प्रबन्धचिन्तामणि (गुजरात, मालवा व चालुक्य ऐतिहासिक प्रबन्ध)
Prabandha Chintamani with Hindi Translation
मेरुतुङ्गाचार्य (१३०४ ई.) / पं. हजारीप्रसाद द्विवेदी द्वारा
प्रकरण १०४-१०८ ] सिद्धराजका शत्रुंजयकी यात्रा करना [ ७७ [ १०१ ] हे गरवा गिरनार ! तुम पर वारि जाती हूँ । [ खंगार के लिये ] लंबा बुलावा आया है । इसके जैसा भारक्षम ( समर्थ ) सज्जन फिर दूसरी बार तुझे नहीं मिलेगा । [ १०२ ] मुझको इतने-ही-से संतोष होगा, जो प्रभु ( स्वामी ) के पगोंमें [ मेरा भी शरीर अग्निद्वारा ] प्रदीप्त हो । न मुझे रानीपनकी चाहना है, न रोष है । ये दोनों खंगार के साथ चले गये । [ १०३ ] हे मन ! अब तंबोल मत माँगो, खुले मुँह मत झांको । देउलवाडे के संग्राममें खंगार के साथ वह सब चला गया है । [ १०४ ] हे जेसल ! मेरी बाँह मत मोडो और वारंवार विरूप भाव न बताओ । नवघनके बिना नदीमें नया प्रवाह नहीं आता । [ १०५ ] हे वढवाण ! मैं तुझसे क्या लडूं - भूल जाना चाहती हूँ लेकिन भूल नहीं सकती । हे भोगावा ( वढवाण के पासकी नदी ) तँने सोनाके समान प्राणोंका भोग लिया । इस प्रकारके बहुतसे वाक्ये [ कहे जाते ] हैं । ये यथाप्रसंग जानलेने योग्य हैं । १०७) इसके बाद, महं० जाम्ब के वंशज दण्डाधिपति सज्जन की योग्यता देखकर उसे सुराष्ट्र देश का प्रबन्धक ( गवर्नर ) नियुक्त किया । उसने स्वामीको बिना सूचन किये ही, तीन वर्षके वसूल किये हुए [ राजकीय ] द्रव्यसे श्री उज्जयन्त ( गिरनार ) पर्वत पर स्थित नेमिनाथके काठके बने हुए जीर्ण मन्दिरको उखाड़ कर उसके स्थानमें नया पत्थरका मन्दिर बनवाया । चौथे वर्ष चार सामंतोंको भेज कर राजाने सज्जन दण्डाधिपतिको पत्तन में बुलवाया । उससे [ पिछले ] तीन वर्षका वसूल किया हुआ द्रव्य माँगने पर, साथमें लाये हुए उसी देशके व्यवहारियोंसे उतना ही धन ले कर देता हुआ वह बोला - 'महाराज ! श्री उज्जयन्त के मंदिरके जीर्णोद्धारका पुण्य अथवा यह धन इन दोनोंमेंसे चाहे सो एक ले लें ।' उसके ऐसा बताने पर उसकी अतुलनीय बुद्धिसे चित्तमें चमत्कृत हो कर सिद्धराज ने तीर्थोद्धारका पुण्य लेना ही स्वीकार किया । वह सज्जन फिर उसी देशका अधिकार पा कर, उसने शत्रुंजय और उज्जयन्त इन दोनों तीर्थोंमें उनके बीचके बारह योजन विस्तृत अन्तरके जितना ही लंबा दुकूलका बना हुआ महाध्वज चढ़ाया । इस प्रकार यह रैवतकोद्धार प्रबन्ध समाप्त हुआ । * सिद्धराजका शत्रुंजयकी यात्रा करना । .१०८) इसके बाद, एक बार फिर सोमेश्वर की यात्रा कर वापस लौटते समय श्री सिद्धराज ने, रैवतकगिरिकी उपत्यकामें डेरा डाल कर, अपना कीर्तन ( मन्दिरादि धर्मस्थान ) देखना चाहा । उसी समय मत्सरपरायण ब्राह्मणोंने यह कह कर पिशुनवाक्योंसे उसे रोका कि 'यह पर्वत सजलाधार लिंगके आकारका है, इसलिये इसे पैरोंसे स्पर्श करना उचित नहीं है ।' राजाने वहाँ पर पूजा भिजवा कर प्रस्थान किया और शत्रुञ्जय महातीर्थके पास आ कर पड़ार डाला । वहाँ पर भी उन्हीं निर्दय चुगलखोर ब्राह्मणोंने हाथमें कृपाण ले कर तीर्थ पर जानेका मार्ग रोका । उनके ऐसा करने पर श्री सिद्धराज ने सबेरा होनेके पहले ही, कापड़ीका वेष बना कर, और जिसके दोनों ओर गंगाजलके पात्र रखे हुए हैं ऐसी बहंगी कंधे पर रख कर, खुद इन ब्राह्मणोंके बीचमें हो कर पर्वत पर चढ़ गया । किसीने उसके स्वरूपको नहीं जाना । [ ऊपर जा कर ] गंगाजलसे श्री युगादि देव ( ऋषभनाथ ) को स्नान कराया और पर्वतके पासके बारह गाँवोंका शासन उस १ ये जो वाक्य ऊपर अनूदित किये गये हैं, उनमेंका कितनाक कथन अस्पष्ट और अस्फुटार्थक है । जो अर्थ यहा पर दिया गया है यह निर्भ्रान्त है ऐसा नहीं कह सकते ।
७८ ] प्रबन्धचिन्तामणि [ तृतीय प्रकाश देवको दान कर दिया। तीर्थका दर्शन कर वह उन्मुद्रित-लोचन हुआ और अमृताभिषिक्त होनेकी नाँई खडा रह गया । [ पर्वतकी रमणीयता देख कर ] सोचने लगा कि ' इस सल्लकी-वन और नदियोंसे परिपूर्ण पर्वत पर, यहीं, [ नये ] विंध्यवनकी रचना करूँगा ' - इस प्रकारकी जो सफल प्रतिज्ञा [ पहले की थी और तदनुसार ] हाथियोंका झुंड पानेके लिये जो मेरा मन बेहाथ हो गया था, उस मनोरथसे मैने इस तीर्थकी पवित्रताका ध्वंस करनेवाला मानस पाप किया है और इसलिये मुझ पापीको धिक्कार है।' इस प्रकार श्री देव- पादके सामने राजलोक द्वारा विदित अपने आपकी निंदा करता हुआ यह आनंदके साथ पर्वत पर से नीचे उतरा। * वादी श्रीदेवसूरिका चरित्रवर्णन । १०९) अथ यहाँ पर देवसूरिका चरित्र वर्णन करेंगे। - उस अवसर पर कुमुदचंद्र नामक दिगम्बर [ विद्वान् ] भिन्न भिन्न देशोंके चौरासी वादियोंको वादमें जीत कर, कर्णाटक देशसे गूर्जर देशको जीतनेकी इच्छासे कर्णावती नगरमें आया । वहाँ भट्टारक श्री देवसूरि चतुर्मास करके रहे हुए थे। एक बार श्री अरिष्टनेमिके मंदिरमें जब वे धर्मशास्त्रका व्याख्यान कर रहे थे तो उस दिगंबरके साथी पंडितोंने उनकी वह अनुच्छिष्ट ( मौलिक, विशुद्ध ) वाणी सुनी । उन्होंने जा कर वह वृत्तान्त कुमुदचन्द्र से कहा तो उसने उनके उपाश्रयमें तृणके साथ जल प्रक्षेप कराया। पर, खण्डन, तर्क आदि प्रमाण शास्त्रोंमें प्रवीण ऐसे उस महर्षि पंडितने जब इस पर कुछ ध्यान न दे कर उसकी अवज्ञा की, तो उस दिगम्बरने श्री देवाचार्य की बहन तपोवना शीलसुन्दरी को चेटकाधिष्ठित करके, नाच, जलानयन आदि अनेक विडंबनाओंसे उसे विडंबित किया। चेटक ( टोना आदि ) के दूर होने पर वह जब स्वस्थ हुई तो उस उत्कट पराभवसे दुःखित हो कर वह अपने आचार्यकी खूब भर्त्सना करने लगी। उसे रोक कर आचार्य चिन्तामग्न हो रहे। ( यहाँ पर P प्रतिमें इस विषयके निम्नलिखित पद्य पाये जाते हैं-) [ १०३ ] हा ! मै किसके आगे पुकार करूँ ? मेरे प्रभु तो कर्णरहित हैं। इनसे तो वह सुगत (बुद्ध) देव ही अच्छा है जो अपने शासनका तिरस्कार होने पर [ उसका प्रतिकार करनेकी इच्छासे ] अवतार धारण करता है। [ साध्वीके इस वाक्यको सुन कर आचार्य मनमें सोचने लगे- ] [ १०४ ] आः ! गुरुजनके प्रमाणोंकी व्याख्याका श्रम मेरे पास केवल उनके कण्ठके सुखा देने भरका पुष्ट फल देनेवाला मात्र हुआ-गुरुओंका मुझे पढ़ानेके लिये किया गया परिश्रम व्यर्थ ही हुआ !-जो मैं उनके शासन ( धर्म संप्रदाय ) के प्रति की गई इस प्रकारकी विडंबनाओके डबरको शान्त मनसे सुन रहता हूँ । [ देवसूरिके द्वारा कही गई यह उक्ति सुन कर उस श्रेष्ठ आर्याने कहा-] [१०५] दुष्ट वादियोंके निर्दलनमें अंकुश जैसी श्री देवी, जो श्वेतांबरोंके अभ्युदयके लिये मंगलमयी कोमल दूर्वा जैसी है, गुरुवर श्री देवसूरिके ललाट पट्ट पर प्रथमावतारकी स्थिति लावे। श्री देवसूरिने [ दिगम्बर विद्वान्से ] कहा-'वादविद्याविनोद ( शास्त्रार्थ-विनोद ) के लिये आप पत्तन चलें। वहाँ राज-सभामें आपके साथ वाद करेंगे ।' उनके ऐसा आदेश करने पर वह दिगंबर अपने आपको कृतकृत्य मानता हुआ पत्तन को पहुँचा। [ उसका आना सुन कर ] श्री सिद्धराजने, जिसके मातामहका वह विद्वान् गुरु था, सामने जा कर उसका योग्य सत्कार किया। वह वही डेरा डाल कर ठहरा। सिद्धराज ने
प्रकरण १०८-१०९ ] वादी श्रीदेवसूरिका चरित्रवर्णन [ ७३ श्रीहेमाचार्यसे वादमें निष्णात ऐसे आचार्यकी बात पूछी। उन्होंने चारों विद्याओंमें परम प्रवीणता प्राप्त, जैन मुनिरूप हाथियोंके यूथपति, श्वेतांबर शासनके लिये वज्रके प्राकार जैसे मानेजानेवाले, राजसभाके शृंगारहार, कर्णावती में [ चातुर्मास ] रहे हुए, वादविद्याके पारगामी, वादिहस्तियोंके लिये सिंहस्वरूप श्रीदेवाचार्य को बताया । इसके बाद उनको बुलानेके लिये, श्री संघके लेखके साथ राजाकी विज्ञाप्तिका वहा पहुंची। उसे पा कर देवसूरि पत्तन में आये और राजाके अनुरोधसे वाग्देवीकी आराधना की । उस देवीने आदेश दिया कि-- ‘वाद करते समय, वादिवेतालीय श्रीशान्तिसूरि विरचित उत्तराध्ययन बृहद्वृत्तिमें उल्लिखित दिगंबर वादस्थल विषयक चौरासी विकल्प जालका उपन्यास करके, उसे प्रपंचित करोगे तो दिगंबरके मुखमें मुद्रा लग जायगी ।’ देवीके इस आदेशके बाद, गुप्त भावसे कुमुद चंद्र के पास पंडितोंको यह जाननेके लिये भेजा कि किस शास्त्रमें इसकी विशेष कुशलता है। उनके द्वारा उसकी यह निम्न लिखित उक्ति सुनी- १५३. हे देव ! आदेश कीजिये में सहसा क्या करूं ? लंकाको यहीं ले आऊं, या जंबूद्वीपको यहाँसे ले जाऊं ?, क्या समुद्रको सुखा दूं, या उस उच्च पर्वतको, जिसकी चोटीका एक पत्थर कैलास है, उसे खेल-ही-में उखाड़ कर समुद्रको बाँध दूँ, कि जिसके प्रक्षेपसे क्षुब्ध हो कर समुद्रका पानी बढ़ जाय । इस उक्तिको सुन कर, श्रीदेवाचार्य और श्रीहेमाचार्य दोनों उसकी सिद्धान्तविषयक बहुत अल्प कुशलता समझ कर उसे अपने मनमें ‘जीत लिया, जीत लिया’ ऐसा मान बडे प्रसन्न हुए । इसके बाद देवसूरि आचार्यका प्रधान शिष्य रत्नप्रभ, प्रथम रात्रिमें गुप्त वेष करके कुमुदचंद्र के डेरेमें गया। उसने (कुमुदचंद्रने) पूछा कि- ‘तुम कौन हो?’; ‘मैं देव हूँ’; ‘देव कौन ?’; ‘मैं ?’; ‘मैं कौन ?’; ‘तुम कुत्ते’; ‘कुत्ता कौन ?’; ‘तुम’; ‘तुम कौन ?’; ‘मैं देव’; [ ‘तुम कहाँसे आये ?’; ‘स्वर्गसे’ ‘स्वर्गमें क्या बात चल रही है !’; ‘कुमुदचन्द्रका सिर ९५ पल है’; ‘इसमें प्रमाण क्या है?’ ‘काट कर तौल लो’] इस प्रकारकी उसकी उक्ति-प्रत्युक्ति के बंधनमें जब यह चाककी तरह चक्कर खाने लगा, तो अपनेको देव और दिगम्बरको श्वान बना कर, जैसे गया था वैसे ही लौट आया । [ पीछेसे ] उस चक्रदोषको ठीक ठीक समझा तो मनमें अतिशय विषण्ण हो कर, इस प्रकारकी उचित कविता बना कर उस मायावी कुमुदचन्द्रने देवसूरिके पास भेजी- १५४. अरे श्वेताम्बरो ! इस प्रकारके विकटाटोप वचनोंके द्वारा, संसार वृक्षके अतिविकट कोटरमें, इस मुग्ध जन-समूहको क्यों गिराते हो ? यदि तद्व्रतातत्त्वके विचारमें आप लोगोंको थोड़ीसी भी कामना हो तो सचमुच ही कुमुदचन्द्र के दोनों चरणोंका रात-दिन ध्यान किया करो । इसके बाद श्री देवसूरिके चरणका परम परमाणु (विनीत शिष्य), बुद्धिवैभवसे चाणक्य का भी उपहास करनेवाले पंडित माणिक्य ने निम्नलिखित श्लोक उसके पास भेजा- १५५. अरे! वह कौन है जो सिंहके केसराजालको पैरोंसे छूना चाहता है ? वह कौन है जो तेज भालेकी नोकसे अपनी आँख खुजाउना चाहता है ? वह कौन है जो नागराजके सिर परकी मणिको अपनी शोभाके लिये उतारना चाहता है ! जो यह करना चाहता है वही वंदनीय ऐसे श्वेतांबर शासनकी निन्दा करना चाहता है। फिर रत्नाकर पंडितने भी इस श्लोकको कुमुदचंद्रके पास उपहासके सहित भेजा- १५६. नंगो (दिगम्बरों) ने जो युवतियोंकी मुक्तिका निरोध किया है इसमें क्या तत्त्व है यह तो प्रकट ही है । फिर वृथा ही कर्कश तर्कके लिये यह अनर्थमूलक अभिलाषा क्यों करते हो !
