिन्तामणि (गुजरात, मालवा व चालुक्य ऐतिहासिक प्रबन्ध)
Prabandha Chintamani with Hindi Translation
मेरुतुङ्गाचार्य (१३०४ ई.) / पं. हजारीप्रसाद द्विवेदी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१०२ ] प्रवन्धचिन्तामणि [ चतुर्थ प्रकाश या तो ध्वजारोप हो तब तक शुद्ध भावसे ब्रह्मचर्य पालन करना या मद्य-मांसका नियम लेना (त्याग करना)' ऐसा कहने पर, उनकी बात सुन कर मद्य-मांसके नियमकी अभिलाषा करते हुए, उसने शिवके ऊपर जल छोड़ कर उक्त शपथको ग्रहण किया। दो वर्षके बाद, जब कि, उस मंदिरमें कलश और ध्वजका आरोपण कार्य पूरा हुआ, उसने नियमसे मुक्त होनेकी अनुज्ञा पानेके लिये गुरुसे कहा। उन्होंने कहा 'कि--' अपने इस समुद्भूत कीर्तन (मन्दिर) के साथ यदि चंद्रचूड़ (शिव) के दर्शन करनेकी इच्छा हो तो यात्रा करनेके बाद ही नियम छोड़ना उचित होगा।' ऐसा कह कर मुनिवर हेमचंद्र वहांसे चले गये। उनके गुणोंसे नीलीके रंगकी भाँति दृढरूपसे हृदयमें अनुरक्त हो कर वह राजा सभामें केवल उन्हींकी प्रशंसा करने लगा। * हेमचन्द्राचार्यका सोमेश्वरकी यात्रा निमित्त कुमारपालके साथ जाना ! तब, निष्कारण वैरी ऐसा कोई परिजन उनके तेजःपुञ्जको न सहकर, इस मसलेके अनुसार कि- , १८४. उज्ज्वल गुणवालेको अभ्युदित होता देख कर क्षुद्र मनुष्य किसी तरह उसे नहीं सहन कर सकता। जैसे पतिंगा अपने शरीरको जला कर भी दीप्त दीपशिखाको बुझा देना चाहता है। पीठका मांस भक्षण करनेके दोषको अंगीकार करके (पीठ पीछे चुगली खा करके) भी उनका अपवाद करने लगा कि-'यह बड़ा चालाक, हा जी हा करने वाला और सेवाधर्म कुशल है, जो केवल महाराजकी मर्जीकी ही बात कहता रहता, है। यदि ऐसा नहीं है, तो प्रातःकाल आप सोमेश्वरकी यात्रामें साथ चलनेको उससे कहें। आपके ऐसा कहने पर वह परधर्मके तीर्थका परिहार करके किसी कारण यहाँ नहीं आवेगा। और हम लोगोंका मत ही प्रमाणभूत मालूम देगा।' राजाने उसकी बातका स्वीकार करके प्रातःकाल जब, श्री हेम चंद्राचार्य आये तो, सोमेश्वर की यात्रामें साथ चलनेके लिये उनसे अभ्यर्थना की। इस पर श्री सूरि बोले कि 'बुभुक्षित (भूखे) के लिये निमंत्रणकी क्या [जरूरत हे] और उत्कंठितके लिये केकारवके श्रवणके फहनेकी क्या आवश्यकता है-इस कहावतके अनुसार उन तपस्वियोंके लिये, जिनका तीर्थयात्रा करना तो एक अधिकारसा धर्म है, उन्हें राजाके आग्रहका क्या प्रयोजन ?' इस तरह जब गुरुने अंगीकार किया, तो राजाने कहा कि- 'आपके लिये पालकी आदि क्या सवारी दी जाय?' गुरुने कहा कि-'हम लोग पायौँसे चल कर ही पुण्य प्राप्त करते हैं। किन्तु हम थोड़े थोड़े चल कर श्री शत्रुंजय, उज्ज्रयत (गिरनार) आदि तीर्थोंको नमस्कार करते हुए आपसे [सोमनाथ] पत्तन में प्रवेश करनेके समय आ मिलेंगे।' ऐसा कह कर उन्होंने वैसा ही किया। राजा अपनी सारी राज्यऋद्धिके साथ प्रस्थान कर कुछ पड़ावोंके बाद पत्तन को पहुँचा। वहाँ श्री हेमचन्द्र मुनीन्द्र भी आ मिले जिससे वह अत्यन्त प्रसन्न हुआ। गण्ड० श्री बृहस्पति ने सम्मुख आ कर अगवानी की और महोत्सवके साथ उनको नगरमें प्रवेश कराया। श्री सोमनाथ के प्रासादकी सीढ़ियों पर चढ़ कर, जमीन पर लेट कर उसे प्रणाम करनेके बाद, चिरकालसे दर्शनकी उत्कट आकांक्षाके कारण सोमेश्वर के लिंगका गाढ़ आलिंगन किया। * हेमाचार्यका शिवकी पूजा-स्तुति करना। जैनधर्मसे द्वेष रखने वालोंके मुँहसे यह कथन सुन कर कि 'ये जिन देवके अतिरिक्त अन्य देवताओंको नमस्कार नहीं करते' शान्त चित्त वाले राजाने हेमचन्द्रसे यह बात कही कि-'यदि योग्य मालूम दे तो इन मनोहर उपहारोंसे आप श्री सोमेश्वर देवकी पूजा करें।' 'अच्छी बात है' ऐसा कह करके उन्होंने शीघ्र ही राजाके कोशसे आये कमनीय अलंकारोंसे अलंकृत होकर, राजाकी आज्ञासे श्री बृहस्पति द्वारा हाथका सहारा