भारतकोश
प्रबन्धचिन्तामणि (गुजरात, मालवा व चालुक्य ऐतिहासिक प्रबन्ध)

प्रबन्धचिन्तामणि (गुजरात, मालवा व चालुक्य ऐतिहासिक प्रबन्ध)

Prabandha Chintamani with Hindi Translation

मेरुतुङ्गाचार्य (१३०४ ई.) / पं. हजारीप्रसाद द्विवेदी द्वारा

DevanagariHindipublished181 पृष्ठ

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ख ] प्रबन्धचिन्तामणि इस ग्रन्थके कई उल्लेखोंका आधार लिया है। इसी तरह १८ वीं शताब्दीमें बने हुए वस्तुपालरास, कुमारपाल- रास आदि भाषा ग्रन्थोंके रचयिताओने भी अपनी अपनी कृतियोंमें इस ग्रन्थका बहुत कुछ उपयोग किया है, जिनका विशेष वर्णन करना आवश्यक नहीं है। इस कथनसे ज्ञात होता है कि उस पुरातन समयसे ही मेरुतुङ्ग सूरिके इस महत्त्वके ग्रन्थकी अच्छी ख्याति और उपयोगिता स्थापित हो गई थी। २. प्रबन्धचिन्तामणिकी वर्तमान नवीन युगमें प्रसिद्धि और उपयोगिता । प्रवर्त्तमान नवीन कालके प्रारम्भमें, सबसे पहले अंग्रेज विद्वान् श्री एलेक्जेंडर किन्लॉक फोर्ब्स साहबको इसका परिचय हुआ और उन्होंने गुजरातके इतिहास विषयकी अपनी सुप्रसिद्ध पुस्तक 'रासमाला' में इसका सर्वप्रथम उपयोग किया। अपने ग्रन्थमें लिखे गये गुजरातके प्राचीन इतिहासका मुख्य ढांचा उन्होंने इसी ग्रन्थ परसे तैयार किया। वे अपने ग्रन्थमे, इस ग्रन्थका पद पद पर उल्लेख करते हैं और इसमें लिखी गई बातोंका संपूर्ण उपयोग करते हैं। उनके पीछे, भारतीय पुरातत्त्वके प्रखर पण्डित, जर्मन विद्वान्, डॉ० ब्यूहलरने इस ग्रन्थका खूब बारीकीके साथ अध्ययन किया और इसमें वर्णित ऐतिहासिक तथ्योंका सविशेष ऊहापोह किया। 'इन्डियन ऐन्टीक्वेरी' नामक भारतीय-विद्या विषयक सुप्रसिद्ध पत्रिकाके सन् १८७७ के जुलाई मासके अंकमें उन्होंने 'अनहिलवाडके चालुक्योंके ११ दानपत्र' (Eleven land grants of the Chalukyas of Anhilvad) इस शीर्षक नीचे, अणहिलपुरके राजकीय इतिहास पर प्रकाश डालनेवाला एक महत्त्वका लेख लिखा जिसमें इस प्रबन्धचिन्तामणि कथित बातोंका अच्छा अवलोकन किया। फिर उसके बादमें, डॉ० ब्यूहलरने, जर्मन भाषामें Uber das Leben des Jaina Monches Hemacandra इस नामसे, आचार्य हेमचन्द्रका सविस्तार जीवनचरित्र लिखा, जिसमें उन्होंने प्रस्तुत प्रबन्धचिन्तामणिका पूरा पूरा उपयोग किया*। इसके बाद, बंबई सरकारने, बॉम्बे गेजेटियरके लिये जब गुजरातका प्राचीन इतिहास तैयार करवाया, तो उसके संकलनकर्त्ता प्रसिद्ध गुजराती पुरातत्त्वज्ञ डॉ० भगवानलाल इन्द्रजीने, इस ग्रन्थका बहुत सूक्ष्मताके साथ सांगोपाग निरीक्षण किया और गुजरातके राजकीय इतिहासके साथ सबन्ध रखने वाली प्राय सारी ऐतिहास उक्तियों और श्रुतियोंका जो जो इसमें निर्देश मिलता है उन सबका ठीक ठीक पर्यालोचन कर, यथायोग्य उनका उपयोग किया। तदुपरान्त, गुजरातके इतिहास विषयक भिन्न भिन्न प्रकारके पुस्तकों और निबन्धोंके रचयिता एतद्देशीय और विदेशीय सैंकडों ही विद्वानोंने जहा-तहा इस ग्रन्थका अनेकशः आधार लिया है और उल्लेख किया है। इस ग्रन्थकी ऐसी सार्वजनिक उपयोगिताको लक्ष्य कर, रासमालाके कर्ता विद्वान् फोर्ब्स साहबकी, और तदनुसार डॉ० ब्यूहलरकी भी, यह खास इच्छा रही कि विस्तृत टीका-टिप्पणियोंके साथ इस ग्रन्थका संपूर्ण अंग्रेजी अनुवाद किया जाय । डॉ० ब्यूहलरकी इस इच्छाको, कथासरित्सागर आदि प्रसिद्ध संस्कृत कथामन्थोंके सिद्धहस्त अंग्रेजी अनुवादक, अंग्रेज विद्वान्, श्रीयुत सी. एच्. टॉनी, एम्. ए. ने पूरा किया। उन्होंने इस ग्रन्थका सुन्दर और संपूर्ण अंग्रेजी अनुवाद किया जिसको कलकत्ताकी एशियाटिक सोसाइटीने सन् १९०१ में छपा कर प्रकाशित किया। डॉ० ब्यूहलरकी उत्कण्ठा थी कि वे टॉनीके इस भाषान्तरके साथ, ऐतिहासिक और भौगोलिक विषयोंकी परि- चायक ऐसी अपनी टीका-टिप्पणियाँ दे कर, इस ग्रन्थकी उपादेयताका महत्त्व बढ़ावेंगे; पर दुर्देवसे इस कार्यके पूर्ण होनेके पहले ही उनका स्वर्गवास हो गया और उनकी वह इच्छा यों ही अपूर्ण रह गई। विद्वान् टॉनीने अपने अंग्रेजी अनुवादकी प्रस्तावनाके प्रारम्भमें, जो इस बारेमें कुछ लिखा है, उसका भावार्थ यह है-

  • डॉ० ब्यूहलरका यह बड़े महत्त्वका ग्रन्थ है। इसका अंग्रेजी अनुवाद The Life of Hemacandracarya इस नामसे, हमने अपने सहपाठी मित्र डॉ मणिलाल पटेल Ph. D ( मारबुर्ग-जर्मनी) द्वारा करवा कर, इसी सिंधी जैन ग्रन्थ- मालाके १२ वें नंबर में प्रकाशित किया है। अंग्रेजी ज्ञाता विद्वानोंके लिये यह ग्रन्थ अवश्य पठनीय है।