प्रबन्धचिन्तामणि (गुजरात, मालवा व चालुक्य ऐतिहासिक प्रबन्ध)
Prabandha Chintamani with Hindi Translation
मेरुतुङ्गाचार्य (१३०४ ई.) / पं. हजारीप्रसाद द्विवेदी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंप्रास्ताविक वक्तव्य [ ग “ राजतरंगिणीके अकेले अपवादको याद किया जाय तो, संस्कृत साहित्यमें ऐतिहासिक कहलाने लायक एक भी कोई ग्रन्थ नहीं है-ऐसा जो आक्षेप बारंबार किया जाता है, वह इस प्रबन्धचिन्तामणि जैसे ग्रन्थके अस्तित्त्वसे, किसी अंशमें भोंटा पाडा जा सकता है। इस आक्षेपका निःसार सिद्ध करना यह स्वर्गगत हो प्राय प्रोफेसर ब्यूह्लरकी जीवन भरकी अभिलाषा थी। ग्रन्डरिस्स् डेर इन्डो-आरिशेन् फिलोलोजी (Grundriss der Indo-Arischen Philologie) नामक ग्रन्थ- मालाके लिये, डॉ० ब्यूह्लरकी रसप्रद जीवन कथाका आलेखन करनेवाले प्रो० जोलीने (Jolly), ई० स० १८७७ में श्रीयुत न्योल्डेके (Noldeke) नामक विद्वान् पर लिखे हुए ब्यूह्लरके एक पत्रमेंसे अवतरण दिया है, जिसमें उन्होंने लिखा था कि- ‘भारतवासियोंके पास कुछ भी एतिहासिक साहित्य नहीं है इस प्रकारकी मान्यता रखनेमें आपलोग, वर्तमान समयसे कुछ थोड़ेसे पिछड़े हुए मालूम दे रहे हैं। पिछले बीस वर्षोंमें ठीक ठीक विस्तृत ऐसे पाँच ऐतिहासिक ग्रन्थ मिल आये हैं, जो उनमें वर्णित घटनाओंके समकालीन ग्रन्थकारोंके बनाये हुए हैं। इनमेंसे ४ तो, जिनके नाम विक्रमाकचरित, गउडवहो, पृथ्वीराज- दिग्विजय और कीर्तिकौमुदी हैं, खुद मैंने खोज निकाले हैं। और एक दर्जनसे भी अधिक अन्य और ग्रन्थ खोज निकालनेकी तलाशमें हूँ।' यह प्रोफेसर ब्यूह्लर ही-के श्रमका फल है कि जो इतने सारे ऐतिहासिक वृत्तांत, इतने ऐतिहासिक काव्य और इतनी ऐतिहासिक कथाएँ संपादित हो सकीं। इस ग्रन्थके इंग्रजी अनुवादके करनेका काम जो मैंने हाथमें लिया यह भी डॉ० ब्यूह्लर-ही-की सूचनाका परिणाम है, और जो कोई पाठक मेरी टिप्पणियोंके पढ़नेका कष्ट उठायेगा उसे स्पष्ट ज्ञात हो जायगा, कि उन्द्रींक उत्तेजन और साहाय्यके बिना मेरा यह काम अपने अन्तको न प्राप्त कर सकता। इस अनुवादके साथ ऐतिहासिक और भौगोलिक विषयोंकी पूर्ति करनेवालीं टिप्पणियाँ लिखनेका उनका खास इरादा था। अगर यह बन पाता तो इस ग्रन्थकी उपयोगितामें खूब महत्त्वकी वृद्धि हो पाती, पर इस विचारके, कार्यरूपमें परिणत होनेके पहले ही, दुर्देवसे उनका अवसान हो गया और अब यह बात ‘मनकी बात मनमें ही रही' जैसी कहावतके योग्य हो गई। भारतके इतिहास विषयक साहित्यके बारेमें और उसमें भी खास करके गुजरातके इतिहासके साथ सबद्ध साहित्यके सम्बन्धमें, हरएक इंग्रेंज विद्यार्थीको एक और नामका स्मरण हो आना चाहिए और वह नाम है रासमालाके कर्ता श्री एलेक्सेंडर किन्लौक फोर्बस्का। मि. ए. जे. नैर्ने, बी. सी. एस. (Mr. A. J. Nairne, B. C. S) ने फोर्बस् साहबका जीवनचरित लिखा है, जो कर्नल वॉटसन् द्वारा संपादित और सन् १८७८ में प्रकाशित, रासमालाकी आवृत्तिके प्रारम्भमें मुद्रित है। श्री फोर्बस् साहब एक ऐसे इण्डियन सिविलियन थे, जिनको अपन भाग्यका पासा जिन लोगोंके साथ डाल गया हो उन लोगोंक इतिहास, वाङ्मय और पुरातत्त्वके विषयमें पूरा रस रहता हो। इस विषयकी उनकी, उत्कण्ठा और सत्यनिष्ठापूर्ण अध्ययनशीलताकी प्रतीति, रासमालाके प्रत्येक पृष्ठ पर होती रहती है। जिन अनेक मूलभूत आधारोंके ऊपरसे उन्होंने अपना ग्रन्थ तैयार किया, उनमेंका यह एक प्रबन्धचिन्तामणि है। इस ऐतिहासिक ग्रन्थका उन्होंने इतना तो सपूर्ण उपयोग किया है कि जिसे देख कर मेरे मनमें, अपने इस अनुवादके करते समय, बारबार यह उठ आता था कि मैं निरर्थक ही यह श्रम कर रहा हूँ। किन्तु प्रो० न्यूह्लरने मुझसे कहा था कि इस ग्रन्थका सपूर्ण इंग्रजी अनुवाद हो ऐसी इच्छा स्वय फोर्बस्ने अनेक बार प्रदर्शित की थी*। और यही मेरे इस परिश्रमकी उपयोगिताका आधार है। लेकिन, मैं अपने मनको इस तरह भी प्रोत्साहित रखना चाहता हूँ कि-मध्यकालीन इस जैन यतिने लिख रखी हुई इन श्रुतपरपराओंमें, जिनका विवरण या स्पष्टीकरण करनेसे इनके मूलमें रही हुई आधी मोहमता नष्ट हो जाती है, न केवल भारतके इतिहासके अभ्यासियों- ही को, किन्तु तदुपरान्त लोककथाओंके शताओको और मानव-नीति-शास्त्रके विद्वानोंको भी, रस प्राप्त होगा। ग्रन्थकार स्वयं भी कहता है कि-इस रचनाके करनेमें मेरा उद्देश जनमन रञ्जन करनेका है।” इत्यादि। * ३. प्रबन्धचिन्तामणिके मूल संस्कृत ग्रन्थका प्रथम प्रकाशन और गुजराती भाषान्तर। जैसा कि हमने, अपनी मूल आवृत्तिके प्रारम्भमें दिये हुए 'किंचित् प्रास्ताविक' शीर्षक वक्तव्यमे लिखा है, इस ग्रन्थके संस्कृत मूलका प्रथम प्रकाशन, गुजरातके शास्त्री रामचन्द्र दीनानाथ नामक विद्वान्ने, सवत्
- फोर्बस् साहबकी ऐसी इच्छा ही नहीं थी, बल्कि उन्होंने तो इसका पूरा इंग्रजी अनुवाद खुद ही सबसे पहले कर लिया था और फिर उसका उपयोग रासमालामें किया था, ऐसा बम्बईकी फोर्बस् सभा में जो उनका ग्रन्थसग्रह विद्यमान है उससे मालूम होता है। बम्बईके इस सग्रहमें फोर्बस् साहबकी हाथकी लिखी हुई एक नोटबुक है जिसमें इस ग्रन्थक २,४ और ५ वें प्रकाशका इंग्रजी भाषान्तर लिखा हुआ है। पहले दो प्रकाशोंका भाषान्तर, शायद किसी दूसरी नोटबुकमें लिखा हुआ होगा जो अब उपलब्ध नहीं है। श्री टॉनीको इसकी खबर न होनेसे, शायद उन्होंने वैसा लिखा होगा। अथवा यह भाषान्तर वैसा पूर्ण और शुद्ध न होगा जिससे फोर्बस्को सन्तोष रहा हो, और इसीलिये उन्होंने इसका एक उत्तम भाषान्तर, योग्य सस्कृतज्ञ पण्डितके हाथसे हो, ऐसी इच्छा डॉ० ब्यूह्लरके आगे प्रदर्शित की हो।