८० ] प्रबन्धचिन्तामणि [ तृतीय प्रकाश श्री हेमचंद्राचार्य ने सुना कि श्री मयणल्ला देवी कुमुद चंद्र की पक्षपातिनी है और सभाके अपने संपर्कवाले सभ्योंसे उसकी जयके लिये नित्य अनुरोध कर रही है, तो उन्होंने, उन्हीं सभासदोंसे यह वृत्तान्त कहलवाया कि 'वादस्थल पर दिगंबर लोग तो स्वीकृत सुकृत्यको अप्रमाणित करेंगे और श्वेताम्बर प्रमाणित करेंगे।' यह सुन कर रानीने व्यवहारबहिर्मुख उस दिगंबर परसे अपना पक्षपात हटा लिया। इसके बाद, भाषोत्तर (वादका विषय) लिखानेके लिये कुमुदचंद्र तो पालकीमें बैठ कर, और पण्डित रत्नप्रभ पैदल ही चल कर, राजाके अक्षपटल (न्यायविभाग) कार्यालयमें आये। वहाँके अधिकारियोंको कुमुदचंद्रने अपनी यह भाषा (वादके विषयमें निजकी प्रतिज्ञा) लिखवाई- १५७. केवली होने पर [मनुष्य] भोजन नहीं करता, चीवर सहित [मनुष्य] निर्वाण नहीं पाता और स्त्रीजन्ममें मुक्ति नहीं मिलती। श्वेतांबरोंका इसके विरुद्ध यह उत्तर था- १५८. केवली होने पर भी [मनुष्य] भोजन करता है, सचीवर [मनुष्य] को भी निर्वाण मिलता है, और स्त्रीजन्ममें भी मुक्ति होती है-यह देवसूरिका मत है। इस प्रकार भाषा और उत्तर लिख लेनेके अनंतर वादका स्थान और समय निर्णीत हुआ। उसमें सिद्धराजके सभापतित्वमें, षड्दर्शन-प्रमाणको जाननेवाले सभ्यलोग जब उपस्थित हुए तो, तो सुखासन (पालकी) में बैठ कर, सिरपर श्वेत छत्र धारण किये हुए और जयडिंडिम बजाते हुए, वादी कुमुद चन्द्रने सभामें प्रवेश किया। उसके आगे बाणके सिरेपर, उसके प्राप्त किये हुए जयपत्र लटक रहे थे। सिद्धराजने उसके बैठनेके लिये सिंहासन दिलवाया। प्रभु श्री देवसूरिने मुनीन्द्र श्री हेमचंद्रके साथ सभामें एक ही आसनको अलंकृत किया। फिर, वादी कुमुदचंद्रने, जो अवस्थासे वृद्ध था, श्री हेमचंद्रसे - जिनकी शैशवावस्था कुछ ही समय पहले व्यतीत हुई थी; अर्थात् जो अब भी पूर्ण युवा नहीं हुए थे - कहा कि 'आपके द्वारा तक्र क्या पीत है! अर्थात्-आपने तक्र (छास) पी है?' इस पर श्री हेमचंद्रने उससे कहा-'क्या वृद्धावस्थाके कारण तुम्हारी बुद्धि अस्थिर हो गई है? जो ऐसा अनाप-सनाप बोल रहे हो! तक्र श्वेत होता है, पीत तो हल्दी होती है!' इस वाक्यसे नीचा मुँह हो कर उसने पूछा कि-'आप दोनोंमे वादी कौन है?' श्री सूरिने उसका कुछ तिरस्कार करनेके इरादेसे [अपनेको लक्ष्य कर लेकिन शब्दभेदके साथ ] कहा 'यह आपका प्रतिवादी है'। ऐसा कहने पर कुमुदचंद्र [उसके मर्मको ठीक न समझ कर] बोला-'मुझ वृद्धका इस शिशुके साथ क्या वाद हो सकता है?' उसकी यह बात सुन कर [आचार्य हेमचन्द्रने कहा-] 'वृद्ध तो मैं हूँ; और आप तो शिशु ही हैं-जो अब तक भी कंदोरा बाधना नहीं जानते और वस्त्र नहीं पहनते।' राजाके इन दोनोंकी इस प्रकारकी वितंडाका निषेध करने पर, परस्पर इस प्रकारकी प्रतिज्ञा निश्चित हुई-"पराजित होने पर श्वेतांबर तो दिगंबर हो जायंगे, और [उसके विरुद्ध] दिगंबर देशत्याग करेंगे।" प्रतिज्ञा निश्चित हो जाने पर स्वदेशके कलंकसे डरनेवाले देवाचार्यने, सर्वानुवादका परिहार करके और देशानुवादका अनुसरण करके, कुमुदचंद्रसे कहा कि-'पहले आप ही अपना पक्ष स्थापित करें।' उनके ऐसा कहने पर कुमुदचंद्रने राजाको पहले यह आशीर्वाद दिया- १५९. हे राजन् ! आपके यशके स्मरण होने पर सूर्य खद्योतकी चमक जैसा प्रतीत होता है, चन्द्रमा पुराने मकड़ीके जालकी भाँति फीका जान पड़ता है और (हिमाच्छादित) पर्वत मशकसे जान पड़ते हैं। आकाश उसमें भौरे जैसा हो जाती है और इसके बाद तो वाणी बन्द हो जाती है।
प्रकरण १०८-१०९ ] वादी श्रीदेवसूरिका चरित्रवर्णन [ ८१ उसके इस अपशब्दको सुन कर कि 'वाणी बंद हो जाती है'-सभ्य लोग उसे अपने ही हाथों बंधा समझ कर बड़े प्रसन्न हुए। इसके बाद देवाचार्यने राजाको, यह आशीर्वाद दिया- १६०. हे चालुक्य महाराज! तुम्हारा यह राज्य और यह जिनशासन चिरकाल तक प्रवर्तित रहे। (राज्यपक्षमें पहला अर्थ-) जो राज्य शत्रुओंको शान्ति नहीं प्राप्त करने देता है, उज्ज्वल आकाशकी-सी उल्लसित कीर्तिकी प्रभासे जो मनोहर हो रहा है, न्यायमार्गके प्रसारकी पद्धतियोंका जो गृह बना हुआ है और जिसमें परपक्षके हाथियोंका सदैव मद उतारनेवाले ऐसे कौन हाथी बलवान् नहीं है। (जिनशासनपक्षमें दूसरा अर्थ-) जो जिनशासन नारियों (स्त्रियों) को मुक्तिपद प्रदान करता है, श्वेतवस्त्रोंको धारण करनेवाले यतियोंकी उल्लसित कीर्तिसे मनोहर लग रहा है, नय मार्ग (जैन तत्त्व पद्धति) के विविध प्रस्तार और भङ्गियोंका गृहरूप है और जिसमें अन्य मतवादियोंके गर्वका जय करनेवाले केवलज्ञानी कभी भी भोजन नहीं करते ऐसा विधान नहीं है-यह जिनशासन चिरंजीव रहो। इसके बाद, वादी कुमुदचंद्रने केवलि-मुक्ति, स्त्री-मुक्ति और चीवर-सिद्धिके निराकरण रूप अपने पक्षके उपन्यासमें, कबूतर पक्षीकी भाँति मन्द मन्द और बार बार स्खलित वाणीसे बोलना शुरू किया। उसे देख कर सभ्यलोग, ऊपरसे तो उसे उत्साहपरक वचन कह रहे थे और अन्दर दिलमें हंस रहे थे। इस प्रकार कितनाक उपन्यास (स्वपक्ष स्थापन) करनेके बाद, अन्तमें [देवाचार्यको लक्ष्य करके कहा कि] 'अब आप बोलिये'। देवाचार्यने प्रलय कालमें उन्मीलित प्रचण्ड पवनसे विक्षुब्ध समुद्रके तरङ्गावातके समान गंभीर वाणीसे, उत्तराध्ययन सूत्रकी वृहद्वृत्तिमें कथन किये हुए चौरासी विकल्पोंका उपन्यास करना प्रारंभ किया। इसे देख कर, भास्वत् प्रकाशके प्रसारसे म्लान हो जाने वाले कुमुद-रात्रिविकासी कमल-की भाँति निष्प्रभ हृदय कुमुदचंद्रने भयसे चित्तमें भ्रान्त हो कर, उन बातको समझनेमें असमर्थ बन कर, फिरसे उसी उपन्यासके दुहरानेकी प्रार्थना की। श्रीसिद्धराजके तथा और सभ्योंके निषेध करने पर भी, उन्होंने उसे अप्रमेय प्रमेय लहरियोंके द्वारा प्रमाण-समुद्रमें डुबोना शुरू किया। इस तरह निरन्तर वाक्प्रवाह चलने पर, सोलहवें दिन अकस्मात् देवाचार्यका कण्ठ रुद्ध हो गया। तब मंत्रशास्त्रविद् श्री यशोभद्रसूरिने, जिन्होंने कुरु कुल्लादेवीके मंदिरमें अतुलनीय वर प्राप्त किया हुआ था, उनकी कण्ठनाडीसे क्षणभरमें क्षपणक (दिगंबर)के किये गये अभिचारके प्रभावसे पड़ा हुआ केशोंका गुच्छा बाहर निकाल दिया। इस विचित्र व्यापारके निरीक्षणसे चतुर लोगोंने श्री यशोभद्रसूरिकी भूरि प्रशंसा की और कुमुदचंद्र की खूब निंदा की। इस प्रकार (पहलेने) प्रमोद और (दूसरेने) विषाद् धारण किया। इसके बाद, देवसूरिने पक्षके उपन्यासके उपक्रममें 'फोटारोटि' शब्द कहा। कुमुदचंद्रने उस शब्दकी व्युत्पत्ति पूछी। तब काकल पंडित ने, जिसके कण्ठमें आठों व्याकरण घोट रहे थे, शाकटायन व्याकरणमें कहे हुए 'टाप् टीप्' सूत्रसे निष्पन्न 'फोटारोटिः' 'फोटीफोटिः' 'फोटिरोटिः' इन तीनों सिद्ध शब्दोंका निर्णय सुनाया। पहले-ही-मे 'वाचस्ततो मुद्रिता' इस कहे हुए अपशब्दके प्रभावसे उसका मुख मुद्रित (बन्द) हो गया; और फिर स्वयं ही बोला कि-'मैं श्री देवाचार्यसे जीता गया'। श्रीसिद्धराजने उसे पराजित कह कर अपद्वारसे बाहर कर दिया। इस पराभवके कारण उसका सिर फट गया और वह मर गया। इसके अनन्तर श्रीसिद्धराजने आनन्द उल्लसित मनसे देवाचार्यके प्रभावकी ख्याति करनेकी इच्छा की। उनके सिर पर चार श्वेतच्छत्र धारण करवाये गये, खूब सुंदर चामर ढलाये गये, शंखोंके युगल २१-२२
८२ ] प्रबन्धचिन्तामणि [ तृतीय प्रकाश बजाये गये, डंकोंकी चोटसे मानों आकाशका पेट गुड़गुड़ा रहा था और उत्तम प्रकारकी दुंदुभियोंके नादसे दिगंतराल भरा जा रहा था। राजाने स्वयं अपने हाथका अवलंबन दे कर, 'हे वादि चक्रवर्ती, पधारिये !' ऐसी स्तुतिपूर्वक उन्हें राजसभासे प्रस्थान करवाया। वाहड नामक उपासकने उस समय तीन लाख [द्रम्म] याचकोंको दान किये। इस तरह जगत्के आनंद स्वरूप कन्द (मूल) के कन्दल (अंकुर) समान मंगलके वारंवार उच्चारित होने पर, उसी वाहड द्वारा बनवाये गये श्रीमहावीर देवके प्रासाद (मन्दिर) में, देवको नमस्कार करने बाद, उसीकी वसति (उपाश्रय) में जा कर उन्होंने आश्रय लिया। सूरिकी अनिच्छा होने पर भी राजाने उनको पारितोषिकके रूपमें छाला आदि बारह गांव भेंट दिये। [भिन्न भिन्न समर्थ आचार्यों द्वारा की गई ] उनकी स्तुतिके कुछ श्लोक इस प्रकार हैं- १६१. जिनके प्रसाद-ही-का मानों सुखप्रश्वके समय दर्शन (श्वेतांबर संप्रदाय) उच्चारण करता है, उन वस्त्रप्रतिष्ठाचार्य श्रीदेवसूरिको नमस्कार है। -इस प्रकार श्रीप्रद्युम्नाचार्यने कहा। १६२. यदि सूर्यके समान देवाचार्य, कुमुदचंद्रको न जीत पाते तो कौन श्वेतांबर, संसारमें कटिमें वस्त्र पहनने पाता ।- इस प्रकार हेमाचार्यने कहा। १६३. जिस नग्नने कीर्तिरूपी कंथा उपार्जन करके अपना व्रतभंग किया था, देवसूरिने उस कंथाको छीन कर उसे निर्ग्रन्थ (नंगा) कर दिया। - इस प्रकार श्री उदयप्रभ देवने कहा। १६४. अभी तक भी जिन्होंने खेल-शालाका त्याग नहीं किया उन देवसूरि (बृहस्पति) के साथ, वादविद्याको जानने वाले प्रभु देवसूरिकी, तुलना कैसे की जाय।- इस प्रकार श्री मुनिदेवाचार्यने कहा। १६५. जिनकी प्रतिभाके घाम-तेजसे [त्रस्त हो कर] कीर्तिरूपी योगवस्त्रका त्याग कर देने वाले [उस] नग्न [दिगंबर] को भारती ने मानों लाजके कारण छोड़ दिया, वह देवसूरि तुम्हारा कल्याण करें। १६६. अशेष केषोलियोंकी मुक्ति स्थापन कर जो सत्राकार बने तथा स्त्रियोंकी मुक्तिके युक्त उत्तर द्वारा मोक्ष तीर्थ बने, और नग्नको जीत लेने पर श्वेताम्बरशासनके प्रतिष्ठागुरु बने, उन प्रभु श्री देवसूरिकी महिमा, देवता और गुरुकी अपेक्षा भी अपरिमित है।- इस प्रकार दो श्लोक श्री मेरुतुंगसूरिने कहे। इस प्रकार यह देवसूरिका प्रबन्ध समाप्त हुआ। * पत्तनके वसाहू आभडका वृत्तान्त । ११०) इसके बाद, पत्तनका रहने वाला, जिसका वंश विलुप्त हो गया है ऐसा, आभड नामक एक वणिकपुत्र कंसारेकी दुकान पर, गागर घिसनेका काम, किये करता था। उसको वहा रोज पाँच विशोपकका उपार्जन होता था। वह अपना सारा दिन उस काममें व्यतीत कर, दोनों शाम प्रभु श्री हेम सूरिके चरणोंके पास बैठ कर प्रतिक्रमण किये करता था। स्वभाव-ही-से चतुर होनेके कारण उसने अगस्त्य और बौद्ध मत आदिके
- रत्न परीक्षा के ग्रंथोंको पढ़ डाला और रत्नपरीक्षकोंके निकट रह कर उस परीक्षामें दक्ष हो गया। किसी समय, श्री हेमचंद्र मुनीन्द्रके निकट उसने, धनाभावके कारण, स्वल्प प्रमाणमें परिग्रह-परिमाण व्रतका नियम लेना चाहा। सामुद्रिक विद्याके जानकार प्रभुने मणिबंधमें उसके भाग्य वैभवका खूब प्रसार होना जान कर, तीन लाख द्रम्मसे अधिक द्रव्य न रखनेका उसे नियम कराया। इसके बाद, संतोष पूर्वक वह अपना व्यवहार
प्रकरण ११०-१११ ] पत्तनके वसाहू आभडका वृत्तान्त । [ ८३ करने लगा। किसी अवसर पर, वह किसी गाँवको जा रहा था, तो उसने रास्तेमें बकरियोंका एक झुंड जाते देखा। उसमें एक बकरेके गलेमें पाषाणका एक खण्ड बन्धा देखा, जिसको रत्नपरीक्षक होनेके कारण, परीक्षा करके देखा तो वह सच्चा रत्न मालूम दिया। फिर उस रत्नके लोभसे, मूल्य दे कर उस बकरीको उसने खरीद लिया। मणिकार (मणियारे) के पाससे उस रत्नको सान पर चढ़वा कर उसे देदीप्यमान बनवाया और फिर श्रीसिद्धराजके मुकुट बनानेके अवसर पर, एक लाख मूल्य पर राजा-जीको दे दिया। उसी मूल धनसे उसने एक वार बिकनेको आये हुए मञ्जिष्ठाके कई बोरे खरीदे और जब बेचनेके समय उन्हें खोलकर देखा तो समुद्रके चोरोंसे छिपानेके लिए, व्यापारियोंने उनमें सोनेकी पट्टियाँ छिपा रखी हुई मालूम दीं। फिर उसने सब बोरे खोल कर उनमेंसे वे पट्टियाँ निकाल लीं। इस तरह फिर वह सारे नगरमें मुख्य ऐसा सिद्धराजका मान्य (नगर सेठ) और जिन-धर्मकी प्रभावना करने वाला [ प्रसिद्ध ] श्रावक हुआ। प्रति दिन, प्रति वर्ष, स्वेच्छा- नुसार जैन मुनियोंको अन्न वस्त्र आदि दिया करता और गुप्तरूपसे स्वदेश और विदेशमें नये नये धर्मस्थान बन- वाता तथा पुराने धर्मस्थानोंका जीर्णोद्धार करवाता रहा। पर किसी पर उसने अपनी प्रशस्ति नहीं लिखवाई। [ कहा भी है कि ]- १६७. लतासे आच्छन्न वृक्षकी नाईं और मृत्तिकासे आच्छादित बीजकी नाईं प्रच्छन्न (गुप्तरूपसे) किया हुआ सुकृत कर्म प्रायः सैंकडों शाखाओंवाला विस्तृत हो जाता है। इस प्रकार यह वसाहू आभडका प्रबन्ध समाप्त हुआ। * सिद्धराजकी तत्त्वजिज्ञासा और सर्वदर्शन प्रति समानदृष्टि। १११) एक दूसरी बार, श्री सिद्धराज संसार सागरको पार करनेकी इच्छासे, सर्व देशके सर्व दर्शनोंमेंसे, प्रत्येकसे देवतत्त्व, धर्मतत्त्व, और पात्रतत्त्वकी जिज्ञासासे पूछने लगा, तो मालूम हुआ कि, ये प्रत्येक अपनी स्तुति और दूसरेकी निंदा कर रहे हैं। इससे उसका मन [खूब] संदेह-दोलाढूढ हो गया। श्रीहेमाचार्यको बुला कर उनसे विचारणीय कार्यको पूँछा। आचार्यने चतुर्दश विद्याओंके रहस्यका विचार करके, इस प्रकार एक पौराणिक निर्णय कह सुनाया कि-'पहिले ज़मानेमें किसी व्यवहारी [गृहस्थ] ने अपनी पहली परिणीत पत्नीको छोड़ कर किसी रखेलिनको अपना सर्वस्व दे दिया। इससे उसकी पूर्व पत्नी, सर्वदा ही, उसको अपने वशमें करनेके लिये अभिचार (मंत्र-तंत्र आदि) के उपाय पूछा करती। किसी गौड (बंगाल) देशीय [जादूगर] ने बताया कि-"तुम्हारे पतिको मैं ऐसा कर दूँ कि तुम उसे फिर रस्सीमें बाँधे रखो" ऐसा कह कर, उसने कोई एक ऐसी अचिन्त्यवीर्य ओषधि ला दी और कहा कि-"इसे भोजनमें खिला देना"। ऐसा कह कर वह चला गया। कुछ दिनोंके बाद जब क्षयाह (श्राद्धका दिन) आया तो उस स्त्रीने वैसा ही किया-पतिको वह ओषधि खिला दी। फलस्वरूप वह (पति) साक्षात् बैल हो गया। उसका फिर कोई प्रतीकार न जान कर वह, सारी दुनियाकी झिड़कियाँ सहती हुई, अपने दुश्चरितके ऊपर शोक करने लगी। एक बार [ग्रीष्म कालके] दोपहरके समय, सूर्यके कठोर किरणोंसे खूब संतप्त हो कर भी, किसी शाद्वल भूमिमें वह अपने उस पशुरूप पतिको चरा रही थी और किसी वृक्षके नीचे बैठ कर खूब निर्भर भारसे विलाप कर रही थी। अकस्मात् उसने आकाशमें कुछ आलाप सुना। पशुपति (शिव) भवानीके साथ विमानमें बैठे हुए उस समय यहाँसे निकले। भवानीने उसके दुःखका कारण पूछा। इस पर शिवने वह वृत्तांत ज्यों का त्यों कह सुनाया। फिर भवानीके आग्रह करने पर शिवने यह भी बताया कि, उसी वृक्षकी छाया में, पुरुष बननेकी ओषधि है;
८४ ] प्रबन्धचिन्तामणि [ तृतीय प्रकाश और वे अन्तर्धान हो गये । फिर वह भी उस वृक्षकी छायाको रेखांकित करके, उसके भीतर पड़ने वाली [ सभी ] ओषधियोंके अंकुरोंको उखाड़ उखाड़ कर वृषभके मुँहमें डालने लगी । उस अज्ञात स्वरूप ओषधिके मुँहमें पड़ते ही वह बैल फिर मनुष्य हो गया । अज्ञात स्वरूप हो कर भी, ओषधिने जैसे अभीष्ट कार्य किया, वैसे ही कलियुगमें मोहके कारण, बहु पात्र-परिज्ञान तिरोहित होने पर भी, भक्तियुक्त हो कर सब दर्शनोंका आराधन करनेसे, अविदित स्वरूप-ही-से मुक्तिदायक हो जाता है, यह निश्चय है । इस प्रकार श्रीहेमचंद्राचार्यने जब सर्व दर्शनके सम्मत होनेका उपदेश दिया तो श्री सिद्धराजने फिर सब धर्मोंका समान आराधन किया । इस प्रकार यह सर्व दर्शन मान्यता प्रबंध समाप्त हुआ । * सिद्धराजका प्रजाजनोंके साथ उदार व्यवहार । ११२) एक दूसरी बार रातमें, राजा कर्ण मेरु प्रसादमें नाटक देख रहा था । वहाँ पर कोई चना बेचने वाला एक गरीब बनिया भी चला आया और वह राजाके कन्धे पर हाथ रख कर देखने लगा । राजा उसके इस अभिनव ( व्यवहार ) से मनमें प्रसन्न हो रहा, और बार बार उसका दिया हुआ कर्पूर मिश्रित पानका बीड़ा आनंदके साथ लेता रहा । नाटकके विसर्जन होने पर, राजाने अनुचरोंके द्वारा उसका घर आदि अच्छी तरह जान लिया और फिर अपने महलमें आ कर सो गया । सबेरे उठ कर प्रातःकृत्य कर लेने बाद, सर्वावसर ( राजसभा ) के मिलने पर, राजाने सभामंडपको अलंकृत किया और उस चना बेचने वाले बनियेको बुलाया । राजाने उससे [ व्यंगमें ] कहा कि- 'रातमें तुमने जो मेरे कन्धे पर हाथ रखा था उससे मेरी गर्दनमें दर्द हो रहा है' -तो उस तत्कालोत्पन्न मति वाले (हाजिर जवाब ) बनियेने कहा कि- 'महाराज ! आसमुद्र विस्तृत ऐसी पृथ्वीके भारको कन्धे पर उठा रखनेसे यदि स्वामीके कन्धेमें कोई पीड़ा नहीं होती तो मुझ समान तृण-मात्रसे निर्जीव बनियेके भारसे स्वामीके कन्धोंमें क्या पीड़ा होगी !' उसके इस उचित उत्तरको सुन कर राजा बड़ा प्रसन्न हुआ और बदलेमें उसको इनाम दे कर विदा किया । इस तरह यह चना बेचनेवाले बनियेका प्रबंध समाप्त हुआ । * लक्षाधिपतिको क्रोडपति बना देना । ११३) एक दूसरी रातको, राजा कर्ण मेरु प्रासादसे नाटक देख कर लौट रहा था, तब [ राजमार्गमें ] किसी व्यवहारीके घर पर बहुत-से दीपक जलते हुए देख कर पूछा कि- 'यह क्या है ?' उसने कहा कि ये लक्षप्रदीप हैं । राजाने उसको धन्य कहा और वह अपने महलमें चला गया । रात्रिको व्यतीत कर [ अपने नगरमें ऐसे प्रजाजन है इस विचारसे ] अपनेको धन्य मानता हुआ, सबेरे उसे राजसभामें बुला कर आदेश किया कि- ' इन प्रदीपोंको सदा जलाते रहनेसे तुमको सदा ही अग्निका भय रहता है, तो कहो कि तुम्हारे पास कितने लाखका धन है'। उत्तरमें उसने निवेदन किया कि- 'वर्तमानमें चौरासी लाख है' । इस पर मनमें अनुकंपित हो कर राजाने कृपापूर्वक अपने खजानेसे १६ लाख निकाल कर दे दिया और उसके मकान पर [ दीपकोंके बदले ] कोटिपति होनेका सूचक कोटिध्वज फहराया गया । इस तरह यह पोटिललसप्रसाद प्रबंध समाप्त हुआ । *
प्रकरण, ११२-११६ ] सिंहपुरके ब्राह्मणोंका कर माफ करना । [ ८५ सिंहपुरके ब्राह्मणोंका कर माफ करना । ११४) एक दूसरी बार, राजाने वालक देशकी दुर्गभूमि ( पहाड़ी जमीन ) में सिंहपुर नामका प्रदेश ब्राह्मणोंको रहनेके लिये दे दिया और उसके अधीन १०६ ग्राम दान कर दिये । पर वहा पर सिंहका डर देख कर ब्राह्मणोंने सिद्धराज से प्रार्थना की कि, उन्हें कहीं देशके भीतर निवास दिया जाय । इस परसे राजाने उनको साभ्रमती के तीर परका आसात्रिली ग्राम दे दिया, और सिंहपुर से धान्य लानेमें जो आते जाते कर लगता था उसे माफ कर दिया गया । वाराहीके पटेलोंको त्रूचाका विरुद्ध देना । ११५) बादमें, राजा सिद्धराज ने किसी समय, मालव देश की यात्राके लिये प्रयाण किया । रास्तेमें वाराही ग्राम के पास जब वह आया तो उस गाँवके पटेलों (मुखियों) को बुला कर, उनकी चतुरताकी परीक्षाके लिये, अपनी एक प्रधान पालकी, उनको अपने पास थातीके रूपमें रखनेके लिये दी । राजाके आगे प्रयाण कर जाने पर उन सभीने मिल कर, उसके एक एक हिस्सेको अलग अलग कर, यथोचित रूपसे सबने अपने अपने घर पर संभालके रखा । यात्रासे लौटते समय राजाने अपनी रखी हुई उस थातीको जब उनसे माँगी, तो उन्होंने अलग अलग किये हुए उसके वे सब टुकडे लाके दिये । यह देख कर राजाने आश्चर्यसे पूछा कि- ' यह क्या बात है ?' तो उन्होंने विज्ञापना की कि- 'महाराज ! [ इनमेंसे ] कोई एक आदमी तो इसकी रक्षा करनेमें समर्थ नहीं हो सकता । कभी चौर और अग्नि आदिका उपद्रव हो जाय तो फिर स्वामीके सामने कौन जवाबदेह हो - यही सोच कर हम लोगोंने यह ऐसा किया है।' तब राजा मनमें खूब आश्चर्यचकित हुआ और उनको 'त्रूच *' ऐसा विरुद्ध उसने दिया । इस प्रकार यह वाराहीय त्रूच प्रबंध समाप्त हुआ । * उञ्झाके ग्रामीणोंसे वार्तालाप । ११६) इसके बाद, एक बार राजा श्री जय सिंह देव, मालव विजय करके लौट रहे थे तब रास्तेमें पडने वाले उञ्झा ग्राम में खीमे डाले गये । वहाके ग्रामीणोंने, जिनको राजा मामा कहा करता था, दूधसे भरे हुए हडों आदिके उचित सत्कारसे राजाको सन्तुष्ट किया । उसी रातको, राजा गुप्त वेष करके उनके दुख- सुख जाननेकी इच्छासे, किसी ग्रामीणके घर पर चला गया । वह (ग्रामीण) गाय दुहने आदिके कामोंमें व्यस्त होता हुआ भी, उसने पूछा कि- 'तुम कौन हो?' [इत्यादि। इसके उत्तरमें उसने] कहा कि- मै श्री सोमेश्वरका कार्पटिक (यात्री) हूं; महाराष्ट्र देश का रहने वाला हूं।' उसने फिर उससे महाराष्ट्र देश और उसके राजाके गुण-दोष आदि पूछे । उसने वहाके राजाके ९६ गुणोंकी प्रशंसा करते हुए, उस ग्रामीणसे गूर्जर देशके राजाके गुण-दोष पूछे । इस पर वह श्री सिद्धराज के प्रजा-पालन-दक्षत्व और सेवकों पर अनुपम प्रेम इत्यादि गुणोंका वर्णन करने लगा। तब बीचमें उसने राजाका कोई कृत्रिम दोष बताना चाहा, तो वह आँसू गिराता हुआ बोला कि- 'हम लोगोंके मंद भाग्यसे राजाको कोई पुत्र नहीं है और यही उसमें एक दोष है'। इस प्रकार निष्कपट भावसे उसने उससे सब कह कर उसे सतुष्ट किया । फिर प्रभात कालमें सब लोग मिल कर राजाके
- यह 'त्रूच' कोई देश्य शब्द है । हिंदीमें इसके जैसा बूचा शब्द है जिसका अर्थ ' कानकटा हुआ ' ऐसा होता है । इन पटेलोंने राजाकी पालकीके अंग-प्रत्यंग काट डाले थे इस लिए इनको 'त्रूचा' कहा गया प्रतीत होता है । गुजरातीमें त्रूचाका अर्थ भोला-मूर्ख ऐसा भी होता है । इससे राजाने उनके इस भोलेपनको देख कर उन्हें 'त्रूचा' ऐसा सम्भाषण किया हो ।
८६ ] प्रबन्धचिन्तामणि [ तृतीय प्रकाश दर्शनके लिये उत्कंठित हो कर उसके निवासस्थानमें गये और राजाको प्रणामादि करके उसके अनुपम ऐसे पलंग पर ही बैठ गये । आसन देनेके लिये नियुक्त नोकरोंने उनको अलग आसन पर बैठनेको कहा तो वे लोग अपने हाथोंसे उस पलंगकी कोमल शय्याका स्पर्श करते हुए [ भोले भावसे ] 'हम लोग यहाँ बड़े आरामसे बैठे हैं'-ऐसा कहते हुए वही बैठ रहे। [यह देख कर] राजाका मुख मुस्कराहटसे कमलकी भाँति खिल उठा । इस प्रकार उज्झावासी ग्रामीणोंका यह प्रबंध समाप्त हुआ ! * झाला सामंत माँगूकी शूरताका वर्णन । ११०) किसी समय, झाला जाति का माहू नामक क्षत्रिय श्री सिद्धराज की सेवाके लिये सभामें आया करता था। वह रोज ही दो परांची (लोहेकी भारी कुसी) जमीनमें गाड़ कर बैठता और फिर उन दोनोंको उखाड़ कर उठता। उसके भोजनमें घीसे भरा एक कुतुप (कुडुवा-घी तेल भरनेका घडेके जैसा चमडेका भाजन ) खर्च होता था । घी लगी हुई उसकी दाढ़ीके धोने पर भी उसमें सोलहवाँ हिस्सा घी बच जाता था। किसी समय उसके शरीरमें रोग होने पर, पथ्यके लिये यवागू ( जौकी पतली माँड ) खानेको वैद्यने कहा तो, वह ५ माणक (करीब ४ शेर कच्चे नाप जितनी ) खा गया । इस पर वैद्यने डाँट कर कहा कि आधा भोजन कर लेने पर बीचमें अमृतोदक क्यों नही पिया ?' क्यों कि कहा है कि- १६८. जब तक सूर्योदय न हो जाय तब तक एक हजार घड़ा भी पानी पिया जा सकता है, पर जब सूर्योदय हो जाता है तो फिर एक बूँद भी एक घड़ेके बराबर हो जाता है। रातकी पिछली चार घड़ीमें, सूर्योदय न होने तक, जो जल पिया जाता है-जो जल प्रयोग किया जाता है-उसे वज्रोदक कहते हैं (वह अमृतोदक भी कहलाता है)। सूर्योदय हो जाने पर बिना अन्न खाये, जो पानी पिया जाता है, वह विष है। इस लिये एक बूँद भी वह पानी सौ घड़ोंके बराबर हो जाता है। आधा भोजन करने पर, बीचमें जो जल पिया जाता है वह अमृत कहलाता है, और भोजनान्तमें तत्काल पिया जाता हुआ जल छत्र या छत्रोदक कहलाता है। उस माँगूने, यह सुन कर कहा कि- 'यदि ऐसा है, तो पहिले जो अन्न खाया है उसे आधा आहार कल्पना कर लिया जाय, और इस समय अब पानी पी कर फिर उतना ही आहार और कर लूँ।' ऐसा कह कर वह फिर खानेकी तैयारी करने लगा, लेकिन वैद्यने उसे वैसा करनेसे रोक दिया। किसी समय राजाने उसके निःशस्त्र रहनेका कारण पूछा। उसने कहा कि-'मेरा हथियार तो समयोचित होता है'। फिर एक बार उसके स्नान करते समय, किसी महावत द्वारा चलाये हुए हाथीको अपने ऊपर आता देख, नजदीकमें रहे हुए कुत्तेको पकड कर उसकी सूंड पर फेंक मारा। मर्मस्थान पर चोट लगनेके कारण निपीडित ऐसे उस हाथी को खींचा, तो उसके अतुल बलसे वह हाथी भीतर-ही-भीतर नसोंमेंसे टूट गया और उस महावतके नीचे उतरने पर, वह जमीन पर गिरते ही प्राणोंसे मुक्त हो गया। गुर्जर देश पर आयी हुई म्लेच्छोंकी सेनाको देख कर राजाके पलायन कर जाने पर, वह अपनी इच्छासे उस सेनाका उच्छेद करता हुआ, युद्धमें जिस स्थान पर मारा गया, उस जगहकी, पत्तन में अब भी 'माहूस्यगण्डिल' के नामसे प्रसिद्धि चल आ रही है। इस प्रकार यह माँगू प्रबंध समाप्त हुआ।
प्रकरण ११७-११९ ] सिद्धराजकी सभामें म्लेच्छराजके दूतोंका आगमन ! [ ८७ सिद्धराजकी सभामें म्लेच्छराजके दूतोंका आगमन । ११८) एक दूसरी बार, म्लेच्छराजके प्रधानोंके आने पर, मध्यदेशसे आये हुए वेपारियोंको बुला कर कुछ रहस्य दिखलानेका आदेश दे कर विसर्जित किया । इसके बाद दूसरे दिन, सायंकाल, प्रलय कालके समान प्रचण्ड पवनके आने पर, राजा सुधर्मा सभाके समान राजसभामें सिंहासन पर बैठ कर जो देखता है, तो अन्तरिक्षसे दो राक्षस उतर रहे हैं—जिनके मस्तक पर सोनेकी दो ईंटें रखी हुई हैं और जो सुवर्ण जैसी कान्ति धारण कर रहे हैं। उन्हें देख कर सारी सभा भयसे भ्रात हो उठी । इसके बाद, उन्होंने राजाके चरणपीठ पर वह उपहार रख दिया और फिर पृथ्वीतल पर लुंठित होते हुए, प्रणाम करके कहा कि—‘आज लंकानगरीमें महाराजाधिराज विभीषणने देवपूजा करते समय राज्यस्थापनाचार्य रघुकुल-तिलक श्री रामचन्द्रके उत्तम गुणग्रामोंको स्मरण करते हुए, ज्ञानमय दृष्टिसे जाना कि—आजकल उनके स्वामी (रामचन्द्र) चौलुक्यकुल तिलक श्री सिद्धराज के रूपमें अवतीर्ण हुए हैं। इस लिये उन्होंने यह (सन्देश) कह कर हम दोनोंको भेजा है कि—‘मैं प्रभुको प्रणाम करनेके लिये अत्यन्त उत्कण्ठित मनवाला हो रहा हूँ, सो क्या मैं ही यहाँ प्रणाम करनेको उपस्थित होऊँ या प्रभु ही यहाँ आ कर मुझे अनुगृहीत करेंगे ?—इसका निर्णय महाराज स्वयं अपने श्रीमुखसे करें ।' उनकी यह बात सुन कर, राजाने मन-ही-मन कुछ सोच कर उनसे इस प्रकार कहा—‘प्रफुल्ल आनंद लहरीसे प्रेरित हो कर मैं ही खुद अपने अनुकूल समय पर, विभीषणसे मिलने आ जाऊँगा ।’ ऐसा कह कर, अपने कण्ठका शृंगारभूत ऐसा एकावली हार उनको प्रत्युपहारके रूपमें दे दिया । जाते समय ‘प्रभुके अन्य दूत पठानेके अवसर पर, हमें भुला न दें' इस प्रकारकी विशेष विज्ञप्ति करके अन्तरिक्ष मार्गसे वे दोनों राक्षस तिरोहित हो गये । उसी समय वे म्लेच्छोंके प्रधान पुरुष बुलाये गये तो, भयभीत हो कर अपना पौरुष छोड़, राजाके सामने आ कर उपस्थित हुए और भक्तियुक्त वचन कह कर राजाको खुश करने लगे । राजाने फिर उनके राजाके लिये उचित भेट दे कर उनको विदा किया । इस प्रकार यह म्लेच्छागमननिषेध प्रबंध समाप्त हुआ । * सिद्धराजका कोल्हापुरके राजाको चमत्कारके भ्रममें डालना । ११९) बादमें, किसी समय, कोल्हापुर नगरके राजाकी सभामें बन्दियोंने श्री सिद्धराज की कीर्तिका गान किया। उस राजाने कहा कि—‘सिद्धराज को हम ऐसा तब मानेंगे जब हमें भी कोई यह प्रत्यक्ष चम- त्कार दिखायेगा ।' राजाके इस कथनसे पराभूत हो कर, उन्होंने सिद्धराज को यह वृत्तांत कह सुनाया। इस पर राजाने जब सभामें नजर फिराई तो उसके मनकी बात समझने वाले किसी सेउरूने हाथ जोड़ कर अपना अभिप्राय प्रकट किया । राजाने उसे एकान्तमें बुला कर उसका कारण पूछा । उसने राजाके आशयको कह बतलाया और विशेषमें कहा कि-‘तीन लाखके व्ययसे यह काम सिद्ध होने योग्य है ।' फिर उसी समय, ज्योतिषीके बताये हुए मुहूर्तमें राजासे तीन लाख ले कर, वह व्यापारी बनिया बन कर सब प्रकारके मालका संग्रह करके, सिद्धके संकेत चिह्न वाली रत्न जड़ी हुई दो सोनेकी खड़ाऊँ, एक अतुलनीय योगदण्ड, दो मणिके बने हुए कुण्डल, उसी प्रकारके योगका सूचक योगपट्ट, तथा सूर्यकी किरणोंके जैसा चमकदार एक चन्द्रातक उसने साथमें लिया, और रास्ता तै करके कुछ दिनोंमें वहाँ (कोल्हापुर) जा कर डेरा डाला। समीपस्थ दीपावलीकी रातको, उस नगरके राजाकी रानियाँ महालक्ष्मी देवीकी पूजाके लिए आकुल-व्याकुल हो कर देवीके मन्दिरमें जब आईं, तो वह बना हुआ सिद्ध पुरुष, उसी सिद्धवेषमें अदृश्य हो कर और खूब अच्छी तरह कूदना सीखे हुए किसी बर्बर जातिके
८८ ] प्रबन्धचिन्तामणि [ तृतीय प्रकाश मनुष्योंको साथ ले कर, अकस्मात् उस देवीके मंदिरमें प्रादुर्भूत हुआ । उसने देवीकी रत्न, सुवर्ण और कर्पूरसे पूजा अर्ची की और उस राजाकी रानियोंको उसी प्रकारके उत्तम पानके बींड़े दिये । फिर श्री सिद्धराज का नामाङ्कित वह सिद्धदेव पूजाके बहाने वहीं रख कर, उसी बर्बरके कंधेपर चढ़कर, उड़ता हुआसा जैसे आया था वैसे ही चला गया । रातके अन्तमें रानियोंने उस तिरोवी राजाको यह वृत्तान्त कह सुनाया तो, भयभ्रान्त हो कर उसने, उस उपहारको, अपने प्रधान पुरुषोंके द्वारा सिद्धराज के पास पहुँचा दिया । इधर उस सेवकने अपने मालके क्रय-विक्रयका सङ्कोच करके शीघ्रगामी पुरुषके साथ यह खबर भिजवा दी कि-' जब तक मैं न आऊँ तब तक इन प्रधान पुरुषोंको दर्शन न दीजियेगा ।' फिर स्वयं जल्दी जल्दी चल कर कुछ ही दिनोंमें वहाँ पहुँच गया । उसके अपने कियेका पूरा वर्णन करने पर, राजाने उन प्रधानोंका यथोचित स्वागतादि किया । इस प्रकार यह कोल्हापुर प्रबंध समाप्त हुआ । * कौतुकी सीलणकी वाक्चातुरी । १२० ) श्री सिद्धराज, मालवमंडल से यशोवर्मा राजाको जब बाँध लाया, तब उसके निमित्त किये जाने वाले उत्सव पर सीलण नामक कौतुकीने कहा कि-' अहो बेडा ( नाव ) में समुद्र डूब गया ।' तब उसके पीछे स्थित किसी गायन ( गान करनेवाले ) ने ' तुम अपशब्द कह रहे हो '-ऐसा कह कर उसकी तर्जना की । तब उसने अर्थापत्तिसे इस प्रकार विरोधाऽलङ्कारका परिहार करके बताया कि-'बेटाके समान इस गूर्जर भूमिमें समुद्र जैसा यह मालव-नरेश डूब गया।' [इस पर उसने] राजासे सोनेकी जीभ प्राप्त की । इस प्रकार यह कौतुकी सीलणका प्रबंध समाप्त हुआ । * काशीपति जयचन्द्रकी सभामें सिद्धराजके दूतकी वाक्पटुता १२१) किसी समय, सिद्धराज के एक वाचाल सान्धिविग्रहिक (दूत) से काशी के राजा जय चंद्र ने अणहिल्लपुर के प्रासाद, प्रपा (बावड़ी) और निपान (कूप) आदिका स्वरूप पूछते समय [उसकी विशेष शोभा सुन कर, ईर्ष्यावश राजाने] यह दोष बताया कि-'सहस्रलिंग सरोवर का जल शिव-निर्माल्य होनेके कारण अस्पृश्य है। उसका सेवन करने वाले दोनों लोकसे विरुद्ध व्यवहार करते हैं । अतः वहाँके लोग, उदित प्रभाव वाले कैसे हों ? सिद्धराज ने सहस्रलिंग सरोवर बना कर यह अनुचित कार्य किया है।' राजाकी इस बातसे मन-ही-मन कुपित हो कर उसने राजासे पूछा कि-[आपकी] 'इस वाराणसी में कहाँका जल पिया जाता है ?' राजाके 'गंगाजल' ऐसा कहने पर उसने कहा-'क्या गंगाजल शिव निर्माल्य नहीं है तो और क्या है ? शिवका सिर ही तो गंगाकी निवास-भूमि है।' इस प्रकार जयचंद्र राजाके साथ गूर्जरके प्रधानकी उक्तिप्रत्युक्तिका प्रबंध समाप्त हुआ । * मयणल्लादेवीके पिताकी मृत्युवार्त्ता । १२२) किसी समय, कर्णाट देश से आये हुए सन्धिविग्रहिकसे मयणल्लादेवी ने अपने पिता जयकेशी का कुशल समाचार पूछा तो उसने अश्रुपूर्ण आँखोंसे कहा कि-' स्वामिनि, प्रख्यातनामा महाराज श्री जयकेशी भोजनके समय पिंजरेमे तोतेको युठा रहे थे। उसके 'मार्जार' (बिल्ली) बैठी है, ऐसा कहने पर, राजाने चारों ओर देख कर-किंतु अपने भोजनके पात्रके [चौकीके] नीचे छिपे हुए मार्जारको न देख कर-
प्रकरण १२३-१२५ ] पिताके पुण्यार्थ मयणल्लादेवीका सोमेश्वरीकी यात्रा करना । [ ८९ प्रतिज्ञा पूर्वक बोल उठे कि-'यदि बिल्लीके हाथ तुम्हारी मृत्यु होगी तो मैं भी तुम्हारे ही साथ मरूंगा'। वह तोता ज्यों ही पिंजडेसे उड़ कर उस सोनेके थाल पर आ कर बैठा त्यों ही उस बिल्लीने [लपक कर] भेड़िये जैसे दाँतोंसे उसे मार डाला । राजाने उसे मरा देख कर भोजनका ग्रास छोड़ दिया, और उक्ति-प्रत्युक्ति जानने वाले राजपुरुषोंके [बहुत कुछ] निषेध करने पर भी कहा- १६९. राज्य चला जाय, श्री चली जाय, और क्षणभरमें प्राण भी भले ही चले जाँय, किन्तु जो बात मैने स्वयं कही है वह शाश्वती वाणी न जाय । इस प्रकार इष्ट देवताकी भाँति इसी वाणीका जाप करता हुआ, काष्ठकी चिता बनवा कर, उस तोतेको साथ ले, उसमें प्रवेश कर गया। इस वाक्यको सुन कर मयणल्लादेवी शोकसागरमें डूब गई। विद्वज्जनोंने विशेष प्रकारके धर्मोपदेशरूपी हस्तावलंबन दे कर उसका उद्धार किया। * पिताके पुण्यार्थ मयणल्लादेवीका सोमेश्वरकी यात्रा करना । १२३) बादमें, पिताके कल्याणार्थ श्री सोमे श्वर पत्तन की यात्राको वह गई, और वहाँ उस सतीने किसी त्रिवेदी ब्राह्मणको बुला कर उसे जलांजलि देना चाहा। उसने अंजलिमें जल ले कर कहा कि-'यदि तीन जन्मका पाप देना मंजूर करो तो मैं यह लूँगा, नहीं तो नहीं।' उसकी इस बातसे अत्यन्त सन्तुष्ट हो कर, हाथी, घोड़ा, सोना आदिके दानके साथ, उसे पापघटका दान किया। उसने वह सब अन्य ब्राह्मणोंको दे दिया। देवीके यह पूँछने पर कि 'ऐसा क्यों किया?'; बोला कि-'पूर्व जन्मकी पुण्य-वृद्धिके कारण तो आप इस जन्ममें राजरानी और राजमाता हुई हैं। और फिर इन लोकोत्तर दानोंके पुण्यसे भविष्य जन्म भी श्रेयस्कर ही होगा। यही सोच कर मैंने तीन जन्मका पाप ग्रहण किया है। आपने जो इस पापघटके दानका उपक्रम किया है, इसे तो कोई अधम ब्राह्मण ले कर खुदको और आपको भी भव-सागरमे डूबो दे। मैंने तो पहले ही सब धनका त्याग कर दिया है और फिर इस धनको ले कर भी दान कर दिया है, इस लिये जो मैने त्याग किया उससे आठ गुना अधिक श्रेयः संग्रह किया है। इस प्रकार यह पापघटका प्रबंध समाप्त हुआ । * सान्तू मंत्रीकी बुद्धिमत्ताका एक प्रसंग । १२४) किसी समय, मालव मण्डलसे विग्रह करके स्वदेशको लौटते समय सिद्धराज को मालूम हुआ कि [गुजरात और मालवेके मध्यमें बसनेवाले] अनुपम बलशाली भिल्लोंने उसका रास्ता घेर लिया है। सान्तूमन्त्री को [पत्तन में] इसके समाचार मिले, तो उसने प्रति ग्राम और प्रति नगरसे घोड़े इकट्ठे किये, और प्रत्येक बैलको भी पलानसे सज्ज करके बड़ा भारी दलबल इकट्ठा किया। फिर उस दलके बलसे भिल्लोंको त्रासित कर सिद्धराज को सुखपूर्वक स्वदेशमें ले आया। इस प्रकार सान्तू मंत्रीकी बुद्धिका यह प्रबंध समाप्त हुआ । * सिद्धराजके एक सेवकके भाग्यका वृत्तांत । १२५) किसी एक रातको दो बुद्धिमान भृत्य श्री सिद्धराज के पैर दबा रहे थे। उनमेंसे एकने, राजाको नीदके कारण आँखें बंद किया हुआ समझ कर, उसकी प्रशंसा करते कहा कि-'महाराज सिद्धराज कृपा और कोपमें [एकसे] समर्थ, सेवकोंके लिये कल्पवृक्ष और राजोचित सभी गुणोंके आढ्य हैं। दूसरेने, राजाके इस २३-२४
९० ] प्रबन्धचिन्तामणि [ तृतीय प्रकाश महान् राज्यका कारण भी प्राक्तन कर्म को बता कर [कर्म ही की] प्रशंसा की। राजाने इस वृत्तान्तको सुन कर कर्मकी प्रशंसाको विफल करनेके विचारसे, प्रशंसा करनेवाले चाकरको एक दिन, उसे कुछ भी रहस्य न जता कर, यह प्रसाद-लेख दे कर महामन्त्री सान्तूके पास भेजा कि-'इस चाकरको एक सौ घोड़ेका सामन्त बना दिया जाय'। वह चाकर इस लेखको ले कर जब चंद्रशालाकी सीढ़ियोंसे नीचे उतर रहा था, तब पैर फिसल जानेसे गिर गया और उसका अंग भंग हो गया । उसीके पीछे चले आने वाले दूसरे चाकरने पूछा कि-'यह क्या बात है?' तो उसने अपनी बात बताई । वह तो फिर खाटमें बैठ कर अपने घर गया और उस दूसरे [अपने साथी] को वह राजाका लेख दे कर मंत्रीके पास जानेको कहा। मंत्रीने उस लेखमें की गई आज्ञानुसार उस चाकरको सौ घुड़सवारों वाला सामंतपद प्रदान किया । यह सब बात सुन कर राजाने भी कर्मको ही बलवान माना । १७०. न तो आकृति, न कुल, न शील, न विद्या और न मनुष्योंकी की हुई सेवा कुछ फल देती है। पूर्व जन्ममें तपस्यासे संचित किये हुए पुण्य कर्म ही मनुष्यको समय पा कर वृक्षोंकी तरह फल देते हैं। इस तरह यह षष्ठकर्म प्राधान्य-प्रबंध समाप्त हुआ। * सिद्धराजकी स्तुतिके कुछ फुटकर पद्य । १७१. तीन भुवनके बीचमें यह जेसल (जयसिंह-सिद्धराज) राजा [एक बड़ा] कूट बुरुड * है जिसने अनेक राजवंशोंका छेदन कर [अपना] एक छत्र [राज्य] बनाया है। इसकी जय हो । १७२. महालय, महा-यात्रा महास्थान और महासरोवर,$ जैसे सिद्धराजने किये वैसे किसीने नहीं किये। १७३. जिगीषु जन (एक अर्थ-गानेकी इच्छा रखने वाले; दूसरा अर्थ-विजयकी इच्छा रखने वाले) एक मात्राका भी अधिक होना सह नहीं सकते, मानों इसी लिये हे धरानाथ (पृथ्वीनाथ)! तुमने धारानाथ (धारानगरी के नाथ) को नष्ट किया है। [क्यों कि 'धरानाथ' की अपेक्षा 'धारानाथ' में एक मात्रा अधिक है] १७४. हे सरस्वती, मान छोड़ दो; हे गंगा, तुम भी अपने सोहागकी भंगीको छोड़ो; अरी यमुने, अब तेरी कुटिलता वृथा है; रे रेवा, तूं वेगको छोड़ दे; क्यों कि अब समुद्र, श्री सिद्धराजके कृपाणसे कटे हुए शत्रुस्कंधोंमेंसे उछलने वाली रक्तकी धारासे बनी हुई नदीरूपी नवीन स्त्रीसे रक्त (१ लाल वर्ण, २ अनुरक्त- प्रेमी) हो गया है। १७५. हे विजयी राजाओंमें सिंह (जयसिंह) महाराज, सचमुच ही तुम्हारे जय-यात्राके समय, हाथियोंके कारण जलाशयोंके सूख जानेकी चिंतासे; वीरोंके घावकी आकांक्षासे; तथा, अपने पतियोंके विनाशकी आशंकासे; क्रमशः मछली रोती है, मक्खी हँसती है, और स्त्रियाँ अशुभका ध्यान करती हैं।
- बुरुड या बरुड उस जातिका नाम है जो बाँसको चीर-छोल कर उससे टोकरी, करंडक और छाता आदि बनाये करते हैं। कहीं कहीं 'गछ' भी इनको कहा है। इस पद्यमें, राजवंश और छत्र ये शब्द श्लेषात्मक हैं। $ इस पद्यमें सिद्धराजके ४ महाकार्य बतलाये गये हैं-जिनमें महालयसे तो सिद्धपुरके रुद्रमहालयका सूचन होता है। महायात्रासे बहुत करके सोमेश्वर तीर्थकी की हुई बड़ी यात्राका सूचन होता है। किसीके ख्यालसे सिद्धराजने जो मालवे पर विजय प्राप्त किया था उस विजययात्राका इसमें सूचन किया गया है। महासरोवरसे पाटनके सहस्रलिंग सरोवरका निर्देश किया गया है। ४ थे महास्थानसे किस वस्तुका सूचन होता है यह ठीक साव नहीं होता। कहते हैं कि सिद्धराजने कई बड़े बड़े किले भी बनाये थे और कई बड़े स्थान भी बसाये थे। संभव है उन्हींमेंसे किसीकी कोई सूचन इसमें किया गया हो।
प्रकरण १२५ ] सिद्धराजकी स्तुतिके कुछ फुटकर पद्य । [ ९१ १७६. हे सिद्धराज, नत हो जाने पर तो तुमने आनाक भूपको अनेक लाखोंके साथ सपादलक्ष [ जैसा देश ] भी दे दिया और दृप्त ऐसे यशोवर्माके पास मालव ( मालवा देश; श्लेषार्थ मा=लक्ष्मीका ल्व= लेशमात्र ) का होना भी तुमने सहन नहीं किया । इत्यादि बहुतसी स्तुतियां और प्रबंध उसके बारेमें हैं जो [ ग्रन्थान्तरोंसे ] जानने योग्य हैं । सं० ११५० से ले कर [११९९ तक] ४९ वर्ष तक श्री सिद्धराज जयसिंह देव ने राज्य किया। * इस प्रकार श्री मेरुतुङ्गाचार्यके बनाये हुए प्रबंध चिन्तामणिमें श्री कर्ण और श्री सिद्धराजका चरित्र वर्णन नामक यह तीसरा प्रकाश समाप्त हुआ । यहाँ पर P प्रतिमें निम्नलिखित श्लोक अधिक पाये जाते हैं। ये श्लोक सोमेश्वरदेव रचित कीर्ति- कौमुदीके हैं और इनमें संक्षेपमें सिद्धराज के जीवनके महत्त्वके सभी वीर कार्योंका सूचन किया गया है- [ १०६ ] जिसने, बालक होते हुए भी, इंद्रकी वीरवृत्तिको भी लांघ जाने वाले अपने कोपके प्रभावसे दुष्ट राजाओंको आज्ञाधीन बनाया । [ १०७ ] अपार पौरुषके उद्गारवाले सौराष्ट्रिय खंगारको भी, जिस गुरुमत्सरने युद्धमें इस प्रकार पीस डाला, जैसे सिंह हाथीको पीसता है। [ १०८ ] जिसने रामचंद्रकी तरह असंख्य घोड़ोंकी सेना ले कर और अनेक राजाओंको नष्ट करके ( रामके पक्षमें-पर्वतोंको उखाड कर ) सिन्धुपतिको (सिद्धराजके पक्षमें - सिन्धुराज नामका राजा, रामके पक्षमें सिन्धु=समुद्र ) बाँध लिया । [ १०९ ] मनमें अमर्ष करके विपक्षी य उर्वीभृत् (एक अर्थ-पर्वत, दूसरा - राजा) के उन्नत होने पर, जिसने अगस्त्य मुनिकी भाँति, शीघ्र ही अर्णोराज (एक अर्थ-समुद्र; दूसरा- शाकंभरी का चाहमान राजा ) को शुष्क कर डाला । [ ११० ] विष्णुने तो अर्णोराज ( समुद्र ) की पुत्री ले ली थी, किन्तु इसने तो अर्णोराजको अपनी पुत्री दे दी* । विष्णु और इस सिद्धराज में एक यही अंतर है। [ १११ ] शत्रुओंके कटे हुए सिर देख कर शाकंभरी के ईशने भी शंकित हो कर इसके चरणोंमें अपना सिर झुका दिया । [ ११२] स्वयं अत्यंत लक्ष्मीवान् और अपरमार (दूसरोंको न मारनेवाला) हो कर भी युद्धमें जिसने मालवस्वामी (एक अर्थ - मालव देशका राजा, दूसरा श्लेषार्थ - लक्ष्मीका किंचित् भोक्ता ) परमारको मार डाला। [ ११३] जिसने धारा-नरेश को राज-शुककी तरह काष्ठ-पञ्जर (काठके पिंजड़े) में रख कर अपनी कीर्तिरूपा राजहंसीको काष्ठा-पञ्जर (दिक्पंकवालं) में छोड़ दिया। [ ११४] जिसने नरवर्मा राजाकी तो केवल एक ही नगरी जो धारा थी वह ले ली, पर उसकी वधुओंको [बदलेमें] हजारों अश्रु-धारायें दे दीं ।
- शाकंभरी (अजमेर) के चाहमान राजा अर्णोराजको, जिसका देस्य नाम आनाक या आना था, सिद्धराजने युद्ध करके पहले तो अपना आज्ञाधीन राजा बनाया और फिर पीछेसे उसको अपनी पुत्री ब्याह दी थी। इसीका सूचन इस पद्यमें है।
९२ ] प्रबन्धचिन्तामणि [ तृतीय प्रकाश [११५] धारा-भंगके प्रसंगको देख कर, जिसके समीप आनेकी ही आशंकासे, प्रावृर्णकके बहाने जिसको महोदय राजने दण्ड दिया । [११६] जिस शत्रुने, अमृतकी भाँति, इसकी पृथ्वीके लेनेकी इच्छा की, उसीको तलवारसे उल्लसित इसके बाहुने राहु बना दिया ( अर्थात् राहुके समान उसे सिरकटा बना दिया ) । [११७] लोगोंने तो इसको कुमार ( कार्तिकेय ) की ही तरह शक्तिमान् अपना स्वामी माना था, लेकिन यह तो ताम्रचूडध्वज * था और वह केकिध्वज * था ( यही इनमें अंतर था ) । [११८] ऐसा कोई राजा नहीं था, जिसको विश्वके इस एकमात्र वीरने जीता न हो; और ऐसी कोई दिशा न थी जो इसके यशसे शोभित न हुई हो । [११९] गणेशकी तरह जिस अग्रपुष्कर और वृषस्थितिको, मोदककी तरह, गौड राजा † आभ्यैसार और करस्थ हो गया । [१२०] श्मशानमें बर्बर नामक राक्षसेन्द्रको बाँध करके राजाओंकी श्रेणीमें जो राजचंद्र सिद्धराज हो गया । [१२१] जिसने, लड़ाईसे उठी हुई धूलसे पहले जिस आकाशको मलिन कर दिया था, उसने पीछेसे उसी आकाशको अपनी कीर्तिलहरीसे धो कर उज्ज्वल कर दिया । [१२२] उस पृथ्वी मंडलके सूर्यके लोकान्तर होने पर चन्द्रसमान श्रीमान् राजा कुमारपालने प्रजाका रक्षण किया ।
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- था इस लिए यह ताम्रचूडध्वज कहलाता था। कुमार (कार्तिकेय) के ध्वजमें केकी अर्थात् मयूरका चिह्न था। मयूरकी अपेक्षा कुक्कुट अधिक बलवान् होता है, इस लिये कुमारसे भी अधिक सिद्धराजका शक्तिमान् होना इस पद्यमें ध्वनित किया गया है। १. गणेशके पक्षमें-आगे है हाथीकी सूंड जिसके; राजाके पक्षमें आगे है बाण जिसके। २ गणेशके पक्षमें-मूषकपर है स्थिति जिसकी; राजाके पक्षमें धर्मपर है स्थिति जिसकी। ३ मोदकके अर्थमें आग्र = घृतसारवाला, राजाके अर्थमें = युद्धसार वाला। ४ मोदकके अर्थमें कर = हाथमें रहा हुआ; राजाके अर्थमें कर = दण्ड देनेवाला। † गौड = बंग देशका राजा सिद्धराजको कर देने वाला बना यह अर्थ इस पद्यमें ध्वनित किया गया है।
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९. कुमारपालादि प्रबन्ध । कुमारपालके पूर्वजादि । १२६) अब परम आर्हत श्री कुमारपालका प्रबंध प्रारंभ किया जाता है-अणहिल्लपुर नगरमें जब कि महाराज बड़े भीमदेव राज्य-शासन कर रहे थे, उस समय श्री भीमेश्वरके नगरमें (अर्थात् पत्तनमें) बकुलादेवी १ नामकी एक वेश्या रहती थी जो नगर प्रसिद्ध रूप और गुणकी पात्र थी। कुलवधुओंसे भी उसकी अधिक शीलमर्यादा कही जाती थी । राजाने यह सुना तो उसकी परीक्षा लेनेके विचारसे उसे अपने अनुचरोंके द्वारा सवालाख कीमतकी एक कटारी, अपनी रक्षिता बनानेके इरादेसे, इनामके तौर पर भिजवाई। [कार्यान्तरकी] उत्सुकता वश राजाने उसी रातको बाहर जा कर प्रस्थान (यात्राके) लग्नको सिद्ध किया। विग्रह (युद्ध) के निमित्त दो वर्ष तक उसको मावलदेशमें रहना पड़ा। पर वह बकुलादेवी, उसके भेजे हुए उक्त इनामके अनुसार, अन्य सब पुरुषोंको छोड़ कर शील आचारका पालन करती रही । निस्सीम पराक्रमशाली भीमने तृतीय वर्षमें अपने स्थान पर आ कर जनपरंपरासे उसकी इस प्रवृत्तिको सुन कर उसे अपने अन्तःपुरमें दाखिल कर लिया । उसको एक पुत्र हुआ जिसका नाम हरिपालदेव था। उसका पुत्र त्रिभुवनपालदेव हुआ और उसका पुत्र श्री कुमारपालदेव । वह जब धर्मका जानने वाला न था तब भी कृपालु और परस्त्रियोंका भाई बना हुआ था। सिद्धराज से सामुद्रिक जानने वालोंने कहा था कि-'आपके बाद यही राजा होगा' । इससे वह उसे हीन जातीय मान कर, उसके प्रति असहिष्णु बन, सदा उसके विनाशका अवसर खोजा करता। वह कुमारपाल इस बातको कुछ कुछ समझ कर, राजासे मनमें शंकित बना हुआ, तापसवेष धारण कर, नाना प्रकारसे, देशान्तरोंमें भ्रमण करता रहा । कुछ साल इस तरह बिता कर फिर नगरमें आया और किसी मठमें ठहरा ।
- , ' सिद्धराजके भयसे कुमारपालका मारे मारे फिरना । १२७) इसके अनन्तर, श्री कर्णदेवके श्राद्धके अवसर पर श्रद्धालु सिद्धराजने सब तपस्वियोंको [भोजनके लिये] निमंत्रित किया । उनमेंसे प्रत्येकके पैर धोते समय, कुमारपाल नामक तपस्वीके भी कोमल चरणतलको हाथसे स्पर्श करता हुआ, उसमेंकी ऊर्ध्व रेखा आदि चिन्होंसे उसने जाना कि-'यही वह राजा होने योग्य है'-और इस लिये निश्छल दृष्टिसे उसे देखता रहा। उसकी इस चेष्टासे [अपने प्रति] उसे विरुद्ध समझ कर, उसी समय वेष बदल करके, कौवेकी भाँति, वह अदृश्य हो गया; और आलिंग नामक कुम्हारके घरमें जा छिपा। वहां मिट्टीके बर्तन पकानेके लिये आंवाँ बनाया जा रहा था, उसीमें कुम्हारने छिपा कर, पीछा करने वाले राजपुरुषोंसे उसे बचाया । फिर वहाँसे धीरे धीरे आगे चला तो, उसने खोजनेके लिये आये हुए राजपुरुषोंको सामने देखा । उससे त्रासित हो कर, नजदीकमें कोई दुर्गम ऐसी छिपने लायक भूमिको न पा कर किसीएक खेतमें जा खड़ा हुआ । वहाँ पर, खेतके रखवालोंने, खेतकी रक्षाके लिये कांटेदार वृक्षोंकी डाळियाँ काट कर जो इकट्ठी कर रखी थीं, उन्हींके बीचमें उसे छिपा दिया और वे अपनी जगह पर आ कर बैठ गये । १ इसके नाममें कुछ पाठभेद मिलता है-किसी प्रतिमें 'चउला देवी' ऐसा भी पढ़ा जाता है-परन्तु वह 'ब' और 'च'के बीचमें लिखने वालोंके भ्रमके कारण हुआ मालूम देता है । 'बकुलादेवी' का अपभ्रंश उच्चार 'बउलादेवी' होता है और 'ब' की जगह 'च' पढ़नेसे 'चउलादेवी' नाम बन गया मालूम देता है। अधिकतर प्रतियोंमें 'बकुलादेवी' नाम ही मिलता है और यही शुद्ध प्रतीत होता है ।
९४ ] प्रबन्धचिन्तामणि [ तृतीय प्रकाश राजाके आदमी पैरोंके चिह्नके अनुसार वहाँ पहुँचे, परंतु उसका वहाँ पाना असम्भव जान कर और भालेकी नोकको उसमें खोंच कर देखने पर भी कुछ न मालूम कर, वे वहाँसे वापस लौट गये । दूसरे दिन खेतवालोंने उस स्थानसे उसे बाहर निकाला । वह सबेरे ही यहाँसे आगे चलता हुआ एक वृक्षकी छायामें बैठ कर विश्राम लेने लगा, तो क्या देखता है कि, एक चूहा निभृतभावसे बिलमेंसे चाँदीका सिक्का बाहर ला कर रख रहा है । जब वह इस प्रकार इक्कीस सिक्के निकाल चुका, तो उनमेंसे फिर एक वापस उठा कर यह बिलमें ले गया। उसके बिलमें घुसने पर बाकीके सब सिक्के उठा कर कुमारपालने ले लिये और यह ज्यों ही एकान्तमें जा कर देखता है तो वह चूहा बाहर आ कर उन सिक्कोंको न पा कर वहीं छटपटा कर मर गया। कुमारपाल उसके शोकसे मनमें बड़ा व्याकुल हो कर चिरकाल तक परिताप करता रहा। फिर आगे चलते हुए रास्तेमें किसी [ धनी पुरुष ] की बहूने, जो ससुरालसे पीहर जा रही थी, देखा कि राहखर्चके अभावमें तीन दिनसे भूखे मरते उसका पेट फक पड़ गया है । उसने भाईकी तरह स्नेहसे कर्पूरकीसी सुगन्धिवाले चावलके करंबेसे उसको तृप्त किया । १२८) बादमें, विविध देशान्तरोंका भ्रमण करता हुआ, वह स्तम्भतीर्थ में मह० श्रीउदयन के पास कुछ मार्गखर्च माँगनेके लिये आया । यह सुन कर कि वह पौषधशालामें है, तो वह यहाँ आया । उसे देख कर उदयनने हेमचन्द्राचार्य से [ उसके बारेमें ] पूछा । उन्होंने कहा कि - इसके अगके लक्षण लोकोत्तर हैं । यह भविष्यमें चक्रवर्ती राजा होगा। आजन्म दरिद्रतासे सताये हुए उस क्षत्रियने जब इस बातको असम्भव कहा, तो उन्होंने यह लिख कर एक पत्रक मंत्रीको और एक उसको दिया कि - 'यदि सं० ११९९ कार्तिक वदि ( B P सुदि) २ रविवार हस्त नक्षत्रमें, आपका पट्टाभिषेक न हों तो, इसके बाद, १मैं शकुन देखना ही त्याग दूँगा।' फिर वह क्षत्रिय उनकी इस कला-कौशल वाली चातुरीसे मनमें चकित हो कर बोला कि- 'यदि यह बात सच हुई तो, आप ही राजा रहेंगे और मैं आपका चरणरेणु हो कर रहूँगा'- और इसकी प्रतिज्ञा की । श्री हेमाचार्य ने कहा कि-' नरकरूप अन्तिम फल देनेवाली राज्यलिप्सासे हमें कोई मतलब नहीं है । आप कृतज्ञ हो कर यह बात न भूलियेगा और जैन शासनका भक्त हो कर सदा रहियेगा।' इस अनुशासनको सिर माथे रख कर और आज्ञा ले कर फिर मंत्रीके साथ उसके घर गया । यहा स्नान, पान, भोजन आदिसे सत्कृत हो कर और राहखर्च पा कर, बिदा ले मालव देशमें आया । यहाँ कुण्डेश्वर प्रासादमें पट्टिका पर १७७. सम्वत् ११९९ का वर्ष पूर्ण होने पर, हे विक्रमादित्य, तुम्हारे ही समान एक कुमारपाल नामक राजा [जैन धर्मका पालन करने वाला ] होगा । इस प्रकारकी गाथा लिखी हुई देख कर मनमें बड़ा विस्मित हुआ। [इस समय] गूर्जराधिपति सिद्ध- राजका स्वर्गवास सुन कर वहाँसे लौटा । उसका सब खर्च समाप्त हो चुका था । उसी नगरमें, किसी बनियेकी दूकान पर [बिना कुछ दिये ] भोजन करनेके बाद उसको बदी किया गया । वह व्याकुल हो कर रोने लगा तो, फिर नगरके लोगोंके इकट्ठा होने पर दोनोंका मरण होगा यह जान कर उस बनियेने कहा कि-'मेरी बनावटी मूर्च्छा है इसे तुम दूर करनेका प्रयत्न करने लगो' उसके इस प्रकारके बुद्धिवैभवसे अपनेको प्रत्युज्जीवित मान- कर, कुमारपालने वैसा किया और उस उपायसे अपना कष्ट छुटा कर वह अणहिल्लपुर में रातके समय पहुँचा। पासमें कुछ न होनेके कारण कंदोईकी दूकान पर जा कर, उसका दिया हुआ कुछ खाया। बादमें अपने बहनोई राजकुल श्रा कान्हदेव के घर गया । जब कान्हदेव राजमंदिरसे आया तो उसे आगे आगे करके घरके भीतर ले गया। फिर अच्छा खाना आदि खा कर स्वस्थ हो कर सो गया । १ यहा पर यह क्या बात कही गई है सो ठीक समझमें नहीं आती । ग्रन्थकारका लेख बहुत अस्पष्ट और खंडित है ।
प्रकरण १२८-१३१ ] कुमारपालादि प्रबन्ध [ ९५ कुमारपालका राजगद्दीपर बैठना । १२९ ) प्रातःकाल वह बहनोई अपना सैन्य तैयार करके, उसके साथ, उसको राजाके महलमें ले आया। अभिषेककी परीक्षाके लिये पहले एक कुमारको पट्टे पर बैठाया । उसको चादरके आँचलोंको भी ठीक सम्भालते न देख फिर एक दूसरेको बैठाया । उसको हाथ जोड़ कर बैठा हुआ देख कर उसे भी अप्रमाणित किया। फिर कान्हड़देव की अनुज्ञासे कुमारपाल, वस्त्र संवरण करके ऊँचेसे श्वास लेता हुआ और हाथमें तलवार कँपाता हुआ, सिंहासन पर जा बैठा । पुरोहितने मंगलाचार किया, नगाड़े बजे । श्रीमान् कान्हड़देव ने पंचांगोंसे पृथ्वी चूम कर प्रणाम किया । उस समय उसकी अवस्था पचास वर्षकी हुई थी । * कुमारपालने राजद्रोहियोंका उच्छेद किया । १३० ) कुमारपाल स्वयं प्रौढ होनेके कारण, तथा देशान्तर भ्रमणसे विशेष निपुणता प्राप्त करनेके कारण, सब राज्यशासन स्वयं करने लगा। राज-वृद्धोंको यह अच्छा नहीं लगा। उन्होंने मिल कर उसे मारना चाहा और अन्धकार वाले दरवाजेमें घातकोंको रख दिया। पूर्वजन्मके शुभ कर्मोंसे प्रेरित किसी आप्तने उस वृत्तान्तको बता कर उसे अन्य द्वारसे मकानमें प्रवेश कराया । बादमें उन प्रधानोंको उसने शीघ्र यमपुरीको भेज दिया । वह भावुक मण्डलेश्वर ( कान्हडदेव ), राजा अपना साला होनेके कारण, तथा अपने आपको राज- प्रतिष्ठाचार्य समझ कर, राजाकी दुरवस्थाके [ उन पिछले ] मर्मोंको कहा करता । इस पर किसी समय राजाने कहा- ' हे भावुक, तुम्हें इस प्रकार राज-दरबारमें सर्वदा पुरानी दुर्ववस्थाके मर्मोंका मजाक नहीं करना चाहिये । अग्रेसे ऐसी बातें सभामें न कहना, विजनमें चाहे यथेच्छ कहते रहना ।' राजाके इस प्रकार उपरोध करने पर भी, उत्कट अवज्ञावश हो कर वह बोला कि- ' रे अनात्मज्ञ ! अभी इतनेहीमें अपने पैर उखाड रहा है?' इस प्रकार बकता हुआ, मानों मोतहीकी इच्छासे, औषधकी भाँति उसके पथ्य वचनको भी उसने ग्रहण नहीं किया । [ उस क्षण तो ] राजाने अपने भावका संवरण करके अपनी मनोवृत्ति छिपा ली। दूसरे दिन राजाके संकेत प्राप्त मल्लोने उसका अंग तोड़ मरोड़ कर, दोनों आँखें निकाल लीं और उसे उसके मकान पर भिजवा दिया । १७८. इस विचारसे कि पहले मैने ही इसे जलाया है अतः तिरस्कार करने पर भी यह मुझे नहीं जलायेगा, इस भ्रमके वश हो कर दीपककी तरह, राजाको कोई अंगुलिके पोरसे भी न छुए। यह विचार कर, सामन्त लोग, उस दिनसे अत्यधिक भयचकित चित्त हो कर, प्रतिपद पर उसकी सेवा करने लगे । * १३१) राजाने पूर्वमें उपकार करने वाले उदयन के पुत्र वाग्भटदेव को अपना महामात्य बनाया और आलिंग को तथा महं० उदयन देव को बड़े (वृद्ध) प्रधान बनाये । * कुमारपालका चाहमान राजा आनाकके साथ युद्ध । १३२) चाहड़ नामक एक कुमार सिद्धराज का प्रतिपन्न (माना हुआ) पुत्र था। वह कुमारपालदेव की आज्ञा न मान कर सपादलक्ष के राजाके पास सैनिक हो कर चला गया । वह श्री कुमारपाल के साथ विग्रह करनेकी इच्छासे, वहाँके सभी सामन्त लोगोंको डाँच (रिश्वत) आदिके द्वारा अपने वशमें करके, प्रबल सेनाके साथ सपादलक्ष के राजाको ले कर [गूर्जर] देशकी सीमा पर चढ़ आया। अब, चौलुक्य चक्रवर्ती (कुमारपाल) ने भी, प्रतिशत्रु बन कर, उस सैन्यके सामने अपना सैन्यसमूह जमा किया। जब लड़ाईका दिन तै हुआ और सीमायें निष्कंटक की गई तथा चतुरङ्ग सेना सजित की गई, तो उसी समय पह
इस्तीफे चउलिग नामक महावतने, किसी अपराधमें राजासे फटकार पा कर, क्रोधसे अंकुश-त्याग कर दिया। इसके बाद, अनेक गुणके पात्र ऐसे सामल नामक महावतको खूब वस्त्र और धन आदि दे कर उस पद पर नियुक्त किया। उसने 'कलहपञ्चानन' (युद्धका सिंह) नामक हाथीको सजा करके उसके ऊपर राजाका आसन रखा। ३६ प्रकारके अस्त्रोंको वहा जमा कर, फिर राजाको बैठाया और सब कला कलापसे पूर्ण ऐसा वह स्वय भी कलापके पर पैर रख कर हाथी पर चढ़ा। उस आसन पर बैठ कर चौलुक्य-चक्रवर्ती (कुमारपाल) ने देखा, तो मालूम हुआ कि, सङ्ग्रामके नायक पुरुषोंसे उठाये जाने पर भी, चाहड कुमारके किये हुए भेदके कारण (फुट जानेसे), सामन्त लोग उसकी आज्ञाको नहीं मान रहे हैं। इस प्रकार सेनामें कुछ विप्लव देख कर उसने महावतको [ आगे बढ़नेका ] आदेश किया। सामनेकी सेनामें हाथी परका छत्र देख कर अनुमान किया कि वह सपादलक्ष का राजा [ आ रहा ] है। और यह निश्चय करके कि, सेनाके विघटित (विमुख) हो जाने पर मुझे अकेलेहीको लडना आवश्यक है, उस महावतको, सामनेके हाथीके पास, अपने हाथीको ले चलनेकी आज्ञा दी। पर उसे भी वैसा न करते देख बोला कि-'क्या तू भी फूट गया है?' इस पर उसने कहा-'महाराज ! कलहपञ्चानन हाथी और सामल नामक महावत ये दोनों युगान्तमें भी फूटने वाले नहीं है; किन्तु सामनेके हाथी पर जो चाहड नामक कुमार चढा हुआ है वह ऐसी गभीर आवाज कर रहा है कि जिसकी हाँकके डरसे हाथी भी भाग छूटते हैं। यह सुन कर राजाने [ अपनी बुद्धिमत्तासे, सोच कर ] हाथीके दोनों कानोंको चादरसे बद कर दिया और फिर शत्रुके हाथीसे आ भिड़ाया। इधर चाहड़ने, यह जान कर कि यह चउलिग नामक महावत ही-जिसे उसने पहलेहीसे अपने वशमें कर लिया है-राजाके हाथा पर बैठा है, कुमारपाल को मारनेकी इच्छासे हाथमें कृपाण ले कर अपने हाथी परसे कूद कर 'कलहपञ्चानन' हाथीके कुम्भस्थल पर पैर रखा। इतनेमें महावतने [ बडी चालाकीसे ] हाथीको पीछे हटा दिया। इससे वह चाहडकुमार पृथ्वी पर गिर पड़ा और नीचे खडे हुए पैदल सैनिकोंने उसे पकड़ लिया। इसके बाद चौलुक्य राज ने श्रीआनाक नामक सपादलक्ष देशके राजासे कहा कि-'हथियार समालो!' ऐसा कह कर उसके मुख-कमल पर उचित समझ शिलीमुख (बाण) फेंकने लगा। (उचित इसलिये कि शिलीमुख भौंरेका भी नाम है और भौंरोंका कमलोंकी ओर जाना उचित ही है।) 'तुम बड़े प्रधान क्षत्रिय हो न'-इस प्रकार उपहासके साथ प्रशंसा करते हुए, उसे भुलावेमें डाल कर, जो बाण मारा तो उससे घायल हो कर वह हाथीके कुम्भस्थलसे गिर गया। 'जीत लिया, जीत लिया' कहते हुए राजाने स्वय सारी सेनामें अपने हाथीको इधरसे उधर घुमाया और जो सब सामन्त थे उनके घोड़ों पर आक्रमण करके उनको कैद किया। इस प्रकार यह चाहड कुमारका प्रबंध समाप्त हुआ। * कुमारपालका उपकारियोंको सत्कृत करना। १३३) तत्पश्चात्, कृतज्ञ-सम्राट् चौलुक्यराजने आलिंग कुम्हारको सातसौ गाँववाली विचित्र चित्रकूट पट्टिका (चित्तोड, मेवाडकी भूमि) दी। वे अपने वशके कारण लज्जित हो कर आज भी अपनेको 'सगर' (१) कहते हैं। जिन्होंने कटे हुए बबूलकी डालोंमें छिपा कर राजाकी रक्षा की थी वे अंगरक्षकके पदपर रखे गये। १ हाथीपर चढ़नेके लिये रस्सीका बना हुआ छींका